विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८७
शेष दो गाथाओ का अर्थ कथानकगम्य है वह इस प्रकार है—
पाँच पाडवो ने दुर्योधन, दु शासनादि सौ भाइयो और कर्ण,
गांगेय, द्रोणाचार्य आदि संग्राम के अग्रणी लोगो को मार दिया।
बहुत काल तक राज्य का परिपालन कर कलियुग-प्रवेग के समय
महापथ मे प्रस्थान किया। किसी वन-प्रान्त मे पहुचे, वहाँ रात्रि
मे युधिष्ठिर ने भीम आदि को प्रतिप्रहर प्रहरिक—पहरेदार रूप से
नियुक्त किया। धर्मपुत्रादि के सो जाने पर पुरुप रूप करके कलि
भीम के सम्मुख उपस्थित हुआ। उसने भीम से कहा—अरे!
भाइयो, गुरुओ, पितामह आदि को मार कर अव तुम धर्मार्थ जा
रहे हो ? यह तुम्हारा कैसा धर्म है। तब भीम क्रुद्ध हो कर उसके
साथ युद्ध करने लगा जैसे जैसे भीम युद्ध करता था वैसे वैसे कलि
वढता जाता था, कलि ने भीम को जीत लिया। इसी प्रकार दूसरे
प्रहर मे अर्जुन को, तीसरे मे नकुल को और चौथे मे सहदेव को
उसने कहा। उन्होने क्रोध किया और वे भी हार गए। कुछ रात्रि
शेष रहे युधिष्ठिर उठे, कलि उनके साथ भी युद्ध करने को प्रस्तुत
हुआ। तब गान्ति से ही राजा ने कलि को जीत लिया और छोटा
सा बना कर सराव मे बैठा दिया और प्रात भीमादि को दिखला
कर कहा—यह वही है जिसने तुम्हे जीत लिया था। इत्यादि
कलिस्थिति के १०८ हृष्टान्त महाभारत मे व्यास ऋषि ने दिखाये
हैं। अस्तु,
तदनन्तर गौतम स्वामी ने जानते हुए भी पूछा—भगवान् !
आपके निर्वाणानन्तर क्या-क्या होगा ? प्रभु ने कहा—गौतम !
मेरे निर्वाण के तीन वर्ष साढे आठ मास बीतने पर पाँचवा दु षम
आरा लगेगा। मेरे मोक्ष गमन के ६४ वर्ष हो जाने पर अन्तिम
केवली जम्बूस्वामी मुक्ति जावेगे। उन्ही के साथ मन पर्यव ज्ञान,
परमावधि ज्ञान, पुलाक लब्धि, आहारक गरीर, क्षपकश्रेणी,