विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६३
महाराज के मुख से उसने पच परमेष्ठी नवकार मंत्र सीखा । वह
चपलतावश धनुष-तीर लेकर अक्षय पट्ट (चावल चढाने का पाटा)
पर आते हुए चूहो को अचूक लक्ष से मारने लगा । तब श्रावको
ने उसे मन्दिर से निकाल दिया । अव वह लोगो की गायो की
रक्षा करने लगा ।
एक दिन नगर के बाहर भ्रमण करते हुए उसे किसी योगी ने
देखा और उसे बत्तीस लक्षण धारी ज्ञात कर स्वर्णपुरुष सिद्ध
करने के लिए उसके पीछे-पीछे जाकर उसकी माँ की अनुज्ञा लेकर
वहाँ निवास कर लिया । अवसर पाकर एक दिन उस योगी ने
नाहड़ से कहा—"गायो की रखवाली करते हुए तुम्हे रक्त दुग्ध
वाला कुलिस वृक्ष (थोहर ?) मिले, यहाँ चिन्ह करके मुझे कहना ।"
बालक ने कहा—ठीक है । दैवयोग से एक दिन उसने वैसा देख
कर योगी को बतलाया । दोनो वहाँ गए, यथाविधि अग्नि जला-
कर उसमे रक्तक्षीर प्रक्षिप्त कर योगी के प्रदक्षिणा देने पर नाहड़
ने भी अग्नि की प्रदक्षिणा दी । किसी प्रकार योगी की दुष्ट चित्त-
वृत्ति ज्ञात कर राजपुत्र नाहड़ ने नवकार मन्त्र का स्मरण किया ।
उसके प्रभाव से योगी निष्प्रभ हो गया, नाहड़ ने उसे ही अग्नि
मे डाल दिया, वह स्वर्णपुरुष बन गया ।
नाहड़ ने विचार किया — अहो ! मन्त्र का कैसा माहात्म्य है ।
इसके दाता गुरु महाराज का मैं कैसे प्रत्युपकार करूँगा ? फिर
उसने गुरुचरणो मे आकर नमस्कार किया और सारा स्वरूप
बताते हुए कहा—कुछ आज्ञा दीजिए !
गुरु महाराज के वचनो से नाहड ने चौवीस उत्तुङ्ग शिखर
वाले चैत्य बनवाये । क्रमश वह प्रवर राज्यश्री को प्राप्त हुआ ।
बडी भारी सेना के साथ जाकर उसने अपना पैतृक स्थान ग्रहण
किया ।
६६ विविध तीर्थ-कल्प
देवपत्तन गयी । वीर प्रभु की रथारूढ प्रतिमा अदृश्य रूप से चल
कर आश्विन-पूर्णिमा के दिन श्रीमालपुर (भीनमाल) मे आयी ।
अन्य सातिशय देवप्रतिमाएँ भी यथोचित स्थान मे चली गयी ।
नगरदेवता ने श्री वर्द्धमानसूरि को सकेत दिया कि जहाँ भिक्षा
मे प्राप्त क्षीर रुधिर हो कर पुन क्षीर हो जाय वही साधुओ को
रह जाना है ।
हमीर की उस सेना ने विक्रम संवत् ८४५ मे वल्लभी भग कर
के वहाँ के राजा को मार डाला । हमीर अपने स्थान लौट गया ।
इसके बाद एक बार अन्य गजनीपति म्लेच्छ राजा गुजरात
का भग कर के लौटते हुए विक्रम स० १०८१ मे साचौर पहुँचा ।
उसने वहाँ भ० महावीर का मनोहर जिनालय देखा । मारो-मारो
वोलते हुए म्लेच्छ लोग प्रविष्ट हुए और हाथी जोत कर भगवान्
महावीर को खीचा, भगवान स्वस्थान से लेशमात्र भी न चले ।
फिर बैल जोत कर खीचने पर पूर्वभव राग से ब्रह्माशान्ति ने प्रभु
