विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलेकर, कन्नौज के राजा की पुत्री महनिका को कञ्चुलि के सम्वन्ध मे दिए
गए कन्नौज से प्रतिवद्ध गुजरात देश के प्रति प्रस्थान कर क्रमशः
सरस्वती नदी तट पर लखाराम मे आकर ठहरा । पहले अणहिल-
वाड पाटण की वह मण्डी थी । व्यापारी को वहाँ सार्थसहित रहते
हुए वर्षाकाल आ गया, मेघ बरसने लगा । एक बार भाद्रपद
महीने मे बैलो का सारा सार्थ कही चला गया, किसी को पता
नही । जब सर्वत्र खोजने पर भी न मिला तो सर्वनाश की भाँति
अत्यन्त चिन्तातुर अवस्था मे उसे रात्रि के समय स्वप्न मे अम्बा-
देवी ने कहा—बेटा, जागते हो या सोते हो ? यक्ष सेठ ने कहा—
माँ, मुझे नीद कहाँ ? जिसका सर्वस्वभूत बैलो का सार्थ चला
गया । देवी ने कहा—भद्र ! इसी लखाराम मे इमली वृक्ष के नीचे
तीन प्रतिमाए हैं, तीन पुरुष खुदवा कर उन्हे ग्रहण करो । एक
प्रतिमा श्री अरिष्टनेमि प्रभु की, दूसरी पार्श्वनाथ भगवान की और
एक अम्बिका देवी की है। यक्ष ने कहा—भगवती ! इमली के वृक्ष तो
बहुत से हैं, अतः उस प्रदेश को कैसे जाना जाय ? देवी ने कहा—
धातुमय मण्डल और पुष्पो का ढेर जहाँ देखो उसी स्थान मे तीन
प्रतिमाओ को जान लेना । उन प्रतिमाओ को प्रकट करके पूजा
करने से तुम्हारे बैल स्वयमेव आ जावेंगे । उसके प्रात काल उठकर
पूजा, विधानपूर्वक वैसा करने से तीनो प्रतिमाए प्रकट हुई । विधि-
पूर्वक पूजा करते ही क्षण मात्र मे बैल आ गए । सेठ सन्तुष्ट हुआ,
क्रमशः वहा प्रासाद बनवा कर प्रतिमाए स्थापित की ।
अन्यदा वर्षाकाल बीतने पर अग्गहार गाँव से अठारह सौ पट-
गालिक गृहालंकृत ब्राह्मण गच्छ मण्डन श्री यशोभद्रसूरि खभात
नगर के विचरते हुए वहाँ आये । लोगो ने विनति की—भगवन् !
तीर्थ का उल्लघन कर के जाना नही कल्पता । तब उन सूरि महा-
राज ने वहाँ जिन-बिम्बो को वन्दन किया । मार्गशीर्ष पूर्णिमा के
दिन ध्वजारोपण महोत्सव किया । यह ध्वजारोपण महोत्सव विक्रम