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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

११६ विविध तीर्थ-कल्प
२७. शंखपुर पार्श्वनाथ-कल्प
पूर्वकाल मे नौवाँ प्रतिवासुदेव जरासंध राजगृह नगर से समस्त
सेना के साथ नौवे वासुदेव कृष्ण से युद्ध करने के लिए पश्चिम
दिशा की ओर चला। कृष्ण भी समस्त सैन्य सामग्री सहित
द्वारिका से निकल कर उसके सन्मुख देश-सीमा पर आये। जहाँ
भगवान अरिष्टनेमि ने पाञ्चजन्य-शंख बजाया, वहाँ शंखेश्वर
नगर बसा। शंख के निनाद से क्षुब्ध जरासन्ध ने जरा नामक कुल-
देवी का आराधन कर कृष्ण की सेना मे जरा की विकुर्वणा की,
जिससे श्वास-कास रोग से अपनी सेना को पीड़ित देखकर व्याकुल
होकर श्रीकृष्ण ने भगवान अरिष्टनेमि से कहा—भगवन् ! मेरी
सेना कैसे निरुपद्रव होगी ? और मुझे कब जयश्री हस्तगत होगी ?
तब भगवान ने अवधिज्ञान का उपयोग देकर कहा—"पाताल मे
नागराज से पूज्यमान भावी तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ स्वामी की
प्रतिमा है, उसे यदि तुम अपनी देव-पूजा के समय पूजो तो सेना
निरुपद्रव होगी और तुम्हारी जीत भी होगी। यह सुन कर
विष्णु ने सात महीना तीन दिन मे और मतान्तर मे तीन दिन
निराहार रहकर पन्नगाधिराज की आराधना की, क्रमशः नागराज
वासुकि प्रत्यक्ष हुआ। तब कृष्ण ने भक्ति-बहुमानपूर्वक पार्श्वनाथ-
प्रतिमा की याचना की। नागराज ने उसे अर्पण की। फिर महो-
त्सवपूर्वक लाकर अपनी देव-पूजा मे स्थापित कर त्रिकाल पूजा
प्रारम्भ की। उसके न्हवण जल को समस्त सेना पर छींटने से
जरा-रोग-शोक-विघ्न निवृत्त होकर विष्णु की सेना मे समर्थता
आ गई। क्रमशः जरासन्ध की पराजय हुई। लोहासुर, गजासुर,
बाणासुर आदि सभी जीत लिए गए।
धरणेन्द्र-पद्मावती के सान्निध्य से वह प्रतिमा सकल विघ्ना-
पहारिणी, सकल ऋद्धि-जननी हुई। वह वही शंखपुर मे स्थापित