को चार अगुल सरकाया । गजनीपति के स्वय हाँकने पर भी
भगवान निश्चल हो कर रहे, म्लेच्छपति उदास हो गया । फिर
घन-हथोडो से महावीर स्वामी (प्रतिमा) को ताडन किया, जिसकी
चोटें अन्त पुर की स्त्रियो के लगने लगी । तब मात्सर्य-विह्वल
तुर्कों ने तलवार से भगवान महावीर की अगुंली काट ली और
उसे लेकर वे चल पडे । तब घोडो की पूँछें जलने लगी और
म्लेच्छ लोग मूर्च्छित होने लगे । फिर वे घोडो को छोड कर पैदल
ही भगे और धसमसते हुए जमीन पर गिर पडे । वे सर्वबल-क्षीण
हो कर दोनतापूर्वक बिलबिलाते हुए रहमान को याद करने
लगे । तब अदृश्य आकागवाणी हुई कि वीर प्रभु की अगुंली लाने
से तुम लोगो का जीवितव्य ही संशय मे पड गया है ।
गजनी वादशाह ने तब विस्मित चित्त से मस्तक धुनते हुए
सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६७
सेनापति को आज्ञा दी कि यह अंगुली वापस ले जा कर वही लगा
दो । वे लोग भीतिपूर्वक अंगुली वापस लाये और वह तुरंत
स्वामी के हाथ पर जा लगी । यह आश्चर्य देख कर तुर्क लोग
कभी स्वप्न मे भी साचोर का मार्ग नही पकडेगे । चतुर्विध सघ
सन्तुष्ट हुआ, वीर प्रभु के मन्दिर मे गीत, नृत्य, वाजित्त्र, पूजा
दानादि से धर्म-प्रभावना होने लगी ।
अन्यदा बहुत सा काल बीत जाने पर मालवपति गुजरात का
भग करने साचोर की सीमा पर पहुँचा । उस समय ब्रह्मशान्ति
यक्षराज ने प्रचुर सैन्य विकुर्वण करके उसे भग्नबल अर्थात् परा-
जित कर दिया । उसके आवास-शिविर मे वज्राग्नि उठी । मालव-
पति कोश और कोष्ठागार छोड कर भाग छूटा ।
फिर एक बार सं० १३४८ मे प्रवलका फिर सेना देश का
भग करती हुई नगर ग्रामो को नष्ट करती हुई चली आ रही थी
तो जिनालय के द्वार वन्द करके चार योजन मे ब्रह्मशान्ति यक्ष
के माहात्म्य से अनाहत गम्भीर स्वर युक्त वाजित्त्र श्रवण कर
श्री सारगदेव महाराजा की सेना के आगमन की आशका से
मुगल सेना भाग छूटी और साचौर की सोमा पर भी पैर नही
दिया ।
विक्रम सवत् १३५६ मे अलाउद्दीन सुलतान का छोटा भाई
उलूखान ने मत्री माधव से प्रेरित हो कर दिल्ली से गुजरात की
ओर प्रस्थान किया । उस समय चित्रकूटाधिपति समरसिंह ने दण्ड
दे कर मेवाड देश की रक्षा की । तब हमीर युवराज वागड देश
के मुहडासा आदि नगरो को भग करके आसावाल्ली (अहमदाबाद)
पहुँचा । राजा कर्णदेव भग गया । सोमनाथ को घन-घात से तोड
कर गाडो में भर के दिल्ली भेजा । वामनस्थली जा कर मण्डलीक
राजा को दण्डित किया । सौराष्ट्र मे अपनी आज्ञा प्रवर्त्तित कर
आसावल्ली मे रहा । उसने मठ-मन्दिर और देव-कुलो को जलाया ।
६४ विविध तीर्थ-कल्प
एक दिन उसने श्रीजज्जिंगसूरि से प्रार्थना की—भगवन् !
