विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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काम्पिल्यपुर तीर्थ-कल्प १११
लक्ष्मी प्राप्त करते हैं (४६)। भक्ति से चैत्यो की वंदना करने वाले,
उसका स्तुति-स्तोत्र पाठ करने वाले, नन्दीश्वर सम्बन्धी अनुपर्व
का जो आराधन करते हैं वे शीघ्र संसार से तर जाते हैं (४७)।
प्राय. पूर्वाचार्यों के बनाये हुए इस नन्दीश्वर द्वीप कल्प को
श्री जिनप्रभाचार्य ने श्लोकबद्ध किया है (४८)।
श्री नन्दीश्वर द्वीप का कल्प समाप्त हुआ। इसके ग्रन्था ग्र०
श्लो० ४९ अक्षर १० परिमित है।
२५. काम्पिल्यपुर तीर्थ-कल्प
गंगामूल स्थित श्री विमलनाथ भगवान के जिनालय की मनो-
हर श्री वाले, काम्पिल्यपुर का कल्प मै सक्षेप से कहता हूँ।
इसी जम्बूद्वीप के दक्षिण भारत खण्ड मे पूर्व दिशा मे पाचाल
नामक जनपद है। वहाँ गंगा नामक महानदी की तरंगो से प्रक्षा-
लित प्राकार भित्ति वाला कंपिलपुर नामक नगर है। वहा तेरहवें
तीर्थंकर श्री विमलनाथ इक्ष्वाकु कुलदीपक महाराजा कृतवर्म के
नन्दन और सोमादेवी की कुक्षी रूपी सीप में मुक्ताफल के सदृश
उत्पन्न हुए। उनका लछन वाराह था और असली कंचनवर्णी देह
थी। उन्ही भगवान का यहाँ च्यवन-जन्म-राज्याभिषेक-दीक्षा और
केवलज्ञान लक्षणो से पाँच कल्याणक हुए हैं। इसीलिए उस प्रदेश
मे नगर का नाम पंचकल्याणक रूढ हो गया। वहाँ उन्ही भगवान