सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 156

रत्नवाहपुर-कल्प ७३
यहाँ चरम तीर्थङ्कर-श्री महावीर भगवान ने वर्षाकाल
विताया था।
यहाँ जनकसुता महासती सीता की जन्मभूमि का स्थान
विगाल वट विटपी प्रसिद्ध है।
यहाँ श्री राम-सीताका विवाह-स्थान साकल्लकुण्ड नाम से
लोक मे रूढ है। और यहाँ पाताललिङ्ग आदि अनेक लौकिक
तीर्थ भी विद्यमान हैं।
यहाँ मल्लिनाथ चैत्य मे वैरुंट्या देवी, कुबेर यक्ष एव नमिनाथ
चैत्य मे गधारी देवी और भृकुटि यक्ष आराधक जनो के विघ्न
अपहरण करते हैं।
जिनमार्ग मे स्थित जो लोग इस मिथिला कल्प को सुनते और
पढते हैं, उनके कण्ठ मे मुक्ति श्रीवरमाला डालती है। ('जिणपह'
शब्द से कल्प रचयिता श्री जिनप्रभ सूरि का नाम भी समझना
चाहिए)।
श्री मिथिला तीर्थ का कल्प समाप्त हुआ। यह ग्रन्थाग्रं० ३४
अक्षर १८ परिमित है।
■
२०. रत्नवाहपुर-कल्प
श्री रत्नवाहपुर स्थित श्री धर्मनाथ भगवान को नमस्कार
करके उसी पुर-रत्न का कल्प किंचित् करता हूँ। इसी जम्बूद्वीप
नामक द्वीप मे भारतवर्ष के कोगल जनपद मे नानाजातीय उच्च-