कुछ ऐसा आदेश दीजिए जिस कार्य से आपकी और मेरी कीर्त्ति
चिरकाल तक फैले। तब गुरु महाराज ने जहाँ चारो थणो से
गाय दूध झरती थी, वह भूमि अभ्युदयकारी ज्ञात कर राजा को
दिखाई।
राजा ने गुरु महाराज के आदेश से सत्यपुर (साचौर) मे
भगवान महावीर के ६०० वर्ष बीतने पर एक गगनचुम्बी शिखर
वाला जिनालय बनवाया। आचार्य श्री जज्जिंगसूरि ने वहाँ
पित्तलमय श्री महावीर भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित की। जब
सूरि महाराज प्रतिष्ठा कराने के लिए चले तो अन्तराल मे एक
उत्तम लग्न के समय नाहड राजा के पूर्वपुरुष विङ्गराय की
अश्वारूढ प्रतिमा का प्रतिष्ठा की। दूसरे लग्नविशेष मे पृथ्विी
के मैण जैसी नरम होने पर शंख नामक शिष्य ने गुरु महाराज
के आदेश से दण्डघात द्वारा कुंआ बनाया। आज भी वह शंख-
कूप कहलाता है। वह कुंआ अन्य दिनो मे सूखा होनेपर भी
वैशाखी पूर्णिमा के दिन पानी से भर जाता है। तीसरे लग्न में
भगवान महावीर स्वामी की प्रतिष्ठा की। उसी लग्न मे “दुग्गा
सूअ” गाँव मे और ‘वय णप’ गाँव मे साधु श्रावक के हाथ से
वासक्षेप भेजकर महावीर भगवान की दो प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित
कराईं। उस (सत्यपुरीय) वीर प्रभु की प्रतिमा की राजा नित्यप्रति
पूजा करता है।, इस प्रकार नाहड राजा ने वह बिम्ब कराया।
वहाँ ब्रह्मशान्तियक्ष की सन्निहित प्रातिहार्य से अहर्निश
पर्युपासना होती है। वह यक्ष पहले धनदेव सेठ का वृषभ था।
उसने वेगवती नदी से पाँच सौ गाडे निकाले। सेठ ने सन्तुष्ट हो
कर बैल के चारा-पानी के लिए वर्द्धमान ग्राम निवासी लोगो को
वेतन-धन समर्पण किया। उन ग्रामीणो ने धन लेकर भी उस
वृषभ की कोई सार-सभाल नही की। वह अकाम निर्जरा से मर
सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६५
के व्यन्तर जाति मे शूलपाणि नामक यक्ष उत्पन्न हुआ । विभंग-
ज्ञान से अपना पूर्व जन्म का व्यतिकर ज्ञात कर उस गाँव मे
मात्सर्यवश मारि उत्पन्न कर दी । गाँव वालो ने दुखी हो कर
स्नान वलि-कर्म पूर्वक हाथ मे धूप लेकर कहा—जिस देव-दानव
का हमारे से कुछ भी अपराध हुआ हो वह प्रसन्न हो । तत्र उस
यक्ष ने पूर्वभव-वृषभ का वृत्तान्त कहा । लोगो ने उसी वृषभ के
अस्थि-पुंजपर देवल वनवाया और उसकी प्रतिमा करवाई ।
देवशर्मा को वहाँ देवार्चक—पुजारी स्थापित किया । इस प्रसग से
वर्द्धमान गाँव आस्तिक ग्राम प्रसिद्ध हुआ । शान्ति हुई ।
श्री वर्द्धमान स्वामी छद्मस्थ विहार से विचरते हुए क्रमशः
दुइज्जन्त तापसाश्रम से वर्षावास के लिए उस गाँव मे पधारे ।
गाँव वालो से पूछ कर भगवान उसी देवकुल मे रात्रि के समय
कायोत्सर्ग स्थित रहे । उस मिथ्यादृष्टि देव ने भयङ्कर अट्टहास
किया । हाथी-नाग-पिशाचादि रूप बना कर उपसर्ग किया । शिर,
कान, नासिका, दाँत, आँख, नख और पीठ मे भीषण वेदना उत्पन्न
