विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
मिथिलातीर्थ-कल्प ७१
अपनी शक्ति से जो इस गिरि को वन्दन करते है वे अचल
उदय को प्राप्त करते है—ऐसा भगवान महावीर ने वर्णन किया,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२१)
प्रभु के कहे हुए पुण्डरीक अध्ययन को गौतम द्वारा पढने से
(बोध पाकर) तिर्यंक जृम्भिकदेव दशपूर्वी वज्रस्वामी हुए, उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२२)
जहाँ जिनेश्वरो का स्तवन कर लौटते श्रीगौतम स्वामी ने
पन्द्रह सौ तापसो को दीक्षित किया उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (२३)
इस प्रकार अष्टापद पर्वत के समान अष्टापदमय चिरस्थायी
महातीर्थ वर्णन किया गया हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय
हो । (२४)
यह अष्टापद महातीर्थ-कल्प समाप्त हुआ, यह श्रीधर्मघोष
सूरि की रचना हैं। इसके ग्रन्थाग्र० ३० और २२ अक्षर सख्या है।
१९. मिथिलातीर्थ-कल्प
देवताओसे प्रणत श्री मल्लिनाथ और नमिनाथ जिनेश्वर के
चरणकमलो मे प्रणाम कर के मैं मिथिला महानगरी का कल्प
लेशमात्र कहता हूँ ।
इसी भारतवर्ष मे पूर्व देश मे विदेह नामक जनपद है तो
वर्त्तमान काल मे तिरहुत देश कहलाता है। वहाँ प्रत्येक घर मे
७२ विविध तीर्थ-कल्प
मधुर मञ्जुला फलो के भार से नत कदलीवन दृष्टिगोचर होते
हैं। पथिक लोग भी दूध मे सिद्ध हुए चिउडा और क्षीर का भोजन
करते हैं। पद-पद पर मीठे पानी वाली वापी, कूप, तालाव और
नदियाँ हैं। प्राकृत—ग्राम्य जन भी सस्कृत भाषा विगारद, अनेक
शास्त्रो के प्रशस्त विद्वान् और अतिनिपुण लोग हैं। वहाँ ऋद्धि
से समृद्ध मिथिला नामक नगरी थी जो वर्त्तमान मे जगई नाम से
प्रसिद्ध है। इसके निकट ही जनक महाराजा के भ्राता कनक का
निवासस्थान कनकपुर है।
इस मिथिला नामक नगरी मे कुम्भ राजा और प्रभावती की
कुक्षी से सभूत भगवान मल्लिनाथ स्त्रीतीर्थंकर और विजयनृप-
वप्रादेवी के नन्दन नमि जिनेश्वर का च्यवन, जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए हैं।
यहाँ श्री वीर प्रभु के अष्टम गणधर अकम्पित का जन्म
हुआ है।
यहाँ जुगवाहु-मय णरेहा के पुत्र नमी नामक महाराजा वलय—
चूडियो के शब्द से प्रत्येकबुद्ध हुए और सौधर्मेन्द्र परीक्षित वैराग्य
निश्चय वाले हुए।
यहाँ ही लक्ष्मीगृह चैत्य मे आर्य महागिरि के शिष्य कौण्डिन्य-
गोत्रीय अश्वमित्र श्री वीर-निर्वाण के दो सौ वीस (२२०) वर्ष
बीतने पर अणुप्रवाद पूर्व मे रही हुई नैपुणिका वस्तु को पढते हुए
श्रद्धाहीन हो गया। प्रवचन-स्थविरो द्वारा अनेकान्तिक युक्तियो
से समझाकर मना करने पर भी वह उत्सूत्र प्ररूपणा कर चतुर्थ
निह्नव हुआ।
श्री महावीर स्वामी के पद-पङ्कजो से पवित्रित जल वाली
वाणगगा और गडकी नदियो का सगम इस नगरी को पावन
करता है।
रत्नवाहपुर-कल्प ७३
यहाँ चरम तीर्थङ्कर-श्री महावीर भगवान ने वर्षाकाल
विताया था।
यहाँ जनकसुता महासती सीता की जन्मभूमि का स्थान
विगाल वट विटपी प्रसिद्ध है।
यहाँ श्री राम-सीताका विवाह-स्थान साकल्लकुण्ड नाम से
लोक मे रूढ है। और यहाँ पाताललिङ्ग आदि अनेक लौकिक
तीर्थ भी विद्यमान हैं।
यहाँ मल्लिनाथ चैत्य मे वैरुंट्या देवी, कुबेर यक्ष एव नमिनाथ
चैत्य मे गधारी देवी और भृकुटि यक्ष आराधक जनो के विघ्न
अपहरण करते हैं।
जिनमार्ग मे स्थित जो लोग इस मिथिला कल्प को सुनते और
पढते हैं, उनके कण्ठ मे मुक्ति श्रीवरमाला डालती है। ('जिणपह'
शब्द से कल्प रचयिता श्री जिनप्रभ सूरि का नाम भी समझना
चाहिए)।
श्री मिथिला तीर्थ का कल्प समाप्त हुआ। यह ग्रन्थाग्रं० ३४
अक्षर १८ परिमित है।
■
२०. रत्नवाहपुर-कल्प
श्री रत्नवाहपुर स्थित श्री धर्मनाथ भगवान को नमस्कार
करके उसी पुर-रत्न का कल्प किंचित् करता हूँ। इसी जम्बूद्वीप
नामक द्वीप मे भारतवर्ष के कोगल जनपद मे नानाजातीय उच्च-
७४ विविध तीर्थ-कल्प
स्तरीय शाखा वाले बहुल दलकुसुम-फलाच्छादित, सूर्य-रश्मि
अगम्य गहन वन मण्डित, निर्मल-शीतल वाले निर्झर, घर्घर नद से
मनोहर रत्नवाह नामक नगर है। वहाँ इक्ष्वाकु कुल दीपक स्वर्ण
वर्ण और वज्र लाञ्छन युक्त ४५ धनुष प्रमाण देह वाले पन्द्रहवे
