विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाशिकपुर-कल्प ११७
की गई। कालान्तर में प्रच्छन्न होकर क्रमशः शखकूप मे प्रगट
हुई। आज पर्यन्त चैत्यग्रह मे सकल संघ द्वारा वह पूजी जाती है।
अनेक प्रकार के परचे-चमत्कार पूरे जाते हैं। तुर्क राजा लोक भी
वहाँ महिमा करते हैं।
कामित तीर्थ शखेश्वर स्थित पार्श्वनाथ जिनेश्वर की प्रतिमा
का यह कल्प मैने गीत के अनुसार लिखा है। ये शखेश्वराधीश्वर
पार्श्वनाथदेव कल्याणकल्पद्रुम हैं। भव्यात्माओ के देह मे और
घर में सदा (आरोग्य एव) लक्ष्मी करे।
श्री शंखपुर-कल्प के ग्रन्थाग्र० २२ और २४ अक्षर ऊपर है।
◼
२८. नाशिकपुर-कल्प
भव भय को दूर करने वाले श्री चन्द्रप्रभ जिनचन्द्र को वन्दन
करके मैं पापमलसमूह के नाशक नाशिकपुर का कल्प कहता हूँ।
नाशिकपुर तीर्थ की उत्पत्ति ब्राह्मणादि परतीर्थिक इस प्रकार
वर्णन करते हैं—पूर्वकाल मे एक बार नारद ऋषि ने भगवान
कमलासन से पूछा कि पुण्यभूमि कहाँ है ? कमलासन ने कहा—
जहाँ मेरा यह पद्म गिरे, वही पवित्र भूमिस्थान है ! एकदिन विरंचि
ने वह पद्म छोडा जो महाराष्ट्र जनपद भूमि के अरुणा-वरुणा-
गंगा महानदी विभूषित, नाना प्रकार की वनस्पति से मनोहर देव-
भूमि पर जा कर गिरा। वहाँ पद्मासन ने पद्मपुर नामक नगर