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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 442 में से

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पृष्ठ 206

कपर्दि यक्ष-कल्प १२५
कालधर्म प्राप्त हुआ। तीर्थ के माहात्म्य और नवकार मन्त्र के
प्रभाव से वह कवड्डि-(कपर्दि) यक्ष उत्पन्न हुआ। और अवधि ज्ञान
से अपना पूर्व भव देखकर आदीश्वर भगवान की पूजा करने
लगा। यह व्यतिकर सुनकर उसकी गृहिणी वहाँ आई और आत्म-
निन्दा करते हुए अनगनपूर्वक जिनेश्वर का स्मरण कर काल-धर्म
को प्राप्त हुई और उसी यक्ष का वाहन हाथी उत्पन्न हुई। कपर्दि
यक्ष के चारो हाथो मे पाश, अकुग, द्रव्य की थैली और वीजोरा
रहता है।
अवधिज्ञान से वह अपना पूर्वभाव ज्ञात कर महाराज के
चरणो मे आया और हाथ जोड़कर कहा—भगवन् ! आपके
प्रसाद से मैने यह ऋद्धि प्राप्त की है, अब मुझे कुछ कर्त्तव्य का
आदेश करे। गुरु महाराज ने कहा—तुम इसी तीर्थ पर नित्य
स्थित रहो और युगादिनाथ जिनेश्वर की त्रिकाल पूजा करना।
यात्रा के लिए आये हुए भव्य जीवो का मनोवाछित पूर्ण करना
और सकल सघ के विघ्नो को दूर करना।
यक्षाधिप गुरु-वचनो को स्वीकार कर उनकी चरण-वन्दना
करके विमलगिरि-शिखर पर गया और गुरु महाराज द्वारा उप-
दिष्ट कार्य करने लगा।
ये अम्बादेवी और यक्षराज कपर्दि के कल्पयुग्म श्री जिनप्रभ
सूरि ने वृद्ध-वचनानुसार लिखे हैं।
कपर्दि यक्ष-कल्प पूर्ण हुआ इसकी ग्रन्थ सख्या ४२ है।