तीर्थङ्कर विजयविमान से अवतीर्ण होकर भानु नरेन्द्र के घर
सुव्रता देवी की कुक्षी से पुत्ररूप मे अवतरित हुए और गुरुजनो
द्वारा धर्मनाथ नाम रखा गया। उनके जन्म-दीक्षा और केवलज्ञान
कल्याणक भी यही हुए और समेत शिखर पर निर्वाण हुआ। इसी
नगर मे लोगो के नेत्रो को शीतलता प्रदान करने वाला, नाग-
कुमार देव द्वारा अधिष्ठित श्री धर्मनाथस्वामी का चैत्य समय
आने पर बना।
उस नगर मे एक कुम्भार अपने शिल्प मे निष्णात था।
उसका पुत्र तरुणावस्था प्राप्त करके भी क्रीडा की दुर्लिप्सा से घर
से वहाँ के रमणीयक शालिनी चेत्य मे आकर यथेच्छ द्यूतादि
क्रीडा किया करता था। वहाँ एक केलिप्रिय नागकुमार देव भी
मानव देह धारण कर कुम्भार के लडके के साथ प्रतिदिन क्रीडा
करने लगता। अपने कुलक्रमागत कुलाल कर्म का धन्धा न करने
के कारण उसका पिता हमेशा उसे दुर्वचनो से फटकारता। जब
वह पिता की वात नही मानता तो पिता उसे मार-पीट कर मिट्टी
खोदने व लाने आदिका काम कराता। फिर भी वह मौका पाकर
बीच-बीच मे उसी चैत्य मे जा कर नागकुमार के साथ खेलने
लगता।
नागकुमार ने पूछा—पहिले की तरह निरन्तर खेलने नही
आते ? उसने कहा—मेरा पिता क्रुद्ध होता है अत उदर-पूर्ति के
लिए कुछ अपना काम भी करना पडता है। नागकुमार ने
कहा—यदि ऐसी वात है तो खेल के पश्चात् मैं पृथ्वी पर लोट
रत्नवाहपुर-कल्प ७५
कर साँप हो जाऊँगा, तुम मेरी चार अगुल पूँछ अपनी मिट्टी
खोदने की कुदाली से काट कर ले लेना । वह स्वर्णमय हो जायगी
उसी सोने से तुम्हारे कुटुम्ब का निर्वाह होता रहेगा । सौहार्द के
कारण प्रतिदिन इसी प्रकार प्रवृत्ति चलने लगी । प्रतिदिन सोना
पाकर भी उसका पिता इस रहस्य से अनभिज्ञ रहा ।
एक वार पिता ने उसे बाँध कर पूछा तो भय से उसने यथा-
स्थित कह दिया तो विस्मयपूर्वक उसके पिता ने कहा—रे मूर्ख !
चार अगुल ही क्यो काटते हो ? अधिक काटने से अधिक प्राप्ति
होती है ! पुत्र ने कहा—पिताजी ! मित्र के वचनो का उल्लघन
कर अधिक काटने की मेरी इच्छा नही है । पर पिता तो लोभाभि-
भूत था, वह लड़के की क्रीडा के समय चैत्य मे छिपा खडा रहा ।
खेल के पश्चात् जब नागकुमार साँप बन कर भूमि पर लोटता
हुआ बिल मे प्रवेश करने लगा तो पिता ने कुदाली से उसका
आधा शरीर काट डाला । नागकुमार ने क्रुद्ध होकर—रे पापी !
तुमने रहस्य खोल दिया—कहते हुए गहरा फटकारा और पिता-
पुत्र दोनो को काट खाया । इतना ही नही, नागकुमार ने तीव्र
क्रोधावेग मे समस्त कुंभारो के वंश का नाश कर दिया । उसके
वाद आज तक कोई कुभार का काम करने वाला वहाँ नही रहता ।
वहाँ की जनता मिट्टी के वर्त्तन अन्य स्थानो से लाती है ।
वहाँ उसी ,प्रकार नागमूर्त्तियुक्त धर्मनाथस्वामी की प्रतिमा
सम्यग्दृष्टि यात्रियो के द्वारा बडे समारोहपूर्वक पूजी जाती है ।
आज भी वहाँ इतर धर्म वाले धर्मराज के नाम से उन्हे पुकारते है
और वर्षा न होने पर हजारो घडे दूध से भगवान का अभिषेक
करते हैं । उसी समय वहाँ प्रचुर मेघवृष्टि हो जाती है ।
कन्दर्पा शासनदेवी और किन्नर शासनयक्ष भगवान धर्मनाथ
के भक्त-पूजको के विघ्न दूर कर अर्थ की प्राप्ति भी कराते हैं ।
७६ विविध तीर्थ-कल्प
श्रीरत्नवाहपुर या रत्नपुर का यह कल्प श्री जिनप्रभ सूरिजी ने
यथाश्रुत निर्माण किया है।
॥ श्री धर्मनाथ की जन्मभूमि रत्नपुर तीर्थ का कल्प समाप्त
हुआ। इसकी ग्रंथाग्र० ३२ और अक्षर २३ है ॥
२१. पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प
श्री महावीर भगवान को नमस्कार करके उन्ही के मोक्षगमन
से पवित्रित, दीवाली महोत्सव की उत्पत्ति से प्रतिबद्ध पावापुरी
का कल्प कहूँगा।
गौड़ के पाडलिपुर मे त्रिखण्ड भरत का स्वामी राजा सम्प्रति
परमश्रावक प्रणत हो कर आर्य सुहस्ति गणधर को पूछता है कि
भगवन् ! लोक और लोकोत्तर का गौरवान्वित यह दीवाली पर्व
कैसे हुआ ? गुरु महाराज कहते हैं—राजन् ! सुनो ।
उस काल उस समय मे श्रमण भगवान महावीरस्वामी प्राण-
तकल्प स्थित पुष्पोत्तर विमान मे बीस सागरोपम आयु परिपूर्ण
कर, वहाँ से च्यव कर तीन ज्ञान के सहित इसी अवसर्पिणी के
तीन आरो के व्यतिक्रान्त होने पर चतुर्थ आरे के पचहत्तर वर्ष
