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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 442 में से

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पृष्ठ 166

पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८३

सभी ग्रथितत्वग्रस्त—पागल हो जायेंगे। कितना ही काल बीतने
पर फिर सुवृष्टि होगी जिसका जल पी कर वे लोग पुन स्वस्थ
होगे। मन्त्री ने तब राजा से यह बात कही। राजा ने ढिंढोरा
पिटा कर लोगों को जल-सग्रह करने का आदेश दिया। लोगो ने
जल-संग्रह भी किया। महीना होते ही मेघवृष्टि हुई। उन लोगो
का सगृहीत जल समाप्त हो गया तो लोगो ने नया जल पीना
प्रारम्भ कर दिया, जिससे सामन्तादि सभी लोग पागल हो कर
स्वेच्छा से नाचते-गाते रहने लगे। केवल राजा और मन्त्री ने
सगृहीत जल नही छोड़ा और वे स्वस्थ रहे। तब राजा और मंत्री
को अपने जैसा न देखकर सामन्तादि ने परस्पर मन्त्रणा की कि—
“राजा और मन्त्री पागल हैं जो हमारे जैसा आचरण नही करते ।
अत इन्हे हटाकर अपने जैसे आचरण करने वाले दूसरे राजा
और मत्री को स्थापित करेगे। मत्री ने उनकी मन्त्रणा ज्ञात कर
राजा से निवेदन किया। राजा ने कहा—इन लोगो से अपने को
कैसे सुरक्षित रखना। क्योकि लोकवृन्द ही राजा के तुल्य होता
है। मत्री ने कहा—राजन् ! पागल न होने पर भी अपने को
पागल बन कर रहना चाहिए, अन्यथा छुटकारा नही !

राजा और मत्री कृत्रिम पागल होकर उन लोगो के बीच
अपनी सपत्ति की रक्षा करते हुए रहने लगे, जिससे वे सामन्ता दे
सन्तुष्ट होकर कहने लगे—अहो ! राजा और मत्री भी हमारे जैसे
हो गये। इस उपाय से उन्होने अपनी रक्षा की। कालान्तर मे
सद्‌वृष्टि हुई और उस नवीन जल को पीकर सभी लोग प्रकृतिस्थ-
स्वस्थ हो गए।

इस प्रकार दूषम काल मे गीतार्थ लोग भी अपना भविष्य
सुरक्षित रखने के लिए कुर्लिगी लोगो के जैसे ही रहते हुए अपना
निर्वाह करेगे। इस प्रकार स्वामी के मुख से दूषम काल विलसित