सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

अनिश्रित के समीप भी रहना चाहिए । यहाँ काक के समान
अत्यन्त वक्र जड अनेककलकोपहृत धर्मार्थी जानना चाहिए । वे
आज भी धर्म श्रद्धा से अभिभूत हैं । मायासुर के स्थान पर पूर्वोक्त
विपरीत धर्माचारी हैं । अत्यन्त कष्टानुष्ठान निरत भी अपरिणत
होने से अनुवाद प्रवृत्तता से कर्मबन्ध के हेतु हैं । उन्हे देख कर
मूढ धार्मिक जन वहाँ जायँगे । उन्हे कोई गीतार्थ कहे कि ये धर्म
मार्ग नही हैं किन्तु धर्माभास हैं, तो भी विश्वास न करते जावेगे
वे ससार मे पतन से नष्ट होगे । जो उनके वचन से रुकेगे वे ही
अमूढ धर्मसाधक होगे ।
पाँचवा स्वप्न यह है—विषय वन मे मृत सिंह अनेक गीदडो
से घिरा हुआ है किन्तु कोई भी शृगालादि उसका विनाश नही
कर रहे हैं । कालान्तर मे उस मृत सिंह के कलेवर मे कीडे उत्पन्न
हो गए और सिंह को खाने लगे, यह देख कर शृगालादि उपद्रव
करने लगे । इसका फल—उपनय यो है कि—सिंह के स्थान पर
परवादिमत दुर्द्धर्ष प्रवचन है । वन के स्थान पर प्रविरल सुपरीक्षक
धर्मी जनो वाला भारतवर्ष है । शृगाल गणो के स्थान परतीथि-
कादि प्रवचन प्रत्यनीक है । वे ऐसा मानते हैं कि यह प्रवचन हमारे
पूजा सत्कार दानादि का उच्छेद करने वाला है, अत. जैसे तैसे नष्ट
हो जाय । वह विषम अमध्यस्थ जनो से परिपूर्ण है और वह
प्रवचन मृत अतिशय व्यपगम से निष्प्रभाव होगा । तो भी प्रत्यनीक
जन भय से उसे उपद्रुत नही करेगे । वास्तव मे यह परोत्पर
सुस्थित और सगत है । काल-दोष से उसमे प्रवचन निर्द्धंश करने
वाले मतान्तरीय रुपी कीड़े उत्पन्न हो जाएँगे और वे परस्पर
निन्दा-भण्डनादि से शासन का लाघव करायेंगे । उसे देख वे
प्रत्यनीक भी “ये परस्पर न मिले” इसलिये निश्चय निरतिशेप
मात्र प्रवचन को निर्भयता से उपद्रव करेंगे ।
छठा स्वप्न यो है—पद्माकर सरोवरादि विना पद्म वाले और