विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मधुर मञ्जुला फलो के भार से नत कदलीवन दृष्टिगोचर होते
हैं। पथिक लोग भी दूध मे सिद्ध हुए चिउडा और क्षीर का भोजन
करते हैं। पद-पद पर मीठे पानी वाली वापी, कूप, तालाव और
नदियाँ हैं। प्राकृत—ग्राम्य जन भी सस्कृत भाषा विगारद, अनेक
शास्त्रो के प्रशस्त विद्वान् और अतिनिपुण लोग हैं। वहाँ ऋद्धि
से समृद्ध मिथिला नामक नगरी थी जो वर्त्तमान मे जगई नाम से
प्रसिद्ध है। इसके निकट ही जनक महाराजा के भ्राता कनक का
निवासस्थान कनकपुर है।
इस मिथिला नामक नगरी मे कुम्भ राजा और प्रभावती की
कुक्षी से सभूत भगवान मल्लिनाथ स्त्रीतीर्थंकर और विजयनृप-
वप्रादेवी के नन्दन नमि जिनेश्वर का च्यवन, जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए हैं।
यहाँ श्री वीर प्रभु के अष्टम गणधर अकम्पित का जन्म
हुआ है।
यहाँ जुगवाहु-मय णरेहा के पुत्र नमी नामक महाराजा वलय—
चूडियो के शब्द से प्रत्येकबुद्ध हुए और सौधर्मेन्द्र परीक्षित वैराग्य
निश्चय वाले हुए।
यहाँ ही लक्ष्मीगृह चैत्य मे आर्य महागिरि के शिष्य कौण्डिन्य-
गोत्रीय अश्वमित्र श्री वीर-निर्वाण के दो सौ वीस (२२०) वर्ष
बीतने पर अणुप्रवाद पूर्व मे रही हुई नैपुणिका वस्तु को पढते हुए
श्रद्धाहीन हो गया। प्रवचन-स्थविरो द्वारा अनेकान्तिक युक्तियो
से समझाकर मना करने पर भी वह उत्सूत्र प्ररूपणा कर चतुर्थ
निह्नव हुआ।
श्री महावीर स्वामी के पद-पङ्कजो से पवित्रित जल वाली
वाणगगा और गडकी नदियो का सगम इस नगरी को पावन
करता है।