विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
१०६ विविध तीर्थ-कल्प
श्री कन्यायननीय महावीर प्रतिमा का यह कल्प संपूर्ण हुआ ।
इस की ग्रन्थ संख्या ७७ और १५ अक्षर हैं ।
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२३. प्रतिष्ठान पत्तन-कल्प
महाराष्ट्र रूपी लक्ष्मी के रत्नापीड, रम्य हवेलियो और नेत्रो
को गीतल करने वाले चैत्यो से युक्त गोदावरी से पवित्रित श्री-
प्रतिष्ठान नामक पत्तन जयवत रहे ।
यहाँ अड़सठ लौकिक तीर्थ और वावन वीर हैं। वीर
क्षेत्र होने के कारण यहाँ सूर्य के समान प्रौढप्रणाली राजामो का
भी प्रवेश नही होता ।
रात्रि बीतने पर उषाकाल मे यहाँ से साठ योजन चल कर
अश्व को प्रतिवोध करने के लिए श्री मुनिसुव्रत जिनेश्वर भरोच
पधारे थे ।
भगवान महावीर के निर्वाण से ९९३ वर्ष बीतने पर यहाँ
श्री कालिकाचार्य ने सावत्सरिक पर्व भाद्रपद शुक्ल ४ को किया ।
यहाँ के आयतनो की पंक्ति को देखकर विचक्षण पुरुष देव-
विमान मे अग्रणी श्री विलोकविमान को देखने का कौतुहल त्याग
देते हैं ।
यहाँ शातवाहन आदि विचित्र चरित्र वाले नरेश्वर हुए हैं एवं
यहाँ के अनेको सदन बहुत प्रकार के देवताओ से अधिष्ठित हैं।
प्रतिष्ठान पत्तन-कल्प १०७
यहाँ राजा के अनुरोध से कपिल, आत्रेय, बृहस्पति और
पाचाल ने अपने बनाये हुए चार लाख श्लोक परिमित ग्रन्थो को
एक श्लोक मे प्रस्तुत किया था। वह श्लोक यह है—
“जीर्णे भोजनमात्रेय कपिल प्राणिना दया।
वृहस्पतिरविश्वास पञ्चाल स्त्रीषु मार्दवम् ॥”
जीर्ण होने पर भोजन करना आत्रेय का, कपिल का प्राणियो
पर दया करना, विश्वास न करना बृहस्पति का एवं स्त्रियो से
कोमल व्यवहार करना पाचाल का सिद्धान्त है।
यहाँ दृष्टि से अमृत वर्षाने वाली सम्यग्दृष्टि मयूरो के लिए
पयोद घटा के सदृश श्री मुनिसुव्रत स्वामी की लेप्यमयी जीवित
स्वामी प्रतिमा जयवन्त है। उसको उस समय ग्यारह लाख अठावन
हजार आठ सौ छप्पन वर्ष हो गये।
यहाँ मुनिसुव्रत-जिनालयँ की यात्रार्थ आकर विविध पूजा
करते भव्य जन ऐहिक और पारलौकिक सुख सपत्ति प्राप्त करते हैं।
इस प्रासाद मे अन्य जिनेश्वरो के साक्षात् कान्ति वाले लेप्यमय
विम्व सुशोभित हैं जो मनुष्यो की प्रीति मे वृद्धि करते हैं।
अम्बादेवी, क्षेत्रपाल, यक्षाधिपति कर्पर्दि इस चैत्य मे वसते
हुए श्रीसंघ के उपसर्गों को नष्ट करते है।
यहाँ देवताओ के समूह से हर्षपूर्वक वद्यमान प्राणि-समूह का
उपकार करने के व्रतवाले चैत्य लक्ष्मी के भूषण श्री मुनिसुव्रत
भगवान आपका सदा कल्याण करने वाले हो।
सत्पुरुषो की सम्पत्ति के लिए श्री जिनप्रभसूरि ने श्री प्रतिष्ठान
तीर्थ का यह कल्प बनाया।
श्री प्रतिष्ठान पत्तन कल्प के ग्रन्थाग्र १९ और अक्षर १५
परिमित है।
१०८ विविध तीर्थ-कल्प
२४. नन्दीश्वरद्वीप-कल्प
इन्द्रादि द्वारा पूजित चरणो वाले श्री जिनेश्वरों की आराधना
करके विश्वपावन श्री नन्दीश्वर द्वीप का कल्प कहता हूँ (१) ।
नन्दीश्वर स्वर्ग के समान आठवाँ द्वीप है जो नन्दीश्वर नामक
समुद्र से घिरा हुआ है (२) । यह गोलाई विष्कंभ से तेसठ कोटा-
कोटि और चौरासी लाख योजन है (३) । ये विविध विन्यास युक्त
उद्यानो वाली देव-भोगभूमि है और जिनेश्वर भगवान की पूजा
के हेतु देवो के आवागमन से सुन्दर है (४) । इसके मध्यप्रदेश मे
क्रमश पूर्वादि दिशाओ मे अंजन वर्ण वाले चार अंजन गिरि हैं
(५) । वे दश हजार योजन विस्तार भूमि और हजार योजन ऊँचे
छोटे मेरुओ सहित है (६)। वहाँ पूर्व मे देवरमण, दक्षिण में नित्यो-
द्योत, पश्चिम मे स्वयंप्रभ और उत्तर मे रमणीय (नामक) हैं
(७) । उन पर नौ योजन लम्बे और उससे आधे चौडे व वहत्तर
योजन ऊँचे अर्हत् चैत्य हैं (८) । चारो के पृथक् पृथक् द्वार सोलह
योजन ऊँचे हैं उनका प्रवेश आठ योजन है (९) । वे देव, असुर,
