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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 442 में से

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पृष्ठ 207

१२२ विविध तीर्थ-कल्प
हरिकेली गाँव फिर से बसा, गोष्टिक श्रावक आये। भगवत
की भग्न प्रतिमा को देखकर परस्पर कहने लगे—अहो ! महान्
महत्त्वशाली भगवान का म्लेच्छो ने भंग कैसे कर दिया ? फिर
क्या भगवत की वैसी कला नही रही ?
उन लोगो के सोने पर अधिष्ठायक देव ने स्वप्न मे आदेश
दिया कि इस प्रतिमा के सभी टुकडो को एकत्र करके गर्भगृह मे
स्थापित कर कपाट बंध करके ताले लगा दो। छ मास तक इसी
तरह प्रतिपालन करना, उसके पश्चात् द्वार खोलकर प्रतिमा को
संपूर्ण अंगोपांग युक्त अखंड देखना। गोष्ठी लोगो ने भोग-पूजा
करके वैसा ही किया। पाँच मास बीतने पर छठे महीने के प्रारभ
मे उत्सुकता के वशीभूत होकर गोष्टिक लोगो ने द्वार खोल दिए।
उन्होने देखा भगवत के सम्पूर्ण अंगोपांग युक्त होने पर भी स्थान
स्थान पर मसे बने हुए है। उन लोगो ने तत्त्व-विचार न कर
सुथार को बुलाया। उसने टकी के द्वारा मसो को तोडना प्रारभ
किया तो मसो से रुधिर निकलने लगा। गोष्टिक लोगो ने भय-
भीत होकर भोग-पूजादि प्रारभ किया।
रात्रि मे अधिष्ठायक देव ने आदेश किया—तुम लोगो ने यह
गोभनीय कार्य नही किया कि छ मास पूर्ण हुए बिना ही द्वार
खोल डाला, फिर टंकिया भी चलाई। अब फिर जब तक अंतिम
मास पूर्ण हो हमारा द्वार बन्द कर दो। उन्होने उसी प्रकार
किया। छ मास के अनन्तर विधिपूर्वक द्वार खोल कर देखा तो
पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा को निरुपहत अखण्ड अङ्गोपाङ्ग-
युक्त पाया। केवल नख सूक्ति और अंगुष्ठ पर तुच्छ दाग रह गया
था। गोष्टिक लोग सन्तुष्ट होकर पूर्ववत् पूजा करने लगे। चारों
दिशाओ से संघ आकर यात्रा-महोत्सव करता है। इस प्रकार
चमत्कारी माहात्म्य के निधान श्री पार्श्वनाथ भगवान है।