सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

चारी होगे। मेघ असमय वर्षी और समय पर नही वर्षने वाले
होगे। दुर्जन लोग सुखी और ऋद्धि-सम्मान के पात्र होगे। सज्जन
अल्प ऋद्धि वाले, अपमानपात्र और दुखी होगे। देश में परचक्र,
डमर, दुर्भिक्ष, आदि दुख होगे। अधिकांश पृथ्वि क्षुद्र सत्व हो
जायगी। विप्र लोग धनलोभी और अस्वाध्यायी होगे। श्रमण
लोग कषाय कलुषित मन वाले मन्दधर्मी और गुरुकुल-वासत्यागी
होगे। सम्यग्दृष्टि सत्पुरुष अल्पवल और मिथ्यादृष्टि प्रचुर
शक्तिशाली होगे। देव दर्शन नही देंगे। विद्या-मंत्र उस प्रकार के
प्रभावशाली नही रहेगे। औषधियाँ, गोरस, कर्पूर, शर्करादि द्रव्यो
के रस, वर्ण, गन्धादि की हानि होगी। मनुष्यो के वल, बुद्धि और
आयुष्य का ह्रास हो जायगा। मासकल्पादि के योग्य क्षेत्र नही
रहेगे। प्रतिमारूप श्रावक धर्म का विच्छेद हो जायगा। आचार्य
भी शिष्यो को सम्यक् श्रुत नही देगे।
भरतादि दश क्षेत्रो मे श्रमण कलहकारी, डमर कारी,
असमाधि करने वाले और अनिवृत्तिकारक होगे। मुनियो के दिन
व्यवहार, मन्त्र-तन्त्रादि मे बीतेंगे और इन्ही की साधना मे लग
जाने से उस अनर्थलुब्धो का आगमार्थ नष्ट हो जायगा। जिस
प्रकार राजा व्यापारियो से धन लेने के लिए युद्ध करेगे वैसे ही
साधु लोग भी श्रावको से उपकरण, वस्त्र, पात्र, वसति आदि के
लिए लड़ेंगे। अधिक क्या ? मुण्ड बहुत किन्तु साधु अल्प होगे।
पूर्वाचार्य परम्परागत समाचारी को छोड कर स्वमति
विकल्पित समाचारी को “यही सम्यक् ‘चारित्र है!’” ऐसा कहते
हुए तथा विविध मुग्धजनो को मोह मे डाल कर उत्सूत्रभाषी, अल्प
स्तुति और परनिन्दापरायण कितने ही साधु होगे। म्लेच्छ नृप
बलवान और हिन्दू राजा अल्प बल वाले होगे।
निर्वाण के यावत् १९१४ वर्ष बीतने पर विक्रम संवत् १४४४
मे पाटलिपुत्र नगर मे चैत्र शुक्ल ८ की अर्द्ध रात्रि-वृष्टिकरण-मकर-