नाग आदि देवताओ के आश्रय से उन्ही के नामो से प्रसिद्ध हैं
(१०) । उनमे सोलह योजन लंबी उतनी ही चौडी और आठ योजन
ऊँची मणिपीठिकाएँ हैं (११) । पीठिकाओं पर सर्वरत्नमय देव-
छंदक हैं जो पीठिकाओ अधिक लंबे और ऊँचे हैं (१२) । उनमे
ऋषभ, वर्द्धमान, चन्द्रानन और वारिषेण नामक पद्मासन संस्थित
स्व स्वपरिवार युक्त प्रत्येक की १०८ रत्नमय शाश्वत अर्हन्त
प्रतिमाएँ हैं (१३-१४) । दो-दो नागयक्ष भूतो की कुण्डलधारिणी
प्रतिमाएँ पथक् पृथक् हैं, प्रतिमाओं के पीछे एक एक छत्रधारिणी
प्रतिमाएँ हैं (१५) । उनमे धूप घटी पुष्पमाला, घण्टा, अष्टमङ्गल,
ध्वजा, छत्र, तोरण, चंगेरी, पटल आसन है (१६) । पूर्ण कलशादि
सोलह अलङ्करण हैं, वहाँ की भूमियाँ सोने चाँदी की वालुकामय
हैं (१७) । आयतन के प्रमाण से रुचिर मुख्य मण्डप, प्रक्षामण्डप,
अक्षवाटक और मणि पीठिकाएँ हैं (१८) । रम्य स्तूप प्रतिमाएँ और
सुन्दर चैत्य वृक्ष हैं, इन्द्रध्वज और दिव्य पुष्करिणियाँ यथा क्रम
हैं (१९) । चतुर्द्वार स्तूपो मे सब मे सोलह सोलह प्रतिमाएँ है, इस
प्रकार वे एक सौ आठ युक्त चौबीस सौ हो जाती हैं (२०) । प्रत्येक
अञ्जनगिरि के चारो दिशाओ मे लक्ष योजन जाने पर बिना मत्स्य
वाले स्वच्छ जल युक्त हजार योजन ऊँची, लाख योजन विस्तीर्ण
सोलह पुष्करिणी है जिनके नाम क्रमश इस प्रकार है (२१-२२) ।
१ नन्दिषेणा, २ अमोघा, ३ गोस्तूपा, ४ सुदर्शना, ५ नन्दोत्तरा,
६ नन्दा, ७ सुनन्दा, ८ नन्दिवर्द्धना, ९ भद्रा, १० विशाला,
११ कुमुदा, १२ पुण्डरीकिणी, १३ विजया, १४ वैजयन्ती,
१५ जयन्ती, १६ अपराजिता । (२३-२४)
इनकी प्रत्येक की लम्बाई और चौडाई पाँच सौ-पाँच योजन
है (२५) । लाख-लाख योजन लम्बे महा उद्यान हैं जिनके अगोक,
सप्तपर्ण, चम्पक, आम्र आदि नाम हैं । (२६)
पुष्करिणीयो के मध्य मे स्फटिक के पल्यमूर्त्ति वाले ललाम
वेदी उद्यानादि चित्र युक्त दधिमुख पर्वत हैं (२७) । वे चौसठ
हजार योजन ऊँचे और एक हजार योजन ऊपर की अवगाहना
वाले और नीचे से दश हजार योजन विस्तृत हैं (२८) । पुष्करिणियो
मे दो-दो रतिकर पवंत है, वे सब मिलाकर सोलह पुष्करिणियो के
वत्तीस रतिकर पर्वत हो जाते हैं (२९) । उन दधिमुख और रतिकर
पर्वतो पर अञ्जनगिरि के समान ही शाश्वत अर्हत् चैत्य हैं (३०) ।
द्वीप की चारो विदिशाओ मे तथा रतिकर पर्वत जो दश हजार
योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन ऊँचे हैं । वे सब
रत्नमय, दिव्य और झल्लरी के आकार वाले हैं (३१-३२) । दक्षिण
के दो रतिकर पर्वतो पर शक्र और ईशानेन्द्र के एवं उत्तर दिशाओ
मे पृथक्-पृथक् भुवन आठ दिशाओ मे आठ महादेवियों की राज-
धानियाँ है। वे लाख योजन लम्बी-चौडी और जिनायतनोसे भूपित
हैं। (३३-३४)
उनके नाम क्रमश १ सुजाता, २ सौमनसा, ३ अर्चिमाली,
४ प्रभाकरा, ५ पद्मा, ६ शिवा, ७ शुचि, ८ अजना, ९ चूता,
१० चूतावतंशिका, ११ गोस्तूपा, १२ मुदर्शना, १३ अमला,
१४ अप्सरा, १५ रोहिणी, १६ रत्ना, १७ रत्नोच्चया, १८ सर्व-
रत्नसञ्चया, १९ वसु, २० वसुमित्रिका, २१ वसुभागा, २२ वसु-
न्धरा, २३ नन्दोत्तरा, २४ नन्दोतर कुरु, २५ देवकुरु, २६ कृष्णा,
२७ कृष्णरात्रि, २८ रामा रामरक्षिता (३५-३६-३७-३८) हैं।
सर्व ऋद्धिवाले सपरिच्छद देवगण श्री तीर्थंकर-अर्हन्तो की
पुण्यतिथियो मे उन चैत्यो मे अष्टाह्निका महोत्सव करते हैं (३९)।
पूर्व के अञ्जनगिरि पर चार द्वार वाले जिनालय मे शास्वती
प्रतिमाओ का श
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काम्पिल्यपुर तीर्थ-कल्प १११
लक्ष्मी प्राप्त करते हैं (४६)। भक्ति से चैत्यो की वंदना करने वाले,
उसका स्तुति-स्तोत्र पाठ करने वाले, नन्दीश्वर सम्बन्धी अनुपर्व
का जो आराधन करते हैं वे शीघ्र संसार से तर जाते हैं (४७)।
प्राय. पूर्वाचार्यों के बनाये हुए इस नन्दीश्वर द्वीप कल्प को
श्री जिनप्रभाचार्य ने श्लोकबद्ध किया है (४८)।
