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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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हैं (१७) । आयतन के प्रमाण से रुचिर मुख्य मण्डप, प्रक्षामण्डप,
अक्षवाटक और मणि पीठिकाएँ हैं (१८) । रम्य स्तूप प्रतिमाएँ और
सुन्दर चैत्य वृक्ष हैं, इन्द्रध्वज और दिव्य पुष्करिणियाँ यथा क्रम
हैं (१९) । चतुर्द्वार स्तूपो मे सब मे सोलह सोलह प्रतिमाएँ है, इस
प्रकार वे एक सौ आठ युक्त चौबीस सौ हो जाती हैं (२०) । प्रत्येक
अञ्जनगिरि के चारो दिशाओ मे लक्ष योजन जाने पर बिना मत्स्य
वाले स्वच्छ जल युक्त हजार योजन ऊँची, लाख योजन विस्तीर्ण
सोलह पुष्करिणी है जिनके नाम क्रमश इस प्रकार है (२१-२२) ।
१ नन्दिषेणा, २ अमोघा, ३ गोस्तूपा, ४ सुदर्शना, ५ नन्दोत्तरा,
६ नन्दा, ७ सुनन्दा, ८ नन्दिवर्द्धना, ९ भद्रा, १० विशाला,
११ कुमुदा, १२ पुण्डरीकिणी, १३ विजया, १४ वैजयन्ती,
१५ जयन्ती, १६ अपराजिता । (२३-२४)
इनकी प्रत्येक की लम्बाई और चौडाई पाँच सौ-पाँच योजन
है (२५) । लाख-लाख योजन लम्बे महा उद्यान हैं जिनके अगोक,
सप्तपर्ण, चम्पक, आम्र आदि नाम हैं । (२६)
पुष्करिणीयो के मध्य मे स्फटिक के पल्यमूर्त्ति वाले ललाम
वेदी उद्यानादि चित्र युक्त दधिमुख पर्वत हैं (२७) । वे चौसठ
हजार योजन ऊँचे और एक हजार योजन ऊपर की अवगाहना
वाले और नीचे से दश हजार योजन विस्तृत हैं (२८) । पुष्करिणियो
मे दो-दो रतिकर पवंत है, वे सब मिलाकर सोलह पुष्करिणियो के
वत्तीस रतिकर पर्वत हो जाते हैं (२९) । उन दधिमुख और रतिकर
पर्वतो पर अञ्जनगिरि के समान ही शाश्वत अर्हत् चैत्य हैं (३०) ।
द्वीप की चारो विदिशाओ मे तथा रतिकर पर्वत जो दश हजार
योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन ऊँचे हैं । वे सब
रत्नमय, दिव्य और झल्लरी के आकार वाले हैं (३१-३२) । दक्षिण
के दो रतिकर पर्वतो पर शक्र और ईशानेन्द्र के एवं उत्तर दिशाओ
मे पृथक्-पृथक् भुवन आठ दिशाओ मे आठ महादेवियों की राज-