विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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वसाया। वहाँ कृतयुग मे पितामह ने यज्ञ प्रारभ किया, समस्त
देव एकत्र हुए। असुरो को बुलाने पर भी वे देवताओ के भय से
नही आये। उन्होने कहा—यदि भगवान् चन्द्रप्रभ स्वामी वहाँ
पधारे तो हम विश्वस्त होकर आवेगे! तब चित्त मे चमत्कृत
होकर जहाँ स्वामी विचरते थे, वहाँ जाकर चतुर्मुख ने करबद्ध
होकर नमस्कारपूर्वक कहा—भगवन्! वहाँ पधारिये, जिससे मेरा
कार्य सिद्ध हो। स्वामी ने कहा—मेरे प्रतिरूप-प्रतिमा से ही काम
सिद्ध हो जायगा। तब ब्रह्मा चन्द्रकान्तमणिमय विम्ब सौध-
र्मेन्द्र से प्राप्त कर वहाँ लाया। दानव लोग आये, यज्ञ महोत्सव
प्रारभ होकर सिद्ध हुआ। प्रजापति ने वहाँ चन्द्रप्रभ स्वामी का
मन्दिर बनवाया और नगर-द्वार पर नगर की रक्षा के लिए सुर
सुन्दर देव को स्थापित किया। इस प्रकार प्रथम युग—कृतयुग मे
पद्मपुर तीर्थ प्रसिद्ध हुआ।
त्रेतायुग मे दशरथनन्दन राम, सीता और लक्ष्मण के साथ
पितृ-आज्ञा से वनवास गये और गौतम-गङ्गा के तट पर पञ्चवटी
आश्रम मे फलाहारपूर्वक चिरकाल रहे। इसी वीच रावण की
बहिन मूर्पनखा वहाँ आयी। राम को देखकर अपने को ग्रहण
करने की प्रार्थना करने पर राम ने प्रतिषेध किया। लक्ष्मण के
पाम उपस्थित हुई, उसने उसकी नासिका काट ली, वहाँ नासिका-
पुर हुआ। क्रमश रावण ने सीता का अपहरण किया, राघव ने
युद्ध मे रावण को मारा और विभीषण को लका का राज्य दिया।
फिर अपने नगर के प्रति लौटते हुए राम ने चन्द्रप्रभस्वामी के
मन्दिर का उद्धार कराया। यह राम का उद्धार नासिकपुर मे
हुआ। कालान्तर मे पुण्यभूमि ज्ञात कर मिथिला से जनक राजा
आये, उन्होने वहाँ दस यज्ञ कराये। जनक-स्थान नाम से वह
नगर प्रसिद्ध हुआ।