विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० विविध तीर्थ-कल्प
लग्न मे जिसके मतातर मे 'मगदण' नामक चाण्डाल कुल वाले
के घर जसदेवी की कुक्षि से कल्कि गजा का जन्म होगा। कोई
ऐसा भी कहते हैं
"भगवान महावीर के १९२८ वर्ष पाच मास बीतने पर चाण्डाल
कुल मे कल्कि राजा होगा।" उसके तीन नाम होगे—कइ, कल्कि
और चतुर्मुख। उसके जन्म-समय मे मथुरा मे राम और मधुसूदन
का भवन कही भी गुप्त रहा हुआ गिरेगा। दुर्भिक्ष, डमर, रोगो
से जन पीडित होगे। अठारहवे वर्ष मे कार्त्तिक शुक्ल पक्ष मे
कल्कि का राज्याभिषेक होगा। लोगो के मुख से ज्ञात कर वह
नन्द राजा के पाँच स्वर्ण स्तूप ग्रहण करेगा। चमडे के सिक्के
चलावेगा। दुष्टो का पालन और श्रेष्ठ पुरुषो का निग्रह करेगा।
पृथ्वी को साधन कर छत्तीसवे वर्ष मे त्रिखण्ड भरत का अधिपति
होगा। खोद खोद कर सभी निधानो को ग्रहण करेगा।
उसके भण्डार मे ९९ कोटा कोटि सुवर्ण, चौदह हजार हाथी,
सत्यासी लाख घोडे, पाँच करोड़ हिन्दु तुर्क और काफिरो की
पदाति होगी। उसका एकछत्र राज्य होगा। द्रव्य के लिए राज-
मार्ग पर खनन करते हुए पाषाणमय लवणदेवी नामक गाय प्रकट
होकर गौचरी-चर्या मे गए साधुओ को सीगो से मारेगी। उनके
प्रतिपदाचार्य को कहने पर वे आदेग देगे कि इस नगर की पृथ्वी
पर जल का उपसर्ग होगा। तब कुछ साधु अन्यत्र विहार कर
जावेगे। कितने ही वसति प्रतिबन्ध से तद्ग्रहणार्थ वही ठहरेंगे।
सत्तरह दिन की वृष्टि से सर्वार्थ निधान प्रगट होगे। गंगा मे सारा
नगर डूब जायगा। राजा और सघ उत्तर दिशा मे रहे हुए विस्तृत
स्थल पर चढकर वचेगे। राजा वहाँ पर नया नगर बसावेगा।
सभी धर्म वाले उससे दण्ड पावेंगे। साधुओ के पास भिक्षा मे से
षष्ठाश माँगने पर कायोत्सर्ग से आहूत गासनदेवी निवारण करेगी।
पचासवे वर्ष मे सुभिक्ष होगा। एक द्रम्म मुद्रा मे धान्य की द्रोणी