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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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१०८ विविध तीर्थ-कल्प

२४. नन्दीश्वरद्वीप-कल्प

इन्द्रादि द्वारा पूजित चरणो वाले श्री जिनेश्वरों की आराधना
करके विश्वपावन श्री नन्दीश्वर द्वीप का कल्प कहता हूँ (१) ।
नन्दीश्वर स्वर्ग के समान आठवाँ द्वीप है जो नन्दीश्वर नामक
समुद्र से घिरा हुआ है (२) । यह गोलाई विष्कंभ से तेसठ कोटा-
कोटि और चौरासी लाख योजन है (३) । ये विविध विन्यास युक्त
उद्यानो वाली देव-भोगभूमि है और जिनेश्वर भगवान की पूजा
के हेतु देवो के आवागमन से सुन्दर है (४) । इसके मध्यप्रदेश मे
क्रमश पूर्वादि दिशाओ मे अंजन वर्ण वाले चार अंजन गिरि हैं
(५) । वे दश हजार योजन विस्तार भूमि और हजार योजन ऊँचे
छोटे मेरुओ सहित है (६)। वहाँ पूर्व मे देवरमण, दक्षिण में नित्यो-
द्योत, पश्चिम मे स्वयंप्रभ और उत्तर मे रमणीय (नामक) हैं
(७) । उन पर नौ योजन लम्बे और उससे आधे चौडे व वहत्तर
योजन ऊँचे अर्हत् चैत्य हैं (८) । चारो के पृथक् पृथक् द्वार सोलह
योजन ऊँचे हैं उनका प्रवेश आठ योजन है (९) । वे देव, असुर,
नाग आदि देवताओ के आश्रय से उन्ही के नामो से प्रसिद्ध हैं
(१०) । उनमे सोलह योजन लंबी उतनी ही चौडी और आठ योजन
ऊँची मणिपीठिकाएँ हैं (११) । पीठिकाओं पर सर्वरत्नमय देव-
छंदक हैं जो पीठिकाओ अधिक लंबे और ऊँचे हैं (१२) । उनमे
ऋषभ, वर्द्धमान, चन्द्रानन और वारिषेण नामक पद्मासन संस्थित
स्व स्वपरिवार युक्त प्रत्येक की १०८ रत्नमय शाश्वत अर्हन्त
प्रतिमाएँ हैं (१३-१४) । दो-दो नागयक्ष भूतो की कुण्डलधारिणी
प्रतिमाएँ पथक् पृथक् हैं, प्रतिमाओं के पीछे एक एक छत्रधारिणी
प्रतिमाएँ हैं (१५) । उनमे धूप घटी पुष्पमाला, घण्टा, अष्टमङ्गल,
ध्वजा, छत्र, तोरण, चंगेरी, पटल आसन है (१६) । पूर्ण कलशादि
सोलह अलङ्करण हैं, वहाँ की भूमियाँ सोने चाँदी की वालुकामय