विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प ११३
इसी नगरी मे द्रुपद राजा की पुत्री महासती द्रौपदी पाँच
पाण्डवो को स्वयंवरा हुई ।
इसी नगर के राजा धर्मरुचि के अगुठो मे रहे रतनमय जिन-
विम्ब को नमस्कार करने के कारण पिशुन लोगो की प्रेरणा से
कुपित काशी नरेश ने विग्रह किया । धर्म के प्रभाव से वैश्रमण ने
सवलवाहन परचक्र को गगनमार्ग से काशी ले जाकर उद्धार
किया, वह उसी का सम्मानभाजन हुआ ।
इत्यादि अनेक सविधान रूपी रत्नो का निधान यह नगर
महातीर्थ है । भव्य लोग यहाँ तीर्थयात्रा कर जैनशासन की प्रभा-
वना करते हुए इहलोक-परलोक सुख और तीर्थङ्कर नाम कर्म
उपार्जन करते हैं ।
श्री जिनप्रभसूरि कहते हैं कि कम्पिलपुर प्रवर तीर्थ के इस
कल्प को पढते हुए श्रावक जन दुष्ट कर्म-शत्रुओ को नष्ट करे ।
श्री काम्पिल्यपुर-कल्प की श्लोक सख्या ३३ और ७ अक्षर है ।
२६. अणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प
अरिष्टनेमि भगवान को नमस्कार करके अणहिलपुरपत्तनाव-
तस ब्राह्मणगच्छनिश्रित श्री अरिष्टनेमि का कल्प कहता हू ।
पूर्वकाल मे कन्नौज नगर मे यक्ष नामक महर्द्धिसपन्न व्यापारी
था । वह एक वार व्यापार के निमित्त बहुत से वैलो का सार्थ, किराना
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