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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 442 में से

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पृष्ठ 168

पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८५
होते हुए भी कोई नही पूछता था। ब्राह्मणो ने उसका फल इस
प्रकार कहा—गुणवान महात्मा और सज्जनो की पूजा नही होगी
और ऋद्धि भी नही होगी। निर्गुण स्थान, पापी और दुष्ट लोगो
को प्राय कलियुग मे पूजा सत्कार और ऋद्धि प्राप्त होगी।
आगे चल कर राजा ने एक सूक्ष्म छिद्रो वाली शिला को
केशाग्र से बधे हुए अन्तरिक्ष स्थित देखा। वहाँ भी पूछने पर श्रेष्ठ
जनेऊधारी विप्र ने कहा—महाभाग ! कलिकाल मे शिला की
भाँति विपुल पाप होगा और बालाग्र जितना धर्म होगा। पर
उतने से धर्म के माहात्म्य से ही लोग कुछ समय निस्तार करेगे,
उसके टूटने पर सब डूव जायगा।
पूर्वाचार्यो ने भी लोकविख्यात कलियुग माहात्म्य को दूषम
काल मे इस प्रकार बतलाया है—
कूवावाहा जीवण-तरुफलवह-गावि वच्छ धावणया।
लोह विवज्ज(च्च)य कलिमल-सप्प गरुडपूअपूआय ॥१॥
अर्थ—आवाहोपजीवी कूप, फलो के लिए वृक्ष-वध, बछिया
द्वारा गौ का पालन, लोह-कटाह मे कलिमल पाक, सर्पों-दुष्टो की
पूजा और गरुड-धर्मी जनो-की अपूजा होगी।
हत्थगुलि दुग घट्टण-गय-गद्दभ-सगड़-वाल सिलधरण।
एमाई आहारणा लोयमि वि काल दोसेण ॥२॥
अर्थ—दो अंगुलियाँ हाथ का घट्टन करेगी, हाथी के योग्य
शकट गर्दभ लेगे, वालो से शिलाधारण, आदि इस तरह की बाते
लोक मे कालदोष से होगी।
जयघर कलह कुलेयर मेरा अणु सुद्ध धम्म पुठवि ठिई।
वालुग वक्कारभो एमाई आइ सद्धेण ॥ ३ ॥
कलिअवयारे किय निज्जिएसु चउसुपि पडवेसु तहा।
भइ वहाइ कहाए जामि ग जोगमि कलिणाओ ॥ ४ ॥