सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 162

पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ७९
हीलना है। वे कहेगे कि ये गर्हित नही किन्तु धर्म के अग है।
विरले ऐसे होगे जो उनके अनुरोध करने पर भी सावद्य प्रवृत्ति
नही करेगे। वे उन पर क्रोध करेगे और कहेगे—ये अवगीत है,
अकिञ्चित्कर हैं। यह दूसरे स्वप्न का अर्थ है।
तीसरा स्वप्न यह था—उत्तम छाया वाले क्षीर वृक्ष के नीचे
बहुत से प्रशान्त रूप वाले सिंह-शावक बैठे हैं। लोग उनकी प्रगसा
करते है, अविगमन करते है। और बबूल वृक्षो के नीचे श्वान बेठे
हैं। इसका फल यो है—क्षीर तरु स्थानीय साधुओ के विचरने
योग्य क्षेत्र हैं। श्रावक लोग साधुओ की भक्ति-बहुमान करने वाले,
धर्मोपकरण देने वाले और सुसाधुओ की रक्षा करने वाले है, वे भी
बहुत से सिंहपोतक नियतावासी पार्श्वस्थ, अवसन्न, सक्लेगकारी
साधुरूपी श्वानो के द्वारा रुके हुए है। वे स्वय को जन रजनार्थ
प्रशान्त दिखला कर तथा प्रकार के कुतूहली लोगो के द्वारा प्रगसा
पावेगे, उनके पास जावेगे और उनके वचनो का पालन करेगे।
वहाँ कदाचित् कोई धर्म श्रद्धालु व्यवहार के परिहार करने वालो
से दुखी होगे तो वे तद्भावित श्वानादि से प्रतिहसित होगे। बार-
वार शुद्ध धर्म कहने से उन्हे लोग कहेगे—ये तो भोंकते है। जिन
बवूल के समान कुलो मे वे दुखी होगें ऐसे लोगो से अवर्णवाद के
द्वारा उनका परिहास होगा।- दूषमकाल के प्रभाव से धर्मगच्छ
सिंहपोतक के समान होगे।
चौथा स्वप्न इस प्रकार था—कितने ही कौए वापी के तट
पर तृषा से अभिभूत थे। वे मायासर को देख कर वहाँ जाने
लगे। किसी ने उन्हे रोका—"यह जल नही हैं"। किन्तु उन्होने
विश्वास नही किया, वहाँ गए और नष्ट हो गए। इसका फल यह
है—वापी स्थानीय सुसाधु सत हैं, जो अत्यन्त गम्भीर सुभावितार्थ
और उत्सर्गापवादकुशल हैं। पागल न होने पर भी पागल बने
हुए राजा की भाँति यह जानकर कि कालोचित धर्मनिरत और