और साढे नौ मास अवशेष रहने पर मिति आषाढ शुक्ल ६ के
दिन उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे माहणकुण्ड ग्राम नगर मे ऋषभदत्त
ब्राह्मण की भार्या देवानन्दा की कुक्षी मे—सिंह, गज, वृषभादि
चतुर्दश महास्वप्न संसूचित—अवतीर्ण हुए। वहाँ ८२ दिन के
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ७७
अनन्तर शकेन्द्र के आदेश से हरिणेगमेषी ने आश्विन कृष्ण १३
को उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में क्षत्रियकुण्ड ग्राम नगर मे
सिद्धार्थ राजा की त्रिशला देवी के गर्भ से विनिमय कर के गर्भ मे
रखा । सातवे महीने मे माता का स्नेह ज्ञात कर प्रभु ने ऐसा
अभिग्रह लिया कि “मै माता पिता के जीवित रहते श्रमण नही
बनूँगा !” नौ मास और साढे सात दिन बीतने पर चैत्र शुक्ल
त्रयोदशी की अर्द्ध रात्रि मे उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे प्रभु का
जन्म हुआ । माता पिता ने वर्द्धमान नामकरण किया । मेरु-
कम्प, देव गर्व खर्वण (विनाश), इन्द्र व्याकरण प्रणयन अवदान
प्रगट कर भोगो को भोग कर, माता-पिता के स्वर्ग जाने पर, तीस
वर्ष गृहस्थावास मे रह कर, सम्वत्सरी दान देकर, चन्द्रप्रभा
शिविका मे अकेले एक देवदूष्य से मार्गशीर्ष कृष्ण १० के दिन
उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे छठ्ठ तपपूर्वक अपराह्न मे ज्ञात
खण्ड वन मे निष्क्रान्त—दीक्षित हुए । दूसरे दिन बहुल विप्र ने
पायस-क्षीर से पारणा कराया । पञ्च-दिव्य प्रादुर्भूत हुए । फिर
बारह वर्ष साढे छः मास तक मनुष्य, देव और तिर्यञ्चो द्वारा किये
हुए उपसर्गों को सहन कर उग्र तपश्चर्या-करके जभिय गाँव मे
ऋजुवालुका तट पर गोदोहनासन मे छठ्ठ भक्त से उसी उत्तरा-
फाल्गुनी नक्षत्र मे वैशाख शुक्ल दशमी के तृतीय प्रहर मे केवल-
ज्ञान प्राप्त हुए । ग्यारस के दिन मध्यम पावा मे महसेन वन मे
तीर्थ प्रवर्त्तन किया । इन्द्रभूति प्रमुख गणधरों को सपरिवार
दीक्षित किया । दीक्षा-दिवस से भगवान के ४२ वर्षा-चातुर्मास हुए
यथा—१ अस्थिग्राम मे, ३ चम्पा—पृष्ठचम्पा मे, १२ वैशाली—
वाणियग्राम मे, १४ नालन्दा-राजगृह मे, ६ मिथिला मे, २ भद्रिका
मे, १ अलभिका मे, १ पणिय भूमि मे, १ श्रावस्ती मे । फिर
अन्तिम मध्यम-पावा मे हस्तिपाल राजा के अभुक्तमान शुल्क-
शाला मे हुआ । वहाँ आयु शेष जानते हुए स्वामी ने सोलह प्रहर
तक देशना की ।
७८ विविध तीर्थ-कल्प
वहाँ राजा पुण्यपाल वन्दनार्थ आया और अपने देखे हुए आठ
स्वप्नो का फल पूछने लगा। भगवान कहते हैं वे यों हैं—प्रथम
हिलते हुए प्रासाद पर हाथी खडे हैं, उनके गिरने से कोई उधर
से नही जाता। जो जाते उनमे से कितने ही निकल भी जाते हैं
और कितने उसके गिरने से नष्ट भी हो जाते है। इस स्वप्न का
फल ऐसा है—चलते प्रासाद के स्थान पर दुखमय गृहस्थावास,
सपदाएँ, स्नेह और निवास अस्थिर हैं। अहो ! दूषमकाल से दुष्प्र-
जीवी इत्यादि वचनो से धर्मार्थी श्रावक गजरूप हैं। इतर पर
समय प्राधान्यरूप से वे देशभङ्गादि द्वारा प्रतिहत हो जायँ पर
निकलना नही चाहते। जो लोग व्रत ग्रहण कर निकलते भी है, वे
अविधि से निर्गमन करते हैं, उनका भी विनाश हो जायगा।
गृहस्थ लोगो के सक्लेश मे पडने पर वे भग्न परिणाम वाले होगे।
विरले ही सुसाधु हो कर आगमानुसार गृहस्थो के संक्लेश मे आने
पर भी अवगणना कर के कुलीन होने से सयम का निर्वाह करेगे।
-यह प्रथम स्वप्न का अर्थ है।
दूसरा स्वप्न यह है—वानरो के मध्य मे बहुत से यूथाधिपति
थे वे अमेध्य से अपने आपको लीप रहे है, दूसरे भी ऐसा ही करते
हैं, लोग उन्हे हँस रहे हैं। वानर कहते हैं यह अगुचि नही गोशीर्ष
चन्दन है। ऐसे वानर विरले हैं जो अमेध्य का विलेपन नही
करते। जो नही करते उन पर करने वाले खीजते है। इसका फल
यह है—वानर स्थानीय गच्छगत साधु हैं। कितने ही अप्रमत्त
और कितने ही चल परिणाम वाले हैं। यूथाधिपतियो के स्थान
पर आचार्यादि गच्छाधिपति समझना चाहिए। अशुचि-विलेपन के
स्थान पर उनके द्वारा आधा कर्मादि सावद्य सेवन, अन्य विलिपन
के स्थान पर अन्य साधुओ का भी वैसा ही करना और उसके
कारण लोगो का हँसना, उनकी अनुचित प्रवृत्ति से वचनो द्वारा
