विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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वहाँ राजा पुण्यपाल वन्दनार्थ आया और अपने देखे हुए आठ
स्वप्नो का फल पूछने लगा। भगवान कहते हैं वे यों हैं—प्रथम
हिलते हुए प्रासाद पर हाथी खडे हैं, उनके गिरने से कोई उधर
से नही जाता। जो जाते उनमे से कितने ही निकल भी जाते हैं
और कितने उसके गिरने से नष्ट भी हो जाते है। इस स्वप्न का
फल ऐसा है—चलते प्रासाद के स्थान पर दुखमय गृहस्थावास,
सपदाएँ, स्नेह और निवास अस्थिर हैं। अहो ! दूषमकाल से दुष्प्र-
जीवी इत्यादि वचनो से धर्मार्थी श्रावक गजरूप हैं। इतर पर
समय प्राधान्यरूप से वे देशभङ्गादि द्वारा प्रतिहत हो जायँ पर
निकलना नही चाहते। जो लोग व्रत ग्रहण कर निकलते भी है, वे
अविधि से निर्गमन करते हैं, उनका भी विनाश हो जायगा।
गृहस्थ लोगो के सक्लेश मे पडने पर वे भग्न परिणाम वाले होगे।
विरले ही सुसाधु हो कर आगमानुसार गृहस्थो के संक्लेश मे आने
पर भी अवगणना कर के कुलीन होने से सयम का निर्वाह करेगे।
-यह प्रथम स्वप्न का अर्थ है।
दूसरा स्वप्न यह है—वानरो के मध्य मे बहुत से यूथाधिपति
थे वे अमेध्य से अपने आपको लीप रहे है, दूसरे भी ऐसा ही करते
हैं, लोग उन्हे हँस रहे हैं। वानर कहते हैं यह अगुचि नही गोशीर्ष
चन्दन है। ऐसे वानर विरले हैं जो अमेध्य का विलेपन नही
करते। जो नही करते उन पर करने वाले खीजते है। इसका फल
यह है—वानर स्थानीय गच्छगत साधु हैं। कितने ही अप्रमत्त
और कितने ही चल परिणाम वाले हैं। यूथाधिपतियो के स्थान
पर आचार्यादि गच्छाधिपति समझना चाहिए। अशुचि-विलेपन के
स्थान पर उनके द्वारा आधा कर्मादि सावद्य सेवन, अन्य विलिपन
के स्थान पर अन्य साधुओ का भी वैसा ही करना और उसके
कारण लोगो का हँसना, उनकी अनुचित प्रवृत्ति से वचनो द्वारा