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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 442 में से

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पृष्ठ 171

उपशमश्रेणी, परिहार विशुद्ध-सूक्ष्म सपराय और यथाख्यात
चारित्र, केवलज्ञान और सिद्धि गमन ये बारह स्थान भारतवर्ष मे
विच्छेद हो जाएँगे ।
अज्ज सुहम्मप्पमुहा होंहिति जुगप्पहाण आयरिया ।
दुप्पसहो जा सूरी चउरहिआ दोण्णि अ सहस्सा ॥१॥
[ आर्य सुधर्म आदि से लेकर दु प्रसह सूरि पर्यन्त दो हजार
चार युग प्रधानाचार्य होगे ।]
एक सौ सत्तर से कुछ अधिक वर्ष बीतने पर स्थूलिभद्र के
स्वर्गस्थ होने पर अंतिम चार पूर्व, समचतुरस्र सस्थान, वज्र
ऋषभ नाराच संघयण, और महाप्राण ध्यान विच्छेद हो जाएँगे ।
पाँच सौ वर्ष बीतने पर आर्यवज्र के साथ दशवाँ पूर्व और चतुष्क
संघयण नष्ट हो जायगा ।
मेरे मोक्षगमन के पश्चात् पालक, नंद, चंद्रगुप्त आदि राजाओ
के हो जाने के पश्चात् चार सौ सत्तर वर्ष बाद विक्रमादित्य राजा
होगा । इस बीच ६० वर्ष पालक का राज्य, १५५ वर्ष नन्दो का,
१०८ वर्ष मौर्यवंशियो का, ३० वर्ष पुष्यमित्र का, ६० वर्ष
बलमित्र-भानुमित्र का, ४० वर्ष नरवाहन का, १३ वर्ष गर्दभिल्ल
का, ४ वर्ष शको का फिर विक्रमादित्य का राज्य होगा । वह
स्वर्णपुरुष सिद्ध किया हुआ और पृथ्वी को अनृण करके अपना
संवत्सर चलायगा ।
निर्वाण के चार सौ त्रेपन वर्ष वाद गुण शत कलित श्रुत
प्रयुक्त, गर्दभिल्ल के छेदक कालकाचार्य होगे ।
दूषम काल के प्रभाव से बडे नगर गाँव जैसे हो जाएँगें और
गाँव स्मशान जैसे हो जावेंगे । राजा लोग यमदण्ड जैसे, कौटुम्बिक
दासप्राय सरकारी कर्मचारी घूसखोर, भृत्य स्वामीद्रोही, सासूएँ
कालरात्रितुल्य, बहुएँ सर्पिणीतुल्य, कुलाङ्गनाएँ निर्लज्ज कटाक्षो से
देखने वाली वेश्याचरण शिक्षित होगी । पुत्र और शिष्य स्वच्छन्द-