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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 442 में से

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पृष्ठ 195

का शूकर लांछन होने के कारण देवो ने महिमा की और वह स्थान
शूकर क्षेत्र नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुआ।
इसी नगर मे हरिषेण नामक दशवाँ चक्रवर्त्ती हुआ तथा वार-
हवाँ सार्वभौम ब्रह्मदत्त चक्रवर्त्ती भी यही उत्पन्न हुआ।
श्री वीर प्रभु के निर्वाण से दो सौ बीस वर्ष बीतने पर
मिथिला नगरी के लक्ष्मीगृह चैत्य मे आचार्य महागिरि के कौडिन्य
नामक शिष्य के शिष्य अश्वमित्र ने अणुप्रवाद पूर्व के नेउण्णिय वस्तु
के छिन्न छेदनक वक्तव्यता के आलापक पढते हुए शंकाशील होकर
चतुर्थ निह्नव हुआ। वह समुच्छेदक दृष्टि प्ररूपणा करता हुआ
कपिलपुर आया। यहाँ खड नामक श्रमणोपासक रहता था और
वह गुल्कपाल था उसके भय से ....
यहाँ सजय नामक राजा था, वह शिकार के लिए केसर उद्यान
गया। वहाँ मृग को मारने पर निकट स्थित गर्दभालि अणगार से
बोध पाकर संविग्नतया प्रव्रजित होकर सद्गति प्राप्त हुआ।
इस नगर मे पृष्ठ चम्पाधिप साल महासाल का भाणेज और
पिठर-जसवती का पुत्र गागलिकुमार हुआ, जिसे मामा ने यहाँ से
बुला कर पृष्ठ चम्पा मे राज्याभिषिक्त किया और उन्होने गौतम-
स्वामी के पास दीक्षा ग्रहण की। काल-क्रम से गागलिकुमार भी
अपने माता-पिता के साथ गणधर श्री गौतम स्वामी के पास जिन-
दीक्षा लेकर सिद्ध हुआ।
इसी नगर मे दिव्य मुकुट रत्न प्रतिविम्बित मुखरूप से प्रसिद्ध
दुर्मुह नामक राजा ने कौमुदी-महोत्सव में इन्द्रकेतु-ध्वजको अलंकृत
विभूषित और महाजनो द्वारा ऋद्धि-सत्कार करते देखा और थोडे
दिन बाद उसे भूमि पर पडे हुए, पैरो से रौंदे जाते नष्ट होते देख
कर ऋद्धि का अनृद्धिस्वरूप विचार कर वह प्रत्येकबुद्ध हुआ।