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ७९
हीलना है। वे कहेगे कि ये गर्हित नही किन्तु धर्म के अग है।
विरले ऐसे होगे जो उनके अनुरोध करने पर भी सावद्य प्रवृत्ति
नही करेगे। वे उन पर क्रोध करेगे और कहेगे—ये अवगीत है,
अकिञ्चित्कर हैं। यह दूसरे स्वप्न का अर्थ है।
तीसरा स्वप्न यह था—उत्तम छाया वाले क्षीर वृक्ष के नीचे
बहुत से प्रशान्त रूप वाले सिंह-शावक बैठे हैं। लोग उनकी प्रगसा
करते है, अविगमन करते है। और बबूल वृक्षो के नीचे श्वान बेठे
हैं। इसका फल यो है—क्षीर तरु स्थानीय साधुओ के विचरने
योग्य क्षेत्र हैं। श्रावक लोग साधुओ की भक्ति-बहुमान करने वाले,
धर्मोपकरण देने वाले और सुसाधुओ की रक्षा करने वाले है, वे भी
बहुत से सिंहपोतक नियतावासी पार्श्वस्थ, अवसन्न, सक्लेगकारी
साधुरूपी श्वानो के द्वारा रुके हुए है। वे स्वय को जन रजनार्थ
प्रशान्त दिखला कर तथा प्रकार के कुतूहली लोगो के द्वारा प्रगसा
पावेगे, उनके पास जावेगे और उनके वचनो का पालन करेगे।
वहाँ कदाचित् कोई धर्म श्रद्धालु व्यवहार के परिहार करने वालो
से दुखी होगे तो वे तद्भावित श्वानादि से प्रतिहसित होगे। बार-
वार शुद्ध धर्म कहने से उन्हे लोग कहेगे—ये तो भोंकते है। जिन
बवूल के समान कुलो मे वे दुखी होगें ऐसे लोगो से अवर्णवाद के
द्वारा उनका परिहास होगा।- दूषमकाल के प्रभाव से धर्मगच्छ
सिंहपोतक के समान होगे।
चौथा स्वप्न इस प्रकार था—कितने ही कौए वापी के तट
पर तृषा से अभिभूत थे। वे मायासर को देख कर वहाँ जाने
लगे। किसी ने उन्हे रोका—"यह जल नही हैं"। किन्तु उन्होने
विश्वास नही किया, वहाँ गए और नष्ट हो गए। इसका फल यह
है—वापी स्थानीय सुसाधु सत हैं, जो अत्यन्त गम्भीर सुभावितार्थ
और उत्सर्गापवादकुशल हैं। पागल न होने पर भी पागल बने
हुए राजा की भाँति यह जानकर कि कालोचित धर्मनिरत और
अनिश्रित के समीप भी रहना चाहिए । यहाँ काक के समान
अत्यन्त वक्र जड अनेककलकोपहृत धर्मार्थी जानना चाहिए । वे
आज भी धर्म श्रद्धा से अभिभूत हैं । मायासुर के स्थान पर पूर्वोक्त
विपरीत धर्माचारी हैं । अत्यन्त कष्टानुष्ठान निरत भी अपरिणत
होने से अनुवाद प्रवृत्तता से कर्मबन्ध के हेतु हैं । उन्हे देख कर
मूढ धार्मिक जन वहाँ जायँगे । उन्हे कोई गीतार्थ कहे कि ये धर्म
मार्ग नही हैं किन्तु धर्माभास हैं, तो भी विश्वास न करते जावेगे
वे ससार मे पतन से नष्ट होगे । जो उनके वचन से रुकेगे वे ही
अमूढ धर्मसाधक होगे ।
पाँचवा स्वप्न यह है—विषय वन मे मृत सिंह अनेक गीदडो
से घिरा हुआ है किन्तु कोई भी शृगालादि उसका विनाश नही
कर रहे हैं । कालान्तर मे उस मृत सिंह के कलेवर मे कीडे उत्पन्न
हो गए और सिंह को खाने लगे, यह देख कर शृगालादि उपद्रव
करने लगे । इसका फल—उपनय यो है कि—सिंह के स्थान पर
परवादिमत दुर्द्धर्ष प्रवचन है । वन के स्थान पर प्रविरल सुपरीक्षक
धर्मी जनो वाला भारतवर्ष है । शृगाल गणो के स्थान परतीथि-
कादि प्रवचन प्रत्यनीक है । वे ऐसा मानते हैं कि यह प्रवचन हमारे
पूजा सत्कार दानादि का उच्छेद करने वाला है, अत. जैसे तैसे नष्ट
हो जाय । वह विषम अमध्यस्थ जनो से परिपूर्ण है और वह
प्रवचन मृत अतिशय व्यपगम से निष्प्रभाव होगा । तो भी प्रत्यनीक
जन भय से उसे उपद्रुत नही करेगे । वास्तव मे यह परोत्पर
सुस्थित और सगत है । काल-दोष से उसमे प्रवचन निर्द्धंश करने
वाले मतान्तरीय रुपी कीड़े उत्पन्न हो जाएँगे और वे परस्पर
निन्दा-भण्डनादि से शासन का लाघव करायेंगे । उसे देख वे
प्रत्यनीक भी “ये परस्पर न मिले” इसलिये निश्चय निरतिशेप
मात्र प्रवचन को निर्भयता से उपद्रव करेंगे ।
छठा स्वप्न यो है—पद्माकर सरोवरादि विना पद्म वाले और
पावापुरी-दीपावली-बृहत्कल्प ८१
गर्दभक-छीलर युक्त वन गए हैं। कमल विरल रूप मे ऊकरडी
पर उगे हुए हैं किन्तु वैसे रमणीय नही। यहाँ पद्माकरो के स्थान
पर धर्मक्षेत्र और सुकुल जानने चाहिए। धर्म प्रतिपत्ति रूप तथा
साधु-श्रावक सघ रूप कमलादि उसमे नही हैं। जो धर्म स्वीकार
करेंगे वे भी कुशील संसर्गी और लोलुप परिणाम वाले हो जाएगे।
ऊकरडे के स्थान पर प्रत्यन्त क्षेत्र अथवा नीच कुलादि जानना