श्री नन्दीश्वर द्वीप का कल्प समाप्त हुआ। इसके ग्रन्था ग्र०
श्लो० ४९ अक्षर १० परिमित है।
२५. काम्पिल्यपुर तीर्थ-कल्प
गंगामूल स्थित श्री विमलनाथ भगवान के जिनालय की मनो-
हर श्री वाले, काम्पिल्यपुर का कल्प मै सक्षेप से कहता हूँ।
इसी जम्बूद्वीप के दक्षिण भारत खण्ड मे पूर्व दिशा मे पाचाल
नामक जनपद है। वहाँ गंगा नामक महानदी की तरंगो से प्रक्षा-
लित प्राकार भित्ति वाला कंपिलपुर नामक नगर है। वहा तेरहवें
तीर्थंकर श्री विमलनाथ इक्ष्वाकु कुलदीपक महाराजा कृतवर्म के
नन्दन और सोमादेवी की कुक्षी रूपी सीप में मुक्ताफल के सदृश
उत्पन्न हुए। उनका लछन वाराह था और असली कंचनवर्णी देह
थी। उन्ही भगवान का यहाँ च्यवन-जन्म-राज्याभिषेक-दीक्षा और
केवलज्ञान लक्षणो से पाँच कल्याणक हुए हैं। इसीलिए उस प्रदेश
मे नगर का नाम पंचकल्याणक रूढ हो गया। वहाँ उन्ही भगवान
का शूकर लांछन होने के कारण देवो ने महिमा की और वह स्थान
शूकर क्षेत्र नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुआ।
इसी नगर मे हरिषेण नामक दशवाँ चक्रवर्त्ती हुआ तथा वार-
हवाँ सार्वभौम ब्रह्मदत्त चक्रवर्त्ती भी यही उत्पन्न हुआ।
श्री वीर प्रभु के निर्वाण से दो सौ बीस वर्ष बीतने पर
मिथिला नगरी के लक्ष्मीगृह चैत्य मे आचार्य महागिरि के कौडिन्य
नामक शिष्य के शिष्य अश्वमित्र ने अणुप्रवाद पूर्व के नेउण्णिय वस्तु
के छिन्न छेदनक वक्तव्यता के आलापक पढते हुए शंकाशील होकर
चतुर्थ निह्नव हुआ। वह समुच्छेदक दृष्टि प्ररूपणा करता हुआ
कपिलपुर आया। यहाँ खड नामक श्रमणोपासक रहता था और
वह गुल्कपाल था उसके भय से ....
यहाँ सजय नामक राजा था, वह शिकार के लिए केसर उद्यान
गया। वहाँ मृग को मारने पर निकट स्थित गर्दभालि अणगार से
बोध पाकर संविग्नतया प्रव्रजित होकर सद्गति प्राप्त हुआ।
इस नगर मे पृष्ठ चम्पाधिप साल महासाल का भाणेज और
पिठर-जसवती का पुत्र गागलिकुमार हुआ, जिसे मामा ने यहाँ से
बुला कर पृष्ठ चम्पा मे राज्याभिषिक्त किया और उन्होने गौतम-
स्वामी के पास दीक्षा ग्रहण की। काल-क्रम से गागलिकुमार भी
अपने माता-पिता के साथ गणधर श्री गौतम स्वामी के पास जिन-
दीक्षा लेकर सिद्ध हुआ।
इसी नगर मे दिव्य मुकुट रत्न प्रतिविम्बित मुखरूप से प्रसिद्ध
दुर्मुह नामक राजा ने कौमुदी-महोत्सव में इन्द्रकेतु-ध्वजको अलंकृत
विभूषित और महाजनो द्वारा ऋद्धि-सत्कार करते देखा और थोडे
दिन बाद उसे भूमि पर पडे हुए, पैरो से रौंदे जाते नष्ट होते देख
कर ऋद्धि का अनृद्धिस्वरूप विचार कर वह प्रत्येकबुद्ध हुआ।
अणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प ११३
इसी नगरी मे द्रुपद राजा की पुत्री महासती द्रौपदी पाँच
पाण्डवो को स्वयंवरा हुई ।
इसी नगर के राजा धर्मरुचि के अगुठो मे रहे रतनमय जिन-
विम्ब को नमस्कार करने के कारण पिशुन लोगो की प्रेरणा से
कुपित काशी नरेश ने विग्रह किया । धर्म के प्रभाव से वैश्रमण ने
सवलवाहन परचक्र को गगनमार्ग से काशी ले जाकर उद्धार
किया, वह उसी का सम्मानभाजन हुआ ।
इत्यादि अनेक सविधान रूपी रत्नो का निधान यह नगर
महातीर्थ है । भव्य लोग यहाँ तीर्थयात्रा कर जैनशासन की प्रभा-
वना करते हुए इहलोक-परलोक सुख और तीर्थङ्कर नाम कर्म
उपार्जन करते हैं ।
श्री जिनप्रभसूरि कहते हैं कि कम्पिलपुर प्रवर तीर्थ के इस
कल्प को पढते हुए श्रावक जन दुष्ट कर्म-शत्रुओ को नष्ट करे ।
श्री काम्पिल्यपुर-कल्प की श्लोक सख्या ३३ और ७ अक्षर है ।
२६. अणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प
अरिष्टनेमि भगवान को नमस्कार करके अणहिलपुरपत्तनाव-
तस ब्राह्मणगच्छनिश्रित श्री अरिष्टनेमि का कल्प कहता हू ।
पूर्वकाल मे कन्नौज नगर मे यक्ष नामक महर्द्धिसपन्न व्यापारी