की । सर्व प्रकार से प्रभु को अक्षुण्ण ज्ञात कर देव उपशान्त हो
हो गया और गीत-नृत्य-स्तुति आदि से पर्युपासना करने लगा ।
इसके वाद उस यक्ष शूलपाणि का नाम ब्रह्मशान्ति प्रसिद्ध हुआ ।
वही यक्ष साचौर के वीर-चैत्य मे प्रतिष्ठाविशेष से निवास
करता है ।
पश्चिम गुजरात मे वल्लभी नामकी समृद्धिशाल नगरी थी
जिसमे शीलादित्य नाम का राजा था । उसने रत्नजटित कागसी
के लोभ मे आकर राका नामक सेठ का पराभव किया । कुपित
सेठ उसे विग्रहणार्थ गज्जणपति हमीर को प्रचुर धन देकर उसकी
विशाल सेना चढा लाया । उस समय चन्द्रप्रभ स्वामी की प्रतिमा,
अम्बा और क्षेत्रपाल युक्त अधिष्ठायक के बल से गगन-मार्ग द्वारा
५
६८ विविध तीर्थ-कल्प
क्रमश सात सौ देग में आया । तब साचौर मे उसी प्रकार अना-
हत वाजित्रो को सुन कर म्लेच्छो का दल पलायन कर गया ।
इस प्रकार पृथ्वीमण्डल मे साचौर के वीर प्रभु के अनेक अवदान
पवाडे (पायढा) सुने जाते हैं ।
व्यन्तर देव केलिप्रिय होते ही है अब अलघनीय भवितव्य
और दूषमकाल के विलसित प्रभाव के कारण मदिर मे गोमांस-
रुधिर के छीटने से देवता लोग दूर चले जाते है। अधिष्ठायक
ब्रह्मशान्ति यक्ष के प्रमादवश असन्निहित अवस्था मे राजा
(सुलतान) अलाउद्दीन ने उस अनल्प माहात्म्य वाले भगवान
महावीर की प्रतिमा को सवत् १३६७ विक्रमीय मे दिल्ली लाकर
आशातना भाजन किया ।
कालान्तर मे फिर भी दूसरी प्रतिमाएँ वहाँ प्रगट प्रभावी और
पूजनीय होगी ।
साचोर तीर्थ का यह कल्प अप्रमेय महिमा वाला और वांछित
फल-सिद्धिकारक है । श्रीजिनप्रभसूरि कहते हैं भव्यजन नित्य पढें ।
श्री सत्यपुर-साचोर तीर्थ कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रन्थसख्या
१६१ और ३ अक्षर हैं ।
•
१८. अष्टापद महातीर्थ-कल्प
(श्री धर्म घोषसूरि कृत)
जो श्रेष्ठ धर्म, कीर्त्ति और विद्याओ के आनन्द के आश्रम भूत
भगवान ऋषभदेव द्वारा पवित्रित है और देवेन्द्रो से वन्दित है उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१)
अष्टापद महातीर्थ-कल्प ६९
जहाँ आपदाएँ नष्ट करने वाले अष्टापद आदि एक लाख
दोषो को दूर करने वाले स्वर्ण की जैसी आभा वाले भगवान
ऋषभदेव हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२)
भगवान ऋषभदेव के वाहूवलि आदि ९९ पुत्र-प्रवर मुनिगण
जहाँ अजरामर पाये, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (३)
जहाँ प्रभु के वियोग से भीरु दस हजार महर्षि प्रभु के साथ ही
अनशन करके मुक्त हुए उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (४)
जहाँ भगवान ऋषभदेव के साथ आठ पौत्र और ९९ पुत्र एक
समय मे मुक्त हुए, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (५)
तीन चिताओ के स्थान मे जहाँ मूर्त्त रत्नत्रय की भाँति इन्द्र
