विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिष्ठान पत्तन-कल्प १०७
यहाँ राजा के अनुरोध से कपिल, आत्रेय, बृहस्पति और
पाचाल ने अपने बनाये हुए चार लाख श्लोक परिमित ग्रन्थो को
एक श्लोक मे प्रस्तुत किया था। वह श्लोक यह है—
“जीर्णे भोजनमात्रेय कपिल प्राणिना दया।
वृहस्पतिरविश्वास पञ्चाल स्त्रीषु मार्दवम् ॥”
जीर्ण होने पर भोजन करना आत्रेय का, कपिल का प्राणियो
पर दया करना, विश्वास न करना बृहस्पति का एवं स्त्रियो से
कोमल व्यवहार करना पाचाल का सिद्धान्त है।
यहाँ दृष्टि से अमृत वर्षाने वाली सम्यग्दृष्टि मयूरो के लिए
पयोद घटा के सदृश श्री मुनिसुव्रत स्वामी की लेप्यमयी जीवित
स्वामी प्रतिमा जयवन्त है। उसको उस समय ग्यारह लाख अठावन
हजार आठ सौ छप्पन वर्ष हो गये।
यहाँ मुनिसुव्रत-जिनालयँ की यात्रार्थ आकर विविध पूजा
करते भव्य जन ऐहिक और पारलौकिक सुख सपत्ति प्राप्त करते हैं।
इस प्रासाद मे अन्य जिनेश्वरो के साक्षात् कान्ति वाले लेप्यमय
विम्व सुशोभित हैं जो मनुष्यो की प्रीति मे वृद्धि करते हैं।
अम्बादेवी, क्षेत्रपाल, यक्षाधिपति कर्पर्दि इस चैत्य मे वसते
हुए श्रीसंघ के उपसर्गों को नष्ट करते है।
यहाँ देवताओ के समूह से हर्षपूर्वक वद्यमान प्राणि-समूह का
उपकार करने के व्रतवाले चैत्य लक्ष्मी के भूषण श्री मुनिसुव्रत
भगवान आपका सदा कल्याण करने वाले हो।
सत्पुरुषो की सम्पत्ति के लिए श्री जिनप्रभसूरि ने श्री प्रतिष्ठान
तीर्थ का यह कल्प बनाया।
श्री प्रतिष्ठान पत्तन कल्प के ग्रन्थाग्र १९ और अक्षर १५
परिमित है।