था । वह एक वार व्यापार के निमित्त बहुत से वैलो का सार्थ, किराना
८
लेकर, कन्नौज के राजा की पुत्री महनिका को कञ्चुलि के सम्वन्ध मे दिए
गए कन्नौज से प्रतिवद्ध गुजरात देश के प्रति प्रस्थान कर क्रमशः
सरस्वती नदी तट पर लखाराम मे आकर ठहरा । पहले अणहिल-
वाड पाटण की वह मण्डी थी । व्यापारी को वहाँ सार्थसहित रहते
हुए वर्षाकाल आ गया, मेघ बरसने लगा । एक बार भाद्रपद
महीने मे बैलो का सारा सार्थ कही चला गया, किसी को पता
नही । जब सर्वत्र खोजने पर भी न मिला तो सर्वनाश की भाँति
अत्यन्त चिन्तातुर अवस्था मे उसे रात्रि के समय स्वप्न मे अम्बा-
देवी ने कहा—बेटा, जागते हो या सोते हो ? यक्ष सेठ ने कहा—
माँ, मुझे नीद कहाँ ? जिसका सर्वस्वभूत बैलो का सार्थ चला
गया । देवी ने कहा—भद्र ! इसी लखाराम मे इमली वृक्ष के नीचे
तीन प्रतिमाए हैं, तीन पुरुष खुदवा कर उन्हे ग्रहण करो । एक
प्रतिमा श्री अरिष्टनेमि प्रभु की, दूसरी पार्श्वनाथ भगवान की और
एक अम्बिका देवी की है। यक्ष ने कहा—भगवती ! इमली के वृक्ष तो
बहुत से हैं, अतः उस प्रदेश को कैसे जाना जाय ? देवी ने कहा—
धातुमय मण्डल और पुष्पो का ढेर जहाँ देखो उसी स्थान मे तीन
प्रतिमाओ को जान लेना । उन प्रतिमाओ को प्रकट करके पूजा
करने से तुम्हारे बैल स्वयमेव आ जावेंगे । उसके प्रात काल उठकर
पूजा, विधानपूर्वक वैसा करने से तीनो प्रतिमाए प्रकट हुई । विधि-
पूर्वक पूजा करते ही क्षण मात्र मे बैल आ गए । सेठ सन्तुष्ट हुआ,
क्रमशः वहा प्रासाद बनवा कर प्रतिमाए स्थापित की ।
अन्यदा वर्षाकाल बीतने पर अग्गहार गाँव से अठारह सौ पट-
गालिक गृहालंकृत ब्राह्मण गच्छ मण्डन श्री यशोभद्रसूरि खभात
नगर के विचरते हुए वहाँ आये । लोगो ने विनति की—भगवन् !
तीर्थ का उल्लघन कर के जाना नही कल्पता । तब उन सूरि महा-
राज ने वहाँ जिन-बिम्बो को वन्दन किया । मार्गशीर्ष पूर्णिमा के
दिन ध्वजारोपण महोत्सव किया । यह ध्वजारोपण महोत्सव विक्रम
अरिष्टनेमि-कल्प ११५
संवत् ५०२ बीतने पर हुआ था। आज भी प्रतिवर्ष उसी दिन ध्वजा-
रोपण किया जाता है।
विक्रम संवत् ८०२ मे अणहिल गोपालक के परीक्षित प्रदेश
लक्षाराम स्थान मे चाउक्कड़ (चापोट्कट)-चावडा वंश मुक्ताफल
राजा वनराज ने पाटण बसाया। वहाँ १ वनराज, २ जोगराज,
३ क्षेमराज, ४ भूअड, ५ वयरसीह, ६ रत्नादित्य, ७ सामन्तसिंह
नामके चावड़ा वंशीय सात राजा हुए। फिर उसी नगर मे चालुक्य
वंशी १ मूलराज, २ चामुण्डराज, ३ वल्लभराज, ४ दुर्लभराज, ५ भीम-
देव, ६ कर्ण, ७ जयसिंह देव, ८ कुमारपालदेव, ९ अजयदेव १०
मूलराज, ११ भीमदेव नामक ग्यारह राजा हुए। फिर वाघेला १
लवण प्रसाद, २ वीरधवल, ३ वीमलदेव, ४ अर्जुनदेव, ५ सारंगदेव,
६ कर्णदेव राजा हुए। इसके बाद गुजरात मे सुलतान अलाउद्दीन
आदि का शासन प्रवृत्त हो गया।
वे अरिष्टनेमि भगवान कोहडी-अम्बिका कृत प्रातिहार्य से
आज भी उसी प्रकार पूजे जाते हैं।
पुरातत्त्वविदो के मुख से श्रवण कर श्री जिनप्रभसूरि ने यह
अरिष्टनेमि-कल्प लिखा है, जो कल्याणकारी हो।
श्री अरिष्टनेमि-कल्प पूर्ण हुआ। यह ग्रन्थाग्रन्थ ३३
परिमित है।
११६ विविध तीर्थ-कल्प
२७. शंखपुर पार्श्वनाथ-कल्प
पूर्वकाल मे नौवाँ प्रतिवासुदेव जरासंध राजगृह नगर से समस्त
सेना के साथ नौवे वासुदेव कृष्ण से युद्ध करने के लिए पश्चिम
दिशा की ओर चला। कृष्ण भी समस्त सैन्य सामग्री सहित
द्वारिका से निकल कर उसके सन्मुख देश-सीमा पर आये। जहाँ
भगवान अरिष्टनेमि ने पाञ्चजन्य-शंख बजाया, वहाँ शंखेश्वर
नगर बसा। शंख के निनाद से क्षुब्ध जरासन्ध ने जरा नामक कुल-
देवी का आराधन कर कृष्ण की सेना मे जरा की विकुर्वणा की,
जिससे श्वास-कास रोग से अपनी सेना को पीड़ित देखकर व्याकुल
होकर श्रीकृष्ण ने भगवान अरिष्टनेमि से कहा—भगवन् ! मेरी
सेना कैसे निरुपद्रव होगी ? और मुझे कब जयश्री हस्तगत होगी ?
