विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ७७
अनन्तर शकेन्द्र के आदेश से हरिणेगमेषी ने आश्विन कृष्ण १३
को उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में क्षत्रियकुण्ड ग्राम नगर मे
सिद्धार्थ राजा की त्रिशला देवी के गर्भ से विनिमय कर के गर्भ मे
रखा । सातवे महीने मे माता का स्नेह ज्ञात कर प्रभु ने ऐसा
अभिग्रह लिया कि “मै माता पिता के जीवित रहते श्रमण नही
बनूँगा !” नौ मास और साढे सात दिन बीतने पर चैत्र शुक्ल
त्रयोदशी की अर्द्ध रात्रि मे उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे प्रभु का
जन्म हुआ । माता पिता ने वर्द्धमान नामकरण किया । मेरु-
कम्प, देव गर्व खर्वण (विनाश), इन्द्र व्याकरण प्रणयन अवदान
प्रगट कर भोगो को भोग कर, माता-पिता के स्वर्ग जाने पर, तीस
वर्ष गृहस्थावास मे रह कर, सम्वत्सरी दान देकर, चन्द्रप्रभा
शिविका मे अकेले एक देवदूष्य से मार्गशीर्ष कृष्ण १० के दिन
उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे छठ्ठ तपपूर्वक अपराह्न मे ज्ञात
खण्ड वन मे निष्क्रान्त—दीक्षित हुए । दूसरे दिन बहुल विप्र ने
पायस-क्षीर से पारणा कराया । पञ्च-दिव्य प्रादुर्भूत हुए । फिर
बारह वर्ष साढे छः मास तक मनुष्य, देव और तिर्यञ्चो द्वारा किये
हुए उपसर्गों को सहन कर उग्र तपश्चर्या-करके जभिय गाँव मे
ऋजुवालुका तट पर गोदोहनासन मे छठ्ठ भक्त से उसी उत्तरा-
फाल्गुनी नक्षत्र मे वैशाख शुक्ल दशमी के तृतीय प्रहर मे केवल-
ज्ञान प्राप्त हुए । ग्यारस के दिन मध्यम पावा मे महसेन वन मे
तीर्थ प्रवर्त्तन किया । इन्द्रभूति प्रमुख गणधरों को सपरिवार
दीक्षित किया । दीक्षा-दिवस से भगवान के ४२ वर्षा-चातुर्मास हुए
यथा—१ अस्थिग्राम मे, ३ चम्पा—पृष्ठचम्पा मे, १२ वैशाली—
वाणियग्राम मे, १४ नालन्दा-राजगृह मे, ६ मिथिला मे, २ भद्रिका
मे, १ अलभिका मे, १ पणिय भूमि मे, १ श्रावस्ती मे । फिर
अन्तिम मध्यम-पावा मे हस्तिपाल राजा के अभुक्तमान शुल्क-
शाला मे हुआ । वहाँ आयु शेष जानते हुए स्वामी ने सोलह प्रहर
तक देशना की ।