चाहिए, उनमें धर्मप्रवृत्ति होगी वे भी अर्थानुपत्ति दोष से लोगो
के द्वारा तिरस्कृत होगे! ईर्ष्यादि दोष दुष्ट होने से अपनी कार्य-
सिद्धि नही कर सकेगे।
सातवाँ स्वप्न यह है—कोई दुर्विदग्ध कृषक जले हुए और
घुन लगते हुए ऊगने के अयोग्य वीजो को अच्छे वीज मानता हुआ
ऊषरादि खेतो में विखेर कर वो रहा है। उन बीजो मे आया
हुआ कोई विरल शुद्ध वीज वह हटा देता है। इसका फल यो है—
कृषक स्थानीय दानधर्मरुचि जीव हैं, वे दुर्विदग्ध हैं, किन्तु
अपने आप को ज्ञायक मानते हुए अप्रायोग्य सघ भक्तादि दान को
प्रायोग्य मानते हुए उन वस्तुओ को भी अपात्रो को देते हैं। यहाँ
चतुर्भंगी है—एक शुद्ध अप्रायोग्य मे किञ्चित् शुद्ध देने योग्य
होता है, उसको दूर कर देते हैं, अथवा आये हुए सुपात्र को
परिहार कर देगे। इस प्रकार के दान, दायक और ग्राहक होगे।
अन्यथा भी व्याख्या है—अबीज के स्थान पर असाधु जानना
चाहिए। दुर्विदग्ध लोग उन्हे भी साधु-बुद्धि से ग्रहण करेंगे।
अस्थानो मे अविधि से स्थापित करेंगे। जैसे कोई दुर्विदग्ध कृषक
अबीजो को भी बीज और बीजो को अबीज मानता हुआ उस
प्रकार से वहाँ वोता है जहाँ कीडे आदि खा जाते हैं अथवा
चतुष्पदादि नष्ट कर दे। अथवा अन्यथा उगे हुए भी नही काटे
जाते। इस प्रकार अज्ञानी धर्म श्राद्ध वाले सुपात्रो को भी अविधि
६
८२ विविध तीर्थ-कल्प
अवहुमान अभक्ति आदि उस प्रकार करेगे कि जिससे पुण्य का
प्रसव अक्षम हो जायगा।
आठवाँ स्वप्न यह है—प्रासाद के शिखर पर क्षीरोद से भरे
सूत्रादि से अलकृत ग्रीवा वाले कलश हैं, दूसरे भूमि पर उतारे
हुए कलश पड़े हैं। कालान्तर मे वे शुभ कलश अपने स्थानो से
चलित हो उन पुराने घडो के ऊपर गिरे जिससे वे फूट गए।
इसका फल यह है—कलश स्थानीय सुसाधु हैं, पहले उग्र
विहार से विचरते थे। पूज्य हो कर भी कालादि दोष से सयम
स्थान से चलित हो कर अवसन्नभूत शिथिलाचारी हो जावेगे।
दूसरे पार्श्वस्थादि भूमिस्थित-भूमिज उद्वेलित पाँवो से सैकड़ो
असयम स्थान युक्त वोदे घडो के जैसे निष्पन्न परिणाम वाले होगे।
और वे सुसाधु अन्य विहार क्षेत्रो के अभाव से घूमते हुए वोदे घडो
के समान पार्श्वस्थादि के ऊपर गिर कर पीडा करेंगे। और वे
स्वक्षेत्र पर आक्रमण से पीडित होते हुए निर्दयता से उनके सुष्ठुतर
सक्लेश करेगे। तब वे परस्पर विवाद करते हुए दोनो ही सयम
से भ्रष्ट हो जायँगे।
"कितने ही तप का गौरव करने वाले और दूसरे स्वधर्म
क्रियाओ मे शिथिल, ऐसे दोनो ही मात्सर्यवश अस्पृष्ट धर्म हो
जायँगे।"
फिर कितने ही "पागल न होने पर भी पागल बने राजा" के
आख्यान के अनुसार कालादि दोष होने पर भी अपना निर्वाह
करेगे। उस आख्यान को पूर्वाचार्य इस प्रकार बतलाते हैं—
पूर्वकाल मे पृथ्वीपुरी मे पूर्ण नाम का राजा और उसके
सुबुद्धि मंत्री था। एक वार लोगदेव नामक एक नैमित्तिक आया।
मुबुद्धि मंत्री ने उसे भावी काल का स्वरूप पूछा। उसने कहा—
महीने के वाद यहाँ मेघवृष्टि होगी, जो भी उसका जल पीयेगे वे
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८३
सभी ग्रथितत्वग्रस्त—पागल हो जायेंगे। कितना ही काल बीतने
पर फिर सुवृष्टि होगी जिसका जल पी कर वे लोग पुन स्वस्थ
होगे। मन्त्री ने तब राजा से यह बात कही। राजा ने ढिंढोरा
पिटा कर लोगों को जल-सग्रह करने का आदेश दिया। लोगो ने
जल-संग्रह भी किया। महीना होते ही मेघवृष्टि हुई। उन लोगो
का सगृहीत जल समाप्त हो गया तो लोगो ने नया जल पीना
प्रारम्भ कर दिया, जिससे सामन्तादि सभी लोग पागल हो कर
स्वेच्छा से नाचते-गाते रहने लगे। केवल राजा और मन्त्री ने
सगृहीत जल नही छोड़ा और वे स्वस्थ रहे। तब राजा और मंत्री
को अपने जैसा न देखकर सामन्तादि ने परस्पर मन्त्रणा की कि—
“राजा और मन्त्री पागल हैं जो हमारे जैसा आचरण नही करते ।
अत इन्हे हटाकर अपने जैसे आचरण करने वाले दूसरे राजा
और मत्री को स्थापित करेगे। मत्री ने उनकी मन्त्रणा ज्ञात कर
राजा से निवेदन किया। राजा ने कहा—इन लोगो से अपने को
कैसे सुरक्षित रखना। क्योकि लोकवृन्द ही राजा के तुल्य होता
है। मत्री ने कहा—राजन् ! पागल न होने पर भी अपने को
पागल बन कर रहना चाहिए, अन्यथा छुटकारा नही !
