विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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तत्तो जुहिट्ठिलेण जियमि ठइयमि दाइए तमि ।
एमाई अट्ठुत्तर सएण सिट्ठा नियठिइ त्ति ॥ ५ ॥
इन गाथाओ का अर्थ
कूप से आवाह आजीविका करेगा। इसका उपनय राजा कूप-
स्थानीय है वह आवाहस्थानीय ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र सभी के
भरण-पोषण करने योग्य है पर कलियुग-दोष से उन्ही से अर्थ
ग्रहण करेगा (१)। तथा फल के लिए वृक्ष का वध और छेद होगा।
फलतुल्य पुत्र तरुतुल्य पिता का वध-हानि-उद्वेग, धनप्राप्ति
लेखनादि से उपार्जन करेगे (२)। वछिया तुल्य कन्या के विक्रय
से गोतुल्य जननी धावन तुल्य उपजीवन करेगी (३)। लोहमयी
कडाई—जो सुगन्धित तैल-घृत पाक के उचित है उसमे कलिमल
रूप पिशित आदि का पाक होगा। याने स्वजाति वर्ग को छोड-
कर अनालवद्ध पराये जनो मे अर्थदान होगा, ये भाव है (४)। सांप
जैसे धर्मवर्जित निर्दयो का दानादि सत्कार होगा, गरुड़ स्थान
पूज्य धर्माचार्यों की अपूजा होगी (५)।
दो अगुलियो से हाथ का घाटन और स्थापन होगा। हाथ के
तुल्य पिता का अंगुली द्वय तुल्य बहुत से पुत्रो द्वारा जयघर झगडा
करने-वशीभूत करने वाले घट्टण नामक लोग होगे (६)। हाथी से
वहन करने वाले शकट को गर्दभ के द्वारा ग्रहण किए देखा। उसका
फल—गजस्थानीय उच्चकुलो मे जो मर्यादा रूपी शकट वाहन
के उचित थे उनमे कलह और पुनर्विवाह होगे। इतर गर्दभ
स्थानीय नीच कुलो मे उत्तम नीति होगी (७)। बाल से बंधी हुई
शिला आकाश मे लटकती देखी, थोडा भी सूक्ष्मतर बाल स्थानीय
शास्त्रानुसार शुद्ध धर्म है। शिला तुल्य पृथ्वी उसके निवासी लोग
स्थिति निर्वाह करेगे (८)। जैसे वालुका से बनाई रस्सी नही
पकडी जा सकती उसी प्रकार वाणिज्य-कृषि, सेवा आदि आरभ
से भी विशिष्ट प्रासादानुरूप फल प्राप्त नही होगा (९)।