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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 442 में से

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पृष्ठ 205

१२४ विविध तीर्थ-कल्प
उपाश्रय माँगने के लिए आये हैं, जहाँ पर सूरि महाराज सपरि-
वार रह सके ।
उसने कहा - मैने उपाश्रय दिया, सूरि महाराज पधारें और
सुखपूर्वक रहे । पर केवल हम पाप निरतो को धर्मोपदेश न दें ।
साधुओ ने कहा—ऐसा हो होगा ! गुरु महाराज पधारे, वर्षाकाल
चातुर्मास रहे । वे स्वाध्याय करते और छट्ठ-अठ्ठमादि तप द्वारा
अपने शरीर का शोषण करते । क्रमशः वर्षाकाल बीतने पर वह
उन्हे विदा करने लगा और उनके सत्यप्रतिज्ञ गुण से प्रसन्न
होकर अपनी नगर-सीमा तक पहुँचाने के लिए चला । सीमा पर
पहुचने पर सूरिजी ने कहा—मेहर ! तुमने उपाश्रय देकर हमारा
बडा उपकार किया । अब हम आज कुछ धर्मोपदेश देगे, जिसने
प्रत्युपकार हो सके । मेहर ने कहा—मेरे से नियम का निर्वाह तो
नही होगा ! कुछ मन्त्राक्षर उपदेश करें ।
सूरि महाराज ने अनुकम्पा से उसे पच परमेष्ठि नमस्कार
महामन्त्र सिखाया और उसका जल-अग्नि-स्तभनादि प्रभाव भी बत-
लाया । फिर गुरु महाराज ने कहा—प्रतिदिन तुम शत्रुञ्जय की
दिशा मे प्रणाम करना । मेहर उनका कथन स्वीकार करके अपने
घर आ गया । सूरि महाराज अन्यत्र विचरने लगे । वह मेहर
क्रमश उस पञ्च परमेष्ठी मत्र का जाप करते हुए—नियम-निर्वाह
करते हुए काल निर्गमन करने लगा । अन्यदा उसकी पत्नी ने उसे
कलह करके घर से निकाल दिया । वह शत्रुञ्जय गिरिराज के
शिखर पर चढने लगा । जब वह मद्य से भरा पात्र हाथ मे लिए
वटवृक्ष की छाया मे मद्यपान करने के लिए बैठा तो गीध के मुँह
मे रहे हुए साँप के जहर की बूँदें मद्यपात्र मे आकर गिरी । उसने
यह देखकर विरक्त चित्त से मद्य त्याग दिया और ससार से विरक्त
होकर अनशन ग्रहण कर लिया । आदीश्वर भगवान के चरण
कमल एव नवकार मत्र को स्मरण करते हुए वह शुभ ध्यान से