विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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स्तरीय शाखा वाले बहुल दलकुसुम-फलाच्छादित, सूर्य-रश्मि
अगम्य गहन वन मण्डित, निर्मल-शीतल वाले निर्झर, घर्घर नद से
मनोहर रत्नवाह नामक नगर है। वहाँ इक्ष्वाकु कुल दीपक स्वर्ण
वर्ण और वज्र लाञ्छन युक्त ४५ धनुष प्रमाण देह वाले पन्द्रहवे
तीर्थङ्कर विजयविमान से अवतीर्ण होकर भानु नरेन्द्र के घर
सुव्रता देवी की कुक्षी से पुत्ररूप मे अवतरित हुए और गुरुजनो
द्वारा धर्मनाथ नाम रखा गया। उनके जन्म-दीक्षा और केवलज्ञान
कल्याणक भी यही हुए और समेत शिखर पर निर्वाण हुआ। इसी
नगर मे लोगो के नेत्रो को शीतलता प्रदान करने वाला, नाग-
कुमार देव द्वारा अधिष्ठित श्री धर्मनाथस्वामी का चैत्य समय
आने पर बना।
उस नगर मे एक कुम्भार अपने शिल्प मे निष्णात था।
उसका पुत्र तरुणावस्था प्राप्त करके भी क्रीडा की दुर्लिप्सा से घर
से वहाँ के रमणीयक शालिनी चेत्य मे आकर यथेच्छ द्यूतादि
क्रीडा किया करता था। वहाँ एक केलिप्रिय नागकुमार देव भी
मानव देह धारण कर कुम्भार के लडके के साथ प्रतिदिन क्रीडा
करने लगता। अपने कुलक्रमागत कुलाल कर्म का धन्धा न करने
के कारण उसका पिता हमेशा उसे दुर्वचनो से फटकारता। जब
वह पिता की वात नही मानता तो पिता उसे मार-पीट कर मिट्टी
खोदने व लाने आदिका काम कराता। फिर भी वह मौका पाकर
बीच-बीच मे उसी चैत्य मे जा कर नागकुमार के साथ खेलने
लगता।
नागकुमार ने पूछा—पहिले की तरह निरन्तर खेलने नही
आते ? उसने कहा—मेरा पिता क्रुद्ध होता है अत उदर-पूर्ति के
लिए कुछ अपना काम भी करना पडता है। नागकुमार ने
कहा—यदि ऐसी वात है तो खेल के पश्चात् मैं पृथ्वी पर लोट