विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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श्रीरत्नवाहपुर या रत्नपुर का यह कल्प श्री जिनप्रभ सूरिजी ने
यथाश्रुत निर्माण किया है।
॥ श्री धर्मनाथ की जन्मभूमि रत्नपुर तीर्थ का कल्प समाप्त
हुआ। इसकी ग्रंथाग्र० ३२ और अक्षर २३ है ॥
२१. पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प
श्री महावीर भगवान को नमस्कार करके उन्ही के मोक्षगमन
से पवित्रित, दीवाली महोत्सव की उत्पत्ति से प्रतिबद्ध पावापुरी
का कल्प कहूँगा।
गौड़ के पाडलिपुर मे त्रिखण्ड भरत का स्वामी राजा सम्प्रति
परमश्रावक प्रणत हो कर आर्य सुहस्ति गणधर को पूछता है कि
भगवन् ! लोक और लोकोत्तर का गौरवान्वित यह दीवाली पर्व
कैसे हुआ ? गुरु महाराज कहते हैं—राजन् ! सुनो ।
उस काल उस समय मे श्रमण भगवान महावीरस्वामी प्राण-
तकल्प स्थित पुष्पोत्तर विमान मे बीस सागरोपम आयु परिपूर्ण
कर, वहाँ से च्यव कर तीन ज्ञान के सहित इसी अवसर्पिणी के
तीन आरो के व्यतिक्रान्त होने पर चतुर्थ आरे के पचहत्तर वर्ष
और साढे नौ मास अवशेष रहने पर मिति आषाढ शुक्ल ६ के
दिन उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे माहणकुण्ड ग्राम नगर मे ऋषभदत्त
ब्राह्मण की भार्या देवानन्दा की कुक्षी मे—सिंह, गज, वृषभादि
चतुर्दश महास्वप्न संसूचित—अवतीर्ण हुए। वहाँ ८२ दिन के