तब भगवान ने अवधिज्ञान का उपयोग देकर कहा—"पाताल मे
नागराज से पूज्यमान भावी तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ स्वामी की
प्रतिमा है, उसे यदि तुम अपनी देव-पूजा के समय पूजो तो सेना
निरुपद्रव होगी और तुम्हारी जीत भी होगी। यह सुन कर
विष्णु ने सात महीना तीन दिन मे और मतान्तर मे तीन दिन
निराहार रहकर पन्नगाधिराज की आराधना की, क्रमशः नागराज
वासुकि प्रत्यक्ष हुआ। तब कृष्ण ने भक्ति-बहुमानपूर्वक पार्श्वनाथ-
प्रतिमा की याचना की। नागराज ने उसे अर्पण की। फिर महो-
त्सवपूर्वक लाकर अपनी देव-पूजा मे स्थापित कर त्रिकाल पूजा
प्रारम्भ की। उसके न्हवण जल को समस्त सेना पर छींटने से
जरा-रोग-शोक-विघ्न निवृत्त होकर विष्णु की सेना मे समर्थता
आ गई। क्रमशः जरासन्ध की पराजय हुई। लोहासुर, गजासुर,
बाणासुर आदि सभी जीत लिए गए।
धरणेन्द्र-पद्मावती के सान्निध्य से वह प्रतिमा सकल विघ्ना-
पहारिणी, सकल ऋद्धि-जननी हुई। वह वही शंखपुर मे स्थापित
नाशिकपुर-कल्प ११७
की गई। कालान्तर में प्रच्छन्न होकर क्रमशः शखकूप मे प्रगट
हुई। आज पर्यन्त चैत्यग्रह मे सकल संघ द्वारा वह पूजी जाती है।
अनेक प्रकार के परचे-चमत्कार पूरे जाते हैं। तुर्क राजा लोक भी
वहाँ महिमा करते हैं।
कामित तीर्थ शखेश्वर स्थित पार्श्वनाथ जिनेश्वर की प्रतिमा
का यह कल्प मैने गीत के अनुसार लिखा है। ये शखेश्वराधीश्वर
पार्श्वनाथदेव कल्याणकल्पद्रुम हैं। भव्यात्माओ के देह मे और
घर में सदा (आरोग्य एव) लक्ष्मी करे।
श्री शंखपुर-कल्प के ग्रन्थाग्र० २२ और २४ अक्षर ऊपर है।
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२८. नाशिकपुर-कल्प
भव भय को दूर करने वाले श्री चन्द्रप्रभ जिनचन्द्र को वन्दन
करके मैं पापमलसमूह के नाशक नाशिकपुर का कल्प कहता हूँ।
नाशिकपुर तीर्थ की उत्पत्ति ब्राह्मणादि परतीर्थिक इस प्रकार
वर्णन करते हैं—पूर्वकाल मे एक बार नारद ऋषि ने भगवान
कमलासन से पूछा कि पुण्यभूमि कहाँ है ? कमलासन ने कहा—
जहाँ मेरा यह पद्म गिरे, वही पवित्र भूमिस्थान है ! एकदिन विरंचि
ने वह पद्म छोडा जो महाराष्ट्र जनपद भूमि के अरुणा-वरुणा-
गंगा महानदी विभूषित, नाना प्रकार की वनस्पति से मनोहर देव-
भूमि पर जा कर गिरा। वहाँ पद्मासन ने पद्मपुर नामक नगर
| ११८ | विविध तीर्थ-कल्प |
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वसाया। वहाँ कृतयुग मे पितामह ने यज्ञ प्रारभ किया, समस्त
देव एकत्र हुए। असुरो को बुलाने पर भी वे देवताओ के भय से
नही आये। उन्होने कहा—यदि भगवान् चन्द्रप्रभ स्वामी वहाँ
पधारे तो हम विश्वस्त होकर आवेगे! तब चित्त मे चमत्कृत
होकर जहाँ स्वामी विचरते थे, वहाँ जाकर चतुर्मुख ने करबद्ध
होकर नमस्कारपूर्वक कहा—भगवन्! वहाँ पधारिये, जिससे मेरा
कार्य सिद्ध हो। स्वामी ने कहा—मेरे प्रतिरूप-प्रतिमा से ही काम
सिद्ध हो जायगा। तब ब्रह्मा चन्द्रकान्तमणिमय विम्ब सौध-
र्मेन्द्र से प्राप्त कर वहाँ लाया। दानव लोग आये, यज्ञ महोत्सव
प्रारभ होकर सिद्ध हुआ। प्रजापति ने वहाँ चन्द्रप्रभ स्वामी का
मन्दिर बनवाया और नगर-द्वार पर नगर की रक्षा के लिए सुर
सुन्दर देव को स्थापित किया। इस प्रकार प्रथम युग—कृतयुग मे
पद्मपुर तीर्थ प्रसिद्ध हुआ।
त्रेतायुग मे दशरथनन्दन राम, सीता और लक्ष्मण के साथ
पितृ-आज्ञा से वनवास गये और गौतम-गङ्गा के तट पर पञ्चवटी
आश्रम मे फलाहारपूर्वक चिरकाल रहे। इसी वीच रावण की
बहिन मूर्पनखा वहाँ आयी। राम को देखकर अपने को ग्रहण
करने की प्रार्थना करने पर राम ने प्रतिषेध किया। लक्ष्मण के
पाम उपस्थित हुई, उसने उसकी नासिका काट ली, वहाँ नासिका-
पुर हुआ। क्रमश रावण ने सीता का अपहरण किया, राघव ने