राजा और मत्री कृत्रिम पागल होकर उन लोगो के बीच
अपनी सपत्ति की रक्षा करते हुए रहने लगे, जिससे वे सामन्ता दे
सन्तुष्ट होकर कहने लगे—अहो ! राजा और मत्री भी हमारे जैसे
हो गये। इस उपाय से उन्होने अपनी रक्षा की। कालान्तर मे
सद्वृष्टि हुई और उस नवीन जल को पीकर सभी लोग प्रकृतिस्थ-
स्वस्थ हो गए।
इस प्रकार दूषम काल मे गीतार्थ लोग भी अपना भविष्य
सुरक्षित रखने के लिए कुर्लिगी लोगो के जैसे ही रहते हुए अपना
निर्वाह करेगे। इस प्रकार स्वामी के मुख से दूषम काल विलसित
८४ विविध तीर्थ-कल्प
भावी मूचना देने वाले आठ स्वप्नो का फल श्रवण करके पुण्यपाल
राजा प्रव्रजित होकर मोक्ष गए ।
इस दूषम समय के विलास को लौकिक मे भी कलिकाल नाम
से पुकारते हैं । जैसे—पूर्वकाल मे द्वापरयुगोत्पन्न राजा युधिष्ठिर
ने राजवाटिका जाते हुए किसी स्थान पर बछडी के नीचे एक
गाय को स्तन-पान करते देखा । यह आश्चर्यजनक घटना देखकर
राजा ने द्विजवरो से पूछा—यह कैसे ? उन्होने कहा—देव ! यह
आने वाले कलियुग का सूचक है । इस अद्भुत वात का फल यह
है कि—कलियुग मे माता-पिता अपनी कन्या को किसी ऋद्धि
सम्पन्न घर मे देकर द्रव्य ग्रहणादि द्वारा अपनी आजीविका
चलावेंगे ।
वहाँ से आगे प्रस्थान कर चलते हुए राजा ने किन्ही लोगो
को पानी मे भीगी हुई बालुका की रस्सी वटते हुए देखा और
क्षणमात्र मे वह रस्सी वायु के सयोग से नष्ट हो गई । राजा के
पूछने पर द्विज ने कहा—महाराज ! इसका फल यह है कि जिस
द्रव्य को कठिनाई से आजीविका करके वढाएँगे वह धन कलियुग
मे चोर-अग्नि-राजदण्डादि से विनष्ट होगा ।
फिर आगे चलकर धर्मपुत्र ने देखा आवाह (खेली) से वह कर
उलटा जल कुएँ मे गिरता है । वहाँ भी ब्राह्मणो ने कहा—जिस
द्रव्य को असि-मसि-कृषि और वाणिज्यादि द्वारा प्रजा उपार्जन
करेगी वह सब राजकुल मे चला जायगा । जहाँ दूसरे युगो मे तो
राजा लोग अपना द्रव्य देकर लोगों को सुखी करते हैं ।
आगे जाते हुए फिर राजा ने राय चम्पा और शमीवृक्ष-खेजडी
को एक ही प्रदेश मे देखा । वहाँ लोगो को शमी वृक्ष की वेदिका
वाँधकर गंध-माल्यादि से अलंकृत कर गीत नृत्य महिमादि करते
हुए देखा और दूसरे छत्राकार वृक्ष को सुगन्धित पुष्पो से समृद्ध
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८५
होते हुए भी कोई नही पूछता था। ब्राह्मणो ने उसका फल इस
प्रकार कहा—गुणवान महात्मा और सज्जनो की पूजा नही होगी
और ऋद्धि भी नही होगी। निर्गुण स्थान, पापी और दुष्ट लोगो
को प्राय कलियुग मे पूजा सत्कार और ऋद्धि प्राप्त होगी।
आगे चल कर राजा ने एक सूक्ष्म छिद्रो वाली शिला को
केशाग्र से बधे हुए अन्तरिक्ष स्थित देखा। वहाँ भी पूछने पर श्रेष्ठ
जनेऊधारी विप्र ने कहा—महाभाग ! कलिकाल मे शिला की
भाँति विपुल पाप होगा और बालाग्र जितना धर्म होगा। पर
उतने से धर्म के माहात्म्य से ही लोग कुछ समय निस्तार करेगे,
उसके टूटने पर सब डूव जायगा।
पूर्वाचार्यो ने भी लोकविख्यात कलियुग माहात्म्य को दूषम
काल मे इस प्रकार बतलाया है—
कूवावाहा जीवण-तरुफलवह-गावि वच्छ धावणया।
लोह विवज्ज(च्च)य कलिमल-सप्प गरुडपूअपूआय ॥१॥
अर्थ—आवाहोपजीवी कूप, फलो के लिए वृक्ष-वध, बछिया
द्वारा गौ का पालन, लोह-कटाह मे कलिमल पाक, सर्पों-दुष्टो की
पूजा और गरुड-धर्मी जनो-की अपूजा होगी।
हत्थगुलि दुग घट्टण-गय-गद्दभ-सगड़-वाल सिलधरण।
एमाई आहारणा लोयमि वि काल दोसेण ॥२॥
अर्थ—दो अंगुलियाँ हाथ का घट्टन करेगी, हाथी के योग्य
शकट गर्दभ लेगे, वालो से शिलाधारण, आदि इस तरह की बाते
लोक मे कालदोष से होगी।
जयघर कलह कुलेयर मेरा अणु सुद्ध धम्म पुठवि ठिई।
वालुग वक्कारभो एमाई आइ सद्धेण ॥ ३ ॥
कलिअवयारे किय निज्जिएसु चउसुपि पडवेसु तहा।
भइ वहाइ कहाए जामि ग जोगमि कलिणाओ ॥ ४ ॥
८६ विविध तीर्थ-कल्प
तत्तो जुहिट्ठिलेण जियमि ठइयमि दाइए तमि ।
एमाई अट्ठुत्तर सएण सिट्ठा नियठिइ त्ति ॥ ५ ॥
इन गाथाओ का अर्थ
कूप से आवाह आजीविका करेगा। इसका उपनय राजा कूप-
स्थानीय है वह आवाहस्थानीय ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र सभी के
भरण-पोषण करने योग्य है पर कलियुग-दोष से उन्ही से अर्थ
ग्रहण करेगा (१)। तथा फल के लिए वृक्ष का वध और छेद होगा।
