विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरत्नवाहपुर-कल्प ७५
कर साँप हो जाऊँगा, तुम मेरी चार अगुल पूँछ अपनी मिट्टी
खोदने की कुदाली से काट कर ले लेना । वह स्वर्णमय हो जायगी
उसी सोने से तुम्हारे कुटुम्ब का निर्वाह होता रहेगा । सौहार्द के
कारण प्रतिदिन इसी प्रकार प्रवृत्ति चलने लगी । प्रतिदिन सोना
पाकर भी उसका पिता इस रहस्य से अनभिज्ञ रहा ।
एक वार पिता ने उसे बाँध कर पूछा तो भय से उसने यथा-
स्थित कह दिया तो विस्मयपूर्वक उसके पिता ने कहा—रे मूर्ख !
चार अगुल ही क्यो काटते हो ? अधिक काटने से अधिक प्राप्ति
होती है ! पुत्र ने कहा—पिताजी ! मित्र के वचनो का उल्लघन
कर अधिक काटने की मेरी इच्छा नही है । पर पिता तो लोभाभि-
भूत था, वह लड़के की क्रीडा के समय चैत्य मे छिपा खडा रहा ।
खेल के पश्चात् जब नागकुमार साँप बन कर भूमि पर लोटता
हुआ बिल मे प्रवेश करने लगा तो पिता ने कुदाली से उसका
आधा शरीर काट डाला । नागकुमार ने क्रुद्ध होकर—रे पापी !
तुमने रहस्य खोल दिया—कहते हुए गहरा फटकारा और पिता-
पुत्र दोनो को काट खाया । इतना ही नही, नागकुमार ने तीव्र
क्रोधावेग मे समस्त कुंभारो के वंश का नाश कर दिया । उसके
वाद आज तक कोई कुभार का काम करने वाला वहाँ नही रहता ।
वहाँ की जनता मिट्टी के वर्त्तन अन्य स्थानो से लाती है ।
वहाँ उसी ,प्रकार नागमूर्त्तियुक्त धर्मनाथस्वामी की प्रतिमा
सम्यग्दृष्टि यात्रियो के द्वारा बडे समारोहपूर्वक पूजी जाती है ।
आज भी वहाँ इतर धर्म वाले धर्मराज के नाम से उन्हे पुकारते है
और वर्षा न होने पर हजारो घडे दूध से भगवान का अभिषेक
करते हैं । उसी समय वहाँ प्रचुर मेघवृष्टि हो जाती है ।
कन्दर्पा शासनदेवी और किन्नर शासनयक्ष भगवान धर्मनाथ
के भक्त-पूजको के विघ्न दूर कर अर्थ की प्राप्ति भी कराते हैं ।