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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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अरिष्टनेमि-कल्प ११५

संवत् ५०२ बीतने पर हुआ था। आज भी प्रतिवर्ष उसी दिन ध्वजा-
रोपण किया जाता है।
विक्रम संवत् ८०२ मे अणहिल गोपालक के परीक्षित प्रदेश
लक्षाराम स्थान मे चाउक्कड़ (चापोट्कट)-चावडा वंश मुक्ताफल
राजा वनराज ने पाटण बसाया। वहाँ १ वनराज, २ जोगराज,
३ क्षेमराज, ४ भूअड, ५ वयरसीह, ६ रत्नादित्य, ७ सामन्तसिंह
नामके चावड़ा वंशीय सात राजा हुए। फिर उसी नगर मे चालुक्य
वंशी १ मूलराज, २ चामुण्डराज, ३ वल्लभराज, ४ दुर्लभराज, ५ भीम-
देव, ६ कर्ण, ७ जयसिंह देव, ८ कुमारपालदेव, ९ अजयदेव १०
मूलराज, ११ भीमदेव नामक ग्यारह राजा हुए। फिर वाघेला १
लवण प्रसाद, २ वीरधवल, ३ वीमलदेव, ४ अर्जुनदेव, ५ सारंगदेव,
६ कर्णदेव राजा हुए। इसके बाद गुजरात मे सुलतान अलाउद्दीन
आदि का शासन प्रवृत्त हो गया।
वे अरिष्टनेमि भगवान कोहडी-अम्बिका कृत प्रातिहार्य से
आज भी उसी प्रकार पूजे जाते हैं।
पुरातत्त्वविदो के मुख से श्रवण कर श्री जिनप्रभसूरि ने यह
अरिष्टनेमि-कल्प लिखा है, जो कल्याणकारी हो।
श्री अरिष्टनेमि-कल्प पूर्ण हुआ। यह ग्रन्थाग्रन्थ ३३
परिमित है।