फलतुल्य पुत्र तरुतुल्य पिता का वध-हानि-उद्वेग, धनप्राप्ति
लेखनादि से उपार्जन करेगे (२)। वछिया तुल्य कन्या के विक्रय
से गोतुल्य जननी धावन तुल्य उपजीवन करेगी (३)। लोहमयी
कडाई—जो सुगन्धित तैल-घृत पाक के उचित है उसमे कलिमल
रूप पिशित आदि का पाक होगा। याने स्वजाति वर्ग को छोड-
कर अनालवद्ध पराये जनो मे अर्थदान होगा, ये भाव है (४)। सांप
जैसे धर्मवर्जित निर्दयो का दानादि सत्कार होगा, गरुड़ स्थान
पूज्य धर्माचार्यों की अपूजा होगी (५)।
दो अगुलियो से हाथ का घाटन और स्थापन होगा। हाथ के
तुल्य पिता का अंगुली द्वय तुल्य बहुत से पुत्रो द्वारा जयघर झगडा
करने-वशीभूत करने वाले घट्टण नामक लोग होगे (६)। हाथी से
वहन करने वाले शकट को गर्दभ के द्वारा ग्रहण किए देखा। उसका
फल—गजस्थानीय उच्चकुलो मे जो मर्यादा रूपी शकट वाहन
के उचित थे उनमे कलह और पुनर्विवाह होगे। इतर गर्दभ
स्थानीय नीच कुलो मे उत्तम नीति होगी (७)। बाल से बंधी हुई
शिला आकाश मे लटकती देखी, थोडा भी सूक्ष्मतर बाल स्थानीय
शास्त्रानुसार शुद्ध धर्म है। शिला तुल्य पृथ्वी उसके निवासी लोग
स्थिति निर्वाह करेगे (८)। जैसे वालुका से बनाई रस्सी नही
पकडी जा सकती उसी प्रकार वाणिज्य-कृषि, सेवा आदि आरभ
से भी विशिष्ट प्रासादानुरूप फल प्राप्त नही होगा (९)।
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८७
शेष दो गाथाओ का अर्थ कथानकगम्य है वह इस प्रकार है—
पाँच पाडवो ने दुर्योधन, दु शासनादि सौ भाइयो और कर्ण,
गांगेय, द्रोणाचार्य आदि संग्राम के अग्रणी लोगो को मार दिया।
बहुत काल तक राज्य का परिपालन कर कलियुग-प्रवेग के समय
महापथ मे प्रस्थान किया। किसी वन-प्रान्त मे पहुचे, वहाँ रात्रि
मे युधिष्ठिर ने भीम आदि को प्रतिप्रहर प्रहरिक—पहरेदार रूप से
नियुक्त किया। धर्मपुत्रादि के सो जाने पर पुरुप रूप करके कलि
भीम के सम्मुख उपस्थित हुआ। उसने भीम से कहा—अरे!
भाइयो, गुरुओ, पितामह आदि को मार कर अव तुम धर्मार्थ जा
रहे हो ? यह तुम्हारा कैसा धर्म है। तब भीम क्रुद्ध हो कर उसके
साथ युद्ध करने लगा जैसे जैसे भीम युद्ध करता था वैसे वैसे कलि
वढता जाता था, कलि ने भीम को जीत लिया। इसी प्रकार दूसरे
प्रहर मे अर्जुन को, तीसरे मे नकुल को और चौथे मे सहदेव को
उसने कहा। उन्होने क्रोध किया और वे भी हार गए। कुछ रात्रि
शेष रहे युधिष्ठिर उठे, कलि उनके साथ भी युद्ध करने को प्रस्तुत
हुआ। तब गान्ति से ही राजा ने कलि को जीत लिया और छोटा
सा बना कर सराव मे बैठा दिया और प्रात भीमादि को दिखला
कर कहा—यह वही है जिसने तुम्हे जीत लिया था। इत्यादि
कलिस्थिति के १०८ हृष्टान्त महाभारत मे व्यास ऋषि ने दिखाये
हैं। अस्तु,
तदनन्तर गौतम स्वामी ने जानते हुए भी पूछा—भगवान् !
आपके निर्वाणानन्तर क्या-क्या होगा ? प्रभु ने कहा—गौतम !
मेरे निर्वाण के तीन वर्ष साढे आठ मास बीतने पर पाँचवा दु षम
आरा लगेगा। मेरे मोक्ष गमन के ६४ वर्ष हो जाने पर अन्तिम
केवली जम्बूस्वामी मुक्ति जावेगे। उन्ही के साथ मन पर्यव ज्ञान,
परमावधि ज्ञान, पुलाक लब्धि, आहारक गरीर, क्षपकश्रेणी,
उपशमश्रेणी, परिहार विशुद्ध-सूक्ष्म सपराय और यथाख्यात
चारित्र, केवलज्ञान और सिद्धि गमन ये बारह स्थान भारतवर्ष मे
विच्छेद हो जाएँगे ।
अज्ज सुहम्मप्पमुहा होंहिति जुगप्पहाण आयरिया ।
दुप्पसहो जा सूरी चउरहिआ दोण्णि अ सहस्सा ॥१॥
[ आर्य सुधर्म आदि से लेकर दु प्रसह सूरि पर्यन्त दो हजार
चार युग प्रधानाचार्य होगे ।]
एक सौ सत्तर से कुछ अधिक वर्ष बीतने पर स्थूलिभद्र के
स्वर्गस्थ होने पर अंतिम चार पूर्व, समचतुरस्र सस्थान, वज्र
ऋषभ नाराच संघयण, और महाप्राण ध्यान विच्छेद हो जाएँगे ।
पाँच सौ वर्ष बीतने पर आर्यवज्र के साथ दशवाँ पूर्व और चतुष्क
संघयण नष्ट हो जायगा ।
मेरे मोक्षगमन के पश्चात् पालक, नंद, चंद्रगुप्त आदि राजाओ
के हो जाने के पश्चात् चार सौ सत्तर वर्ष बाद विक्रमादित्य राजा
होगा । इस बीच ६० वर्ष पालक का राज्य, १५५ वर्ष नन्दो का,
१०८ वर्ष मौर्यवंशियो का, ३० वर्ष पुष्यमित्र का, ६० वर्ष
बलमित्र-भानुमित्र का, ४० वर्ष नरवाहन का, १३ वर्ष गर्दभिल्ल
का, ४ वर्ष शको का फिर विक्रमादित्य का राज्य होगा । वह