युद्ध मे रावण को मारा और विभीषण को लका का राज्य दिया।
फिर अपने नगर के प्रति लौटते हुए राम ने चन्द्रप्रभस्वामी के
मन्दिर का उद्धार कराया। यह राम का उद्धार नासिकपुर मे
हुआ। कालान्तर मे पुण्यभूमि ज्ञात कर मिथिला से जनक राजा
आये, उन्होने वहाँ दस यज्ञ कराये। जनक-स्थान नाम से वह
नगर प्रसिद्ध हुआ।
नाशिकपुर-कल्प ११९
एक दिन गुक्र महाग्रह की पुत्री देवयानी को जनकस्थानपुर
मे खेलते हुए दण्डक राजा ने देखा । रूपवती होने के कारण वला-
त्कार से उसने उसका शीलभग किया । गुक्र महाग्रह को उसका
स्वरूप ज्ञात होने पर उसने रोषवश शाप दिया कि यह नगर
दण्डक राजा सहित सात दिन के भीतर राख का ढेर हो जायगा ।
नारद ऋषि को यह ज्ञात होने पर उसने दण्डक राजा को कहा ।
दण्डक राजा सुन कर भय के मारे सव लोगो को लेकर चन्द्रप्रभ
स्वामी के शरण में आया और शापमुक्त हुआ । उसके वाद नगर
का नाम “जगथाण” प्रसिद्ध हुआ । इस प्रकार परतीर्थी लोग भी
जिस तीर्थ का माहात्म्य बखानते हैं, तो जैन लोग क्यो नही
वर्णन करेंगे ।
इसके पश्चात् द्वापर वृग मे पाण्डु राजा की पत्नी कुन्ती देवी
ने प्रथम पुत्र युधिष्ठिर होने पर चन्द्रप्रभ स्वामी के प्रासाद को
जीर्ण देखकर उद्धार कराया, अपने हाथ से उसने वहाँ विल्व वृक्ष
रोपा । तब वह कुन्ती-विहार नाम से विख्यात हुआ । फिर द्वैपायन
ऋषि के द्वारा द्वारिका का दाह होने पर उपक्षीणप्राय यादव वंश
मे वज्रकुमार नामक यादव क्षत्रिय था जिसकी स्त्री गर्भवती थी ।
वह द्वारिका-दाह होते समय बहुभक्ति पूर्वक द्वैपायन ऋषि से
छूट कर चन्द्रप्रभ स्वामी के शरण मे आई । पूर्ण समय होने पर
वहाँ उसने पुण्यशाली पुत्र प्रसव किया । उसका नाम दृढप्रहारी
दिया गया । वह वाल्यकाल अतिक्रान्त कर तरुणावस्था मे महा-
रथी हो गया । वह अकेला ही लाख सुभटो के साथ युद्ध करने मे
समर्थ था । एक वार वहाँ चोरो ने गायो का हरण किया, उन सव
को अकेला दृढप्रहारो जीत कर लौटा लाया, इससे उसको अत्यन्त
पराक्रमी ज्ञात कर ब्राह्मण आदि नागरिको ने उसे तलार—नगर-
रक्षक पद दिया । उसने चोर डाकुओ का निग्रह किया और क्रमशः
१२० विविध तीर्थ-कल्प
उसी नगर का महाराजा हो गया । यादव वंश बीज का वहाँ
उद्धार हुआ जिससे उसने बहुमानपूर्वक चन्द्रप्रभ स्वामी के मन्दिर
का उद्धार कराया । इस प्रकार त्रेता युग का उद्धार हुआ, ऐसे
तीनो युगो मे वहाँ अनेक उद्धार हुए ।
वर्त्तमान कलिकाल मे श्री शान्तिसूरि ने उद्धार करवाया ।
पहले कल्याणकटक नगर मे परमर्दी नामक राजा राज्य करता
था । उस जिनेन्द्र भक्त ने वहाँ के प्रासाद मे चन्द्रकान्त मणिमय
विम्व सुनकर विचार किया कि मै इस प्रतिमा को अपने घर लाकर
गृह चैत्यालय मे पूजा करूंगा । नाशिक के नागरिको ने इसका
कथंचित् व्यतिकर जानकर ताम्रसम्पुट मे उस बिम्ब को निक्षिप्त
कर के ऊपर लेप कर दिया, लेपमय प्रतिमा हो गई । राजा ने
जिनालय मे आने पर जब उस प्रतिमा को न देखा तो लोगो से
पूछा । उनके यथास्थित कहने पर राजा ने सोचा—इस लेप को
भेदन कर मूल प्रतिमा को निकालूगा । फिर राजा ने उस मन्दिर
का उद्धार कराने के लिए चौवीस गाँव अर्पण किये । उसके द्रव्य
से देवाधिदेव पूजे जाते हैं ।
इसके बाद कितना ही समय बीतने पर निकटवर्त्ती त्र्यम्बक-
देवाधिष्ठित महादुर्ग ब्रह्मगिरि स्थित महल्लय क्षत्रिय जाति का
वाइओ नामक डाकू था जिसने प्रासाद को गिरा दिया । यह सुन
कर पल्लीवाल-वंशावतंश ईश्वर के पुत्र माणिक्य के जो नाऊ की
कुक्षि-सरोवर के राजहंस सदृश था—उस कुमारसिंह परम श्रावक
ने पुन भव्य प्रासाद करवाया । अपने न्यायोपार्जित द्रव्य को सफल
कर उसने अपने को भवसागर से पार किया ।
