विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपावापुरी-दीपावली-बृहत्कल्प ८१
गर्दभक-छीलर युक्त वन गए हैं। कमल विरल रूप मे ऊकरडी
पर उगे हुए हैं किन्तु वैसे रमणीय नही। यहाँ पद्माकरो के स्थान
पर धर्मक्षेत्र और सुकुल जानने चाहिए। धर्म प्रतिपत्ति रूप तथा
साधु-श्रावक सघ रूप कमलादि उसमे नही हैं। जो धर्म स्वीकार
करेंगे वे भी कुशील संसर्गी और लोलुप परिणाम वाले हो जाएगे।
ऊकरडे के स्थान पर प्रत्यन्त क्षेत्र अथवा नीच कुलादि जानना
चाहिए, उनमें धर्मप्रवृत्ति होगी वे भी अर्थानुपत्ति दोष से लोगो
के द्वारा तिरस्कृत होगे! ईर्ष्यादि दोष दुष्ट होने से अपनी कार्य-
सिद्धि नही कर सकेगे।
सातवाँ स्वप्न यह है—कोई दुर्विदग्ध कृषक जले हुए और
घुन लगते हुए ऊगने के अयोग्य वीजो को अच्छे वीज मानता हुआ
ऊषरादि खेतो में विखेर कर वो रहा है। उन बीजो मे आया
हुआ कोई विरल शुद्ध वीज वह हटा देता है। इसका फल यो है—
कृषक स्थानीय दानधर्मरुचि जीव हैं, वे दुर्विदग्ध हैं, किन्तु
अपने आप को ज्ञायक मानते हुए अप्रायोग्य सघ भक्तादि दान को
प्रायोग्य मानते हुए उन वस्तुओ को भी अपात्रो को देते हैं। यहाँ
चतुर्भंगी है—एक शुद्ध अप्रायोग्य मे किञ्चित् शुद्ध देने योग्य
होता है, उसको दूर कर देते हैं, अथवा आये हुए सुपात्र को
परिहार कर देगे। इस प्रकार के दान, दायक और ग्राहक होगे।
अन्यथा भी व्याख्या है—अबीज के स्थान पर असाधु जानना
चाहिए। दुर्विदग्ध लोग उन्हे भी साधु-बुद्धि से ग्रहण करेंगे।
अस्थानो मे अविधि से स्थापित करेंगे। जैसे कोई दुर्विदग्ध कृषक
अबीजो को भी बीज और बीजो को अबीज मानता हुआ उस
प्रकार से वहाँ वोता है जहाँ कीडे आदि खा जाते हैं अथवा
चतुष्पदादि नष्ट कर दे। अथवा अन्यथा उगे हुए भी नही काटे
जाते। इस प्रकार अज्ञानी धर्म श्राद्ध वाले सुपात्रो को भी अविधि
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