स्वर्णपुरुष सिद्ध किया हुआ और पृथ्वी को अनृण करके अपना
संवत्सर चलायगा ।
निर्वाण के चार सौ त्रेपन वर्ष वाद गुण शत कलित श्रुत
प्रयुक्त, गर्दभिल्ल के छेदक कालकाचार्य होगे ।
दूषम काल के प्रभाव से बडे नगर गाँव जैसे हो जाएँगें और
गाँव स्मशान जैसे हो जावेंगे । राजा लोग यमदण्ड जैसे, कौटुम्बिक
दासप्राय सरकारी कर्मचारी घूसखोर, भृत्य स्वामीद्रोही, सासूएँ
कालरात्रितुल्य, बहुएँ सर्पिणीतुल्य, कुलाङ्गनाएँ निर्लज्ज कटाक्षो से
देखने वाली वेश्याचरण शिक्षित होगी । पुत्र और शिष्य स्वच्छन्द-
चारी होगे। मेघ असमय वर्षी और समय पर नही वर्षने वाले
होगे। दुर्जन लोग सुखी और ऋद्धि-सम्मान के पात्र होगे। सज्जन
अल्प ऋद्धि वाले, अपमानपात्र और दुखी होगे। देश में परचक्र,
डमर, दुर्भिक्ष, आदि दुख होगे। अधिकांश पृथ्वि क्षुद्र सत्व हो
जायगी। विप्र लोग धनलोभी और अस्वाध्यायी होगे। श्रमण
लोग कषाय कलुषित मन वाले मन्दधर्मी और गुरुकुल-वासत्यागी
होगे। सम्यग्दृष्टि सत्पुरुष अल्पवल और मिथ्यादृष्टि प्रचुर
शक्तिशाली होगे। देव दर्शन नही देंगे। विद्या-मंत्र उस प्रकार के
प्रभावशाली नही रहेगे। औषधियाँ, गोरस, कर्पूर, शर्करादि द्रव्यो
के रस, वर्ण, गन्धादि की हानि होगी। मनुष्यो के वल, बुद्धि और
आयुष्य का ह्रास हो जायगा। मासकल्पादि के योग्य क्षेत्र नही
रहेगे। प्रतिमारूप श्रावक धर्म का विच्छेद हो जायगा। आचार्य
भी शिष्यो को सम्यक् श्रुत नही देगे।
भरतादि दश क्षेत्रो मे श्रमण कलहकारी, डमर कारी,
असमाधि करने वाले और अनिवृत्तिकारक होगे। मुनियो के दिन
व्यवहार, मन्त्र-तन्त्रादि मे बीतेंगे और इन्ही की साधना मे लग
जाने से उस अनर्थलुब्धो का आगमार्थ नष्ट हो जायगा। जिस
प्रकार राजा व्यापारियो से धन लेने के लिए युद्ध करेगे वैसे ही
साधु लोग भी श्रावको से उपकरण, वस्त्र, पात्र, वसति आदि के
लिए लड़ेंगे। अधिक क्या ? मुण्ड बहुत किन्तु साधु अल्प होगे।
पूर्वाचार्य परम्परागत समाचारी को छोड कर स्वमति
विकल्पित समाचारी को “यही सम्यक् ‘चारित्र है!’” ऐसा कहते
हुए तथा विविध मुग्धजनो को मोह मे डाल कर उत्सूत्रभाषी, अल्प
स्तुति और परनिन्दापरायण कितने ही साधु होगे। म्लेच्छ नृप
बलवान और हिन्दू राजा अल्प बल वाले होगे।
निर्वाण के यावत् १९१४ वर्ष बीतने पर विक्रम संवत् १४४४
मे पाटलिपुत्र नगर मे चैत्र शुक्ल ८ की अर्द्ध रात्रि-वृष्टिकरण-मकर-
९० विविध तीर्थ-कल्प
लग्न मे जिसके मतातर मे 'मगदण' नामक चाण्डाल कुल वाले
के घर जसदेवी की कुक्षि से कल्कि गजा का जन्म होगा। कोई
ऐसा भी कहते हैं
"भगवान महावीर के १९२८ वर्ष पाच मास बीतने पर चाण्डाल
कुल मे कल्कि राजा होगा।" उसके तीन नाम होगे—कइ, कल्कि
और चतुर्मुख। उसके जन्म-समय मे मथुरा मे राम और मधुसूदन
का भवन कही भी गुप्त रहा हुआ गिरेगा। दुर्भिक्ष, डमर, रोगो
से जन पीडित होगे। अठारहवे वर्ष मे कार्त्तिक शुक्ल पक्ष मे
कल्कि का राज्याभिषेक होगा। लोगो के मुख से ज्ञात कर वह
नन्द राजा के पाँच स्वर्ण स्तूप ग्रहण करेगा। चमडे के सिक्के
चलावेगा। दुष्टो का पालन और श्रेष्ठ पुरुषो का निग्रह करेगा।
पृथ्वी को साधन कर छत्तीसवे वर्ष मे त्रिखण्ड भरत का अधिपति
होगा। खोद खोद कर सभी निधानो को ग्रहण करेगा।
उसके भण्डार मे ९९ कोटा कोटि सुवर्ण, चौदह हजार हाथी,
सत्यासी लाख घोडे, पाँच करोड़ हिन्दु तुर्क और काफिरो की
पदाति होगी। उसका एकछत्र राज्य होगा। द्रव्य के लिए राज-
मार्ग पर खनन करते हुए पाषाणमय लवणदेवी नामक गाय प्रकट
होकर गौचरी-चर्या मे गए साधुओ को सीगो से मारेगी। उनके
प्रतिपदाचार्य को कहने पर वे आदेग देगे कि इस नगर की पृथ्वी
पर जल का उपसर्ग होगा। तब कुछ साधु अन्यत्र विहार कर
जावेगे। कितने ही वसति प्रतिबन्ध से तद्ग्रहणार्थ वही ठहरेंगे।
सत्तरह दिन की वृष्टि से सर्वार्थ निधान प्रगट होगे। गंगा मे सारा
नगर डूब जायगा। राजा और सघ उत्तर दिशा मे रहे हुए विस्तृत
स्थल पर चढकर वचेगे। राजा वहाँ पर नया नगर बसावेगा।
सभी धर्म वाले उससे दण्ड पावेंगे। साधुओ के पास भिक्षा मे से
षष्ठाश माँगने पर कायोत्सर्ग से आहूत गासनदेवी निवारण करेगी।
पचासवे वर्ष मे सुभिक्ष होगा। एक द्रम्म मुद्रा मे धान्य की द्रोणी