ने तीन स्तूपो की स्थापना की, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (६)
जहाँ भरत चक्रवर्ती ने सिद्धायतन के समान सिंहनिषद्या
नामक चतुर्मुख चैत्य बनवाया, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (७)
जहाँ एक योजन लम्बा और उससे आधा चौडा एव तीन
कोश ऊँचा चैत्य विराजमान है, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (८)
जहाँ भरत ने भाइयो की प्रतिमाएँ, चौबीस तीर्थंकरो की
प्रतिमाएँ एव अपनी भी प्रतिमा बनवायी, उस अष्टापद गिरिराज
की जय हो । (९)
जहाँ भरत ने अपने-अपने आकार और वर्ण वाले वर्त्तमान
(चौवीसी) के जिनेश्वरो के विम्ब भरवाये, उस अष्टापद गिरिराज
की जय हो । (१०)
जहाँ ९९ प्रतिमाओ से युक्त भाइयो के स्तूप एव अर्हन्त
भगवान के स्तूप बनवाए, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो। (११)
७० विविध तीर्थ-कल्प
भरत द्वारा जहाँ मोहरूपी सिंह का नाश करने के हेतु अष्टा-
पद सिंह की भाँति आठ योजनो वाली पैडियो से सुगोभित है,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१२)
जहाँ भरत चक्रवर्ती आदि अनेको कोटि महर्षियो ने सिद्धि-
साधना की, वह अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१३)
जहाँ सगर राजा के पुत्रो के आगे भरत महाराजा के वंशज
महर्षियो के सर्वार्थसिद्ध एव मोक्ष प्राप्ति करने वालो का सुबुद्धि
ने वर्णन किया, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१४)
जहाँ समुद्र के समान विशाल आशय वाले सगर राजा के पुत्रो
ने गिरिराज के चारो ओर रक्षा के लिए परिखा—सागरखाई
बनाई, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१५)
जहाँ जैन लोग अपने पापो को प्रक्षालन करने के लिए ही
मानो चारो ओर गगा से आश्रित है और हमेशा चचल लहरो से
गोभायमान है उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१६)
जहाँ जिनेश्वर भगवान को तिलक चढाने से दमयन्ती ने
अपने भालस्थल पर स्वाभाविक तिलक रूप अनुरूप फल प्राप्त
किया, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१७)
जहाँ क्रोधपूर्वक उठ कर समुद्र मे फेंकने को प्रस्तुत रावण
को चरणो से दवा कर वालि मुनि ने रुला दिया, उस अष्टापद
गिरिराज की जय हो । (१८)
लकेन्द्र रावण द्वारा जिन-पूजोत्सव के समय अपनी भुजाओ
की ताँत निकाल कर वीणा बजाने से धरणेन्द्र के द्वारा अमोघ
विजया गक्ति उसे मिली, उस अष्टापद गिरिराज की हो (१९)
जहाँ चारो दिशाओ मे चार, आठ, दश और दो जिन प्रति-
माओ को गणधर (श्रीगौतम स्वामी) भगवान ने वन्दन किया,
उस अष्टपद गिरिराज की जय हो । (२०)
मिथिलातीर्थ-कल्प ७१
अपनी शक्ति से जो इस गिरि को वन्दन करते है वे अचल
उदय को प्राप्त करते है—ऐसा भगवान महावीर ने वर्णन किया,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२१)
प्रभु के कहे हुए पुण्डरीक अध्ययन को गौतम द्वारा पढने से