इस प्रकार अनेक उद्धार वाले नाशिक महातीर्थ की आज भी
यात्रा-महोत्सव करने के लिए चतुर्दिशाओ से सघ आकर आरा-
धना करता है । वे कलिकाल के दर्प को विनष्ट करने वाले भगवान
के शासन की प्रभावना करते हैं ।
हरिकंखी नगर स्थित पार्श्वनाथ-कल्प १२१
पौराणिक परमतीर्थ नाशिकपुर का यह कल्प है इसे वाचने-
पढने वालो को वांछित ऋद्धि सप्राप्त होती है।
कुछ अन्य दर्शनियो के मुख से कुछ जैन पुरातत्त्वविदो के
मुखँ से श्रवण कर श्री जिनप्रभसूरि ने नाशिकपुर का यह कल्प
लिखा है।
श्री नाशिक्यपुर का कल्प समाप्त हुआ। इसकी श्लोक-सख्या
५९ और २७ अक्षर हैं।
२९. हरिकंखीनगर स्थित पार्श्वनाथ-कल्प
हरिकंखी नगरी के चैत्य मे निविष्ट पार्श्वनाथ स्वामी को
नमस्कार करके कलिकाल के दर्प को नष्ट करने वाला वहाँ का
थोडा कल्प कहता हू।
गुर्जर धरा मे हरिकंखी नामका सुन्दर गाँव है। वहाँ उत्तुंग
शिखर वाले जिनालय मे प्रातिहार्यसन्निहित श्री पार्श्वनाय-प्रतिमा
भव्यजनो द्वारा विविध पूजाओ से त्रिकाल पूजी जाती है। एकवार
चालुक्यवशप्रदीप श्री भीमदेव के राज्य मे तुर्क मण्डल से सबल
सैन्य सहित आये हुए अतनुवुक्का नामक सलार ने अणहिलवाडा
पाटणगढ को भग किया। उसने वहाँ से लौटते हुए हरिकंखी
गाँव के चैत्य को देखा और प्रविष्ट होकर पार्श्वनाथ प्रतिमा को
भग्न कर डाला। उसके पश्चात् गाँव मे उपद्रव करके सलार
स्वस्थान की ओर चला गया।
१२४ विविध तीर्थ-कल्प
उपाश्रय माँगने के लिए आये हैं, जहाँ पर सूरि महाराज सपरि-
वार रह सके ।
उसने कहा - मैने उपाश्रय दिया, सूरि महाराज पधारें और
सुखपूर्वक रहे । पर केवल हम पाप निरतो को धर्मोपदेश न दें ।
साधुओ ने कहा—ऐसा हो होगा ! गुरु महाराज पधारे, वर्षाकाल
चातुर्मास रहे । वे स्वाध्याय करते और छट्ठ-अठ्ठमादि तप द्वारा
अपने शरीर का शोषण करते । क्रमशः वर्षाकाल बीतने पर वह
उन्हे विदा करने लगा और उनके सत्यप्रतिज्ञ गुण से प्रसन्न
होकर अपनी नगर-सीमा तक पहुँचाने के लिए चला । सीमा पर
पहुचने पर सूरिजी ने कहा—मेहर ! तुमने उपाश्रय देकर हमारा
बडा उपकार किया । अब हम आज कुछ धर्मोपदेश देगे, जिसने
प्रत्युपकार हो सके । मेहर ने कहा—मेरे से नियम का निर्वाह तो
नही होगा ! कुछ मन्त्राक्षर उपदेश करें ।
सूरि महाराज ने अनुकम्पा से उसे पच परमेष्ठि नमस्कार
महामन्त्र सिखाया और उसका जल-अग्नि-स्तभनादि प्रभाव भी बत-
लाया । फिर गुरु महाराज ने कहा—प्रतिदिन तुम शत्रुञ्जय की
दिशा मे प्रणाम करना । मेहर उनका कथन स्वीकार करके अपने
घर आ गया । सूरि महाराज अन्यत्र विचरने लगे । वह मेहर
क्रमश उस पञ्च परमेष्ठी मत्र का जाप करते हुए—नियम-निर्वाह
करते हुए काल निर्गमन करने लगा । अन्यदा उसकी पत्नी ने उसे
कलह करके घर से निकाल दिया । वह शत्रुञ्जय गिरिराज के
शिखर पर चढने लगा । जब वह मद्य से भरा पात्र हाथ मे लिए
वटवृक्ष की छाया मे मद्यपान करने के लिए बैठा तो गीध के मुँह
मे रहे हुए साँप के जहर की बूँदें मद्यपात्र मे आकर गिरी । उसने
यह देखकर विरक्त चित्त से मद्य त्याग दिया और ससार से विरक्त
होकर अनशन ग्रहण कर लिया । आदीश्वर भगवान के चरण
कमल एव नवकार मत्र को स्मरण करते हुए वह शुभ ध्यान से
कपर्दि यक्ष-कल्प १२५
कालधर्म प्राप्त हुआ। तीर्थ के माहात्म्य और नवकार मन्त्र के
प्रभाव से वह कवड्डि-(कपर्दि) यक्ष उत्पन्न हुआ। और अवधि ज्ञान
से अपना पूर्व भव देखकर आदीश्वर भगवान की पूजा करने
लगा। यह व्यतिकर सुनकर उसकी गृहिणी वहाँ आई और आत्म-
निन्दा करते हुए अनगनपूर्वक जिनेश्वर का स्मरण कर काल-धर्म
को प्राप्त हुई और उसी यक्ष का वाहन हाथी उत्पन्न हुई। कपर्दि
यक्ष के चारो हाथो मे पाश, अकुग, द्रव्य की थैली और वीजोरा
रहता है।
