विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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अवहुमान अभक्ति आदि उस प्रकार करेगे कि जिससे पुण्य का
प्रसव अक्षम हो जायगा।
आठवाँ स्वप्न यह है—प्रासाद के शिखर पर क्षीरोद से भरे
सूत्रादि से अलकृत ग्रीवा वाले कलश हैं, दूसरे भूमि पर उतारे
हुए कलश पड़े हैं। कालान्तर मे वे शुभ कलश अपने स्थानो से
चलित हो उन पुराने घडो के ऊपर गिरे जिससे वे फूट गए।
इसका फल यह है—कलश स्थानीय सुसाधु हैं, पहले उग्र
विहार से विचरते थे। पूज्य हो कर भी कालादि दोष से सयम
स्थान से चलित हो कर अवसन्नभूत शिथिलाचारी हो जावेगे।
दूसरे पार्श्वस्थादि भूमिस्थित-भूमिज उद्वेलित पाँवो से सैकड़ो
असयम स्थान युक्त वोदे घडो के जैसे निष्पन्न परिणाम वाले होगे।
और वे सुसाधु अन्य विहार क्षेत्रो के अभाव से घूमते हुए वोदे घडो
के समान पार्श्वस्थादि के ऊपर गिर कर पीडा करेंगे। और वे
स्वक्षेत्र पर आक्रमण से पीडित होते हुए निर्दयता से उनके सुष्ठुतर
सक्लेश करेगे। तब वे परस्पर विवाद करते हुए दोनो ही सयम
से भ्रष्ट हो जायँगे।
"कितने ही तप का गौरव करने वाले और दूसरे स्वधर्म
क्रियाओ मे शिथिल, ऐसे दोनो ही मात्सर्यवश अस्पृष्ट धर्म हो
जायँगे।"
फिर कितने ही "पागल न होने पर भी पागल बने राजा" के
आख्यान के अनुसार कालादि दोष होने पर भी अपना निर्वाह
करेगे। उस आख्यान को पूर्वाचार्य इस प्रकार बतलाते हैं—
पूर्वकाल मे पृथ्वीपुरी मे पूर्ण नाम का राजा और उसके
सुबुद्धि मंत्री था। एक वार लोगदेव नामक एक नैमित्तिक आया।
मुबुद्धि मंत्री ने उसे भावी काल का स्वरूप पूछा। उसने कहा—
महीने के वाद यहाँ मेघवृष्टि होगी, जो भी उसका जल पीयेगे वे