विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिथिलातीर्थ-कल्प ७१
अपनी शक्ति से जो इस गिरि को वन्दन करते है वे अचल
उदय को प्राप्त करते है—ऐसा भगवान महावीर ने वर्णन किया,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२१)
प्रभु के कहे हुए पुण्डरीक अध्ययन को गौतम द्वारा पढने से
(बोध पाकर) तिर्यंक जृम्भिकदेव दशपूर्वी वज्रस्वामी हुए, उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२२)
जहाँ जिनेश्वरो का स्तवन कर लौटते श्रीगौतम स्वामी ने
पन्द्रह सौ तापसो को दीक्षित किया उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (२३)
इस प्रकार अष्टापद पर्वत के समान अष्टापदमय चिरस्थायी
महातीर्थ वर्णन किया गया हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय
हो । (२४)
यह अष्टापद महातीर्थ-कल्प समाप्त हुआ, यह श्रीधर्मघोष
सूरि की रचना हैं। इसके ग्रन्थाग्र० ३० और २२ अक्षर सख्या है।
१९. मिथिलातीर्थ-कल्प
देवताओसे प्रणत श्री मल्लिनाथ और नमिनाथ जिनेश्वर के
चरणकमलो मे प्रणाम कर के मैं मिथिला महानगरी का कल्प
लेशमात्र कहता हूँ ।
इसी भारतवर्ष मे पूर्व देश मे विदेह नामक जनपद है तो
वर्त्तमान काल मे तिरहुत देश कहलाता है। वहाँ प्रत्येक घर मे