(बोध पाकर) तिर्यंक जृम्भिकदेव दशपूर्वी वज्रस्वामी हुए, उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२२)
जहाँ जिनेश्वरो का स्तवन कर लौटते श्रीगौतम स्वामी ने
पन्द्रह सौ तापसो को दीक्षित किया उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (२३)
इस प्रकार अष्टापद पर्वत के समान अष्टापदमय चिरस्थायी
महातीर्थ वर्णन किया गया हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय
हो । (२४)
यह अष्टापद महातीर्थ-कल्प समाप्त हुआ, यह श्रीधर्मघोष
सूरि की रचना हैं। इसके ग्रन्थाग्र० ३० और २२ अक्षर सख्या है।
१९. मिथिलातीर्थ-कल्प
देवताओसे प्रणत श्री मल्लिनाथ और नमिनाथ जिनेश्वर के
चरणकमलो मे प्रणाम कर के मैं मिथिला महानगरी का कल्प
लेशमात्र कहता हूँ ।
इसी भारतवर्ष मे पूर्व देश मे विदेह नामक जनपद है तो
वर्त्तमान काल मे तिरहुत देश कहलाता है। वहाँ प्रत्येक घर मे
७२ विविध तीर्थ-कल्प
मधुर मञ्जुला फलो के भार से नत कदलीवन दृष्टिगोचर होते
हैं। पथिक लोग भी दूध मे सिद्ध हुए चिउडा और क्षीर का भोजन
करते हैं। पद-पद पर मीठे पानी वाली वापी, कूप, तालाव और
नदियाँ हैं। प्राकृत—ग्राम्य जन भी सस्कृत भाषा विगारद, अनेक
शास्त्रो के प्रशस्त विद्वान् और अतिनिपुण लोग हैं। वहाँ ऋद्धि
से समृद्ध मिथिला नामक नगरी थी जो वर्त्तमान मे जगई नाम से
प्रसिद्ध है। इसके निकट ही जनक महाराजा के भ्राता कनक का
निवासस्थान कनकपुर है।
इस मिथिला नामक नगरी मे कुम्भ राजा और प्रभावती की
कुक्षी से सभूत भगवान मल्लिनाथ स्त्रीतीर्थंकर और विजयनृप-
वप्रादेवी के नन्दन नमि जिनेश्वर का च्यवन, जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए हैं।
यहाँ श्री वीर प्रभु के अष्टम गणधर अकम्पित का जन्म
हुआ है।
यहाँ जुगवाहु-मय णरेहा के पुत्र नमी नामक महाराजा वलय—
चूडियो के शब्द से प्रत्येकबुद्ध हुए और सौधर्मेन्द्र परीक्षित वैराग्य
निश्चय वाले हुए।
यहाँ ही लक्ष्मीगृह चैत्य मे आर्य महागिरि के शिष्य कौण्डिन्य-
गोत्रीय अश्वमित्र श्री वीर-निर्वाण के दो सौ वीस (२२०) वर्ष
बीतने पर अणुप्रवाद पूर्व मे रही हुई नैपुणिका वस्तु को पढते हुए
श्रद्धाहीन हो गया। प्रवचन-स्थविरो द्वारा अनेकान्तिक युक्तियो
से समझाकर मना करने पर भी वह उत्सूत्र प्ररूपणा कर चतुर्थ
निह्नव हुआ।
श्री महावीर स्वामी के पद-पङ्कजो से पवित्रित जल वाली
वाणगगा और गडकी नदियो का सगम इस नगरी को पावन
करता है।
रत्नवाहपुर-कल्प ७३
यहाँ चरम तीर्थङ्कर-श्री महावीर भगवान ने वर्षाकाल
विताया था।
यहाँ जनकसुता महासती सीता की जन्मभूमि का स्थान
विगाल वट विटपी प्रसिद्ध है।
यहाँ श्री राम-सीताका विवाह-स्थान साकल्लकुण्ड नाम से
लोक मे रूढ है। और यहाँ पाताललिङ्ग आदि अनेक लौकिक
तीर्थ भी विद्यमान हैं।