अवधिज्ञान से वह अपना पूर्वभाव ज्ञात कर महाराज के
चरणो मे आया और हाथ जोड़कर कहा—भगवन् ! आपके
प्रसाद से मैने यह ऋद्धि प्राप्त की है, अब मुझे कुछ कर्त्तव्य का
आदेश करे। गुरु महाराज ने कहा—तुम इसी तीर्थ पर नित्य
स्थित रहो और युगादिनाथ जिनेश्वर की त्रिकाल पूजा करना।
यात्रा के लिए आये हुए भव्य जीवो का मनोवाछित पूर्ण करना
और सकल सघ के विघ्नो को दूर करना।
यक्षाधिप गुरु-वचनो को स्वीकार कर उनकी चरण-वन्दना
करके विमलगिरि-शिखर पर गया और गुरु महाराज द्वारा उप-
दिष्ट कार्य करने लगा।
ये अम्बादेवी और यक्षराज कपर्दि के कल्पयुग्म श्री जिनप्रभ
सूरि ने वृद्ध-वचनानुसार लिखे हैं।
कपर्दि यक्ष-कल्प पूर्ण हुआ इसकी ग्रन्थ सख्या ४२ है।
१२२ विविध तीर्थ-कल्प
हरिकेली गाँव फिर से बसा, गोष्टिक श्रावक आये। भगवत
की भग्न प्रतिमा को देखकर परस्पर कहने लगे—अहो ! महान्
महत्त्वशाली भगवान का म्लेच्छो ने भंग कैसे कर दिया ? फिर
क्या भगवत की वैसी कला नही रही ?
उन लोगो के सोने पर अधिष्ठायक देव ने स्वप्न मे आदेश
दिया कि इस प्रतिमा के सभी टुकडो को एकत्र करके गर्भगृह मे
स्थापित कर कपाट बंध करके ताले लगा दो। छ मास तक इसी
तरह प्रतिपालन करना, उसके पश्चात् द्वार खोलकर प्रतिमा को
संपूर्ण अंगोपांग युक्त अखंड देखना। गोष्ठी लोगो ने भोग-पूजा
करके वैसा ही किया। पाँच मास बीतने पर छठे महीने के प्रारभ
मे उत्सुकता के वशीभूत होकर गोष्टिक लोगो ने द्वार खोल दिए।
उन्होने देखा भगवत के सम्पूर्ण अंगोपांग युक्त होने पर भी स्थान
स्थान पर मसे बने हुए है। उन लोगो ने तत्त्व-विचार न कर
सुथार को बुलाया। उसने टकी के द्वारा मसो को तोडना प्रारभ
किया तो मसो से रुधिर निकलने लगा। गोष्टिक लोगो ने भय-
भीत होकर भोग-पूजादि प्रारभ किया।
रात्रि मे अधिष्ठायक देव ने आदेश किया—तुम लोगो ने यह
गोभनीय कार्य नही किया कि छ मास पूर्ण हुए बिना ही द्वार
खोल डाला, फिर टंकिया भी चलाई। अब फिर जब तक अंतिम
मास पूर्ण हो हमारा द्वार बन्द कर दो। उन्होने उसी प्रकार
किया। छ मास के अनन्तर विधिपूर्वक द्वार खोल कर देखा तो
पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा को निरुपहत अखण्ड अङ्गोपाङ्ग-
युक्त पाया। केवल नख सूक्ति और अंगुष्ठ पर तुच्छ दाग रह गया
था। गोष्टिक लोग सन्तुष्ट होकर पूर्ववत् पूजा करने लगे। चारों
दिशाओ से संघ आकर यात्रा-महोत्सव करता है। इस प्रकार
चमत्कारी माहात्म्य के निधान श्री पार्श्वनाथ भगवान है।
कपर्द्दियक्ष-कल्प १२३
यह हरिकंखी नगर स्थित अश्वसेननन्दन पार्श्वनाथ भगवान
का कल्प संक्षेप से श्री जिनप्रभसूरि ने बनाया है।
हरिकंखी नगर स्थित श्री पार्श्वनाथ का कल्प संपूर्ण हुआ।
इसकी ग्रन्थ सख्या २५ है।
३० कपर्द्दियक्ष-कल्प
श्री शत्रुञ्जय शिखर पर स्थित श्री ऋषभदेव जिनेश्वर को
नमस्कार करके उन्ही के सेवक कपर्दि यक्ष का कल्प कहता हू।
वालवक जनपद मे पालीताना नामक नगर है। वहाँ कवड्डि-
कपर्दि नामक ग्राममहत्तर—सरपच प्रधान था। वह मद्य मास,
जीवहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमनादि पाप कार्यों मे आसक्त
चित्त था और अपने अनुरूप चेष्टावाली अणही नामक भार्या के
साथ विषय-सुख उपभोग करता हुआ काल निर्गमन करता था।
एक दिन वह मच पर बैठा था तब उसके घर साधु-युगल आये।
उसने भी देखकर उन्हे प्रणाम करते हुए हाथ जोड कर कहा—
भगवन् ! आपका किस कारण से पधारना, हुआ ? हमारे घर मे
दूध, दही, घी, तक्र आदि प्रचुर हैं, जो चाहिए, आज्ञा कीजिए।
साधुओ ने कहा—हम भिक्षा के लिए नही आये है, परन्तु हमारे
गुरु महाराज सपरिवार शत्रुञ्जय यात्रार्थ पधारे है। अब वर्षा-
काल आ गया और साधु-विहार अकल्प्य है, अतः तुम्हारे पास