विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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भावी मूचना देने वाले आठ स्वप्नो का फल श्रवण करके पुण्यपाल
राजा प्रव्रजित होकर मोक्ष गए ।
इस दूषम समय के विलास को लौकिक मे भी कलिकाल नाम
से पुकारते हैं । जैसे—पूर्वकाल मे द्वापरयुगोत्पन्न राजा युधिष्ठिर
ने राजवाटिका जाते हुए किसी स्थान पर बछडी के नीचे एक
गाय को स्तन-पान करते देखा । यह आश्चर्यजनक घटना देखकर
राजा ने द्विजवरो से पूछा—यह कैसे ? उन्होने कहा—देव ! यह
आने वाले कलियुग का सूचक है । इस अद्भुत वात का फल यह
है कि—कलियुग मे माता-पिता अपनी कन्या को किसी ऋद्धि
सम्पन्न घर मे देकर द्रव्य ग्रहणादि द्वारा अपनी आजीविका
चलावेंगे ।
वहाँ से आगे प्रस्थान कर चलते हुए राजा ने किन्ही लोगो
को पानी मे भीगी हुई बालुका की रस्सी वटते हुए देखा और
क्षणमात्र मे वह रस्सी वायु के सयोग से नष्ट हो गई । राजा के
पूछने पर द्विज ने कहा—महाराज ! इसका फल यह है कि जिस
द्रव्य को कठिनाई से आजीविका करके वढाएँगे वह धन कलियुग
मे चोर-अग्नि-राजदण्डादि से विनष्ट होगा ।
फिर आगे चलकर धर्मपुत्र ने देखा आवाह (खेली) से वह कर
उलटा जल कुएँ मे गिरता है । वहाँ भी ब्राह्मणो ने कहा—जिस
द्रव्य को असि-मसि-कृषि और वाणिज्यादि द्वारा प्रजा उपार्जन
करेगी वह सब राजकुल मे चला जायगा । जहाँ दूसरे युगो मे तो
राजा लोग अपना द्रव्य देकर लोगों को सुखी करते हैं ।
आगे जाते हुए फिर राजा ने राय चम्पा और शमीवृक्ष-खेजडी
को एक ही प्रदेश मे देखा । वहाँ लोगो को शमी वृक्ष की वेदिका
वाँधकर गंध-माल्यादि से अलंकृत कर गीत नृत्य महिमादि करते
हुए देखा और दूसरे छत्राकार वृक्ष को सुगन्धित पुष्पो से समृद्ध