यहाँ मल्लिनाथ चैत्य मे वैरुंट्या देवी, कुबेर यक्ष एव नमिनाथ
चैत्य मे गधारी देवी और भृकुटि यक्ष आराधक जनो के विघ्न
अपहरण करते हैं।
जिनमार्ग मे स्थित जो लोग इस मिथिला कल्प को सुनते और
पढते हैं, उनके कण्ठ मे मुक्ति श्रीवरमाला डालती है। ('जिणपह'
शब्द से कल्प रचयिता श्री जिनप्रभ सूरि का नाम भी समझना
चाहिए)।
श्री मिथिला तीर्थ का कल्प समाप्त हुआ। यह ग्रन्थाग्रं० ३४
अक्षर १८ परिमित है।
■
२०. रत्नवाहपुर-कल्प
श्री रत्नवाहपुर स्थित श्री धर्मनाथ भगवान को नमस्कार
करके उसी पुर-रत्न का कल्प किंचित् करता हूँ। इसी जम्बूद्वीप
नामक द्वीप मे भारतवर्ष के कोगल जनपद मे नानाजातीय उच्च-
७४ विविध तीर्थ-कल्प
स्तरीय शाखा वाले बहुल दलकुसुम-फलाच्छादित, सूर्य-रश्मि
अगम्य गहन वन मण्डित, निर्मल-शीतल वाले निर्झर, घर्घर नद से
मनोहर रत्नवाह नामक नगर है। वहाँ इक्ष्वाकु कुल दीपक स्वर्ण
वर्ण और वज्र लाञ्छन युक्त ४५ धनुष प्रमाण देह वाले पन्द्रहवे
तीर्थङ्कर विजयविमान से अवतीर्ण होकर भानु नरेन्द्र के घर
सुव्रता देवी की कुक्षी से पुत्ररूप मे अवतरित हुए और गुरुजनो
द्वारा धर्मनाथ नाम रखा गया। उनके जन्म-दीक्षा और केवलज्ञान
कल्याणक भी यही हुए और समेत शिखर पर निर्वाण हुआ। इसी
नगर मे लोगो के नेत्रो को शीतलता प्रदान करने वाला, नाग-
कुमार देव द्वारा अधिष्ठित श्री धर्मनाथस्वामी का चैत्य समय
आने पर बना।
उस नगर मे एक कुम्भार अपने शिल्प मे निष्णात था।
उसका पुत्र तरुणावस्था प्राप्त करके भी क्रीडा की दुर्लिप्सा से घर
से वहाँ के रमणीयक शालिनी चेत्य मे आकर यथेच्छ द्यूतादि
क्रीडा किया करता था। वहाँ एक केलिप्रिय नागकुमार देव भी
मानव देह धारण कर कुम्भार के लडके के साथ प्रतिदिन क्रीडा
करने लगता। अपने कुलक्रमागत कुलाल कर्म का धन्धा न करने
के कारण उसका पिता हमेशा उसे दुर्वचनो से फटकारता। जब
वह पिता की वात नही मानता तो पिता उसे मार-पीट कर मिट्टी
खोदने व लाने आदिका काम कराता। फिर भी वह मौका पाकर
बीच-बीच मे उसी चैत्य मे जा कर नागकुमार के साथ खेलने
लगता।
नागकुमार ने पूछा—पहिले की तरह निरन्तर खेलने नही
आते ? उसने कहा—मेरा पिता क्रुद्ध होता है अत उदर-पूर्ति के
लिए कुछ अपना काम भी करना पडता है। नागकुमार ने
कहा—यदि ऐसी वात है तो खेल के पश्चात् मैं पृथ्वी पर लोट
रत्नवाहपुर-कल्प ७५
कर साँप हो जाऊँगा, तुम मेरी चार अगुल पूँछ अपनी मिट्टी
खोदने की कुदाली से काट कर ले लेना । वह स्वर्णमय हो जायगी
उसी सोने से तुम्हारे कुटुम्ब का निर्वाह होता रहेगा । सौहार्द के
कारण प्रतिदिन इसी प्रकार प्रवृत्ति चलने लगी । प्रतिदिन सोना
पाकर भी उसका पिता इस रहस्य से अनभिज्ञ रहा ।
एक वार पिता ने उसे बाँध कर पूछा तो भय से उसने यथा-
स्थित कह दिया तो विस्मयपूर्वक उसके पिता ने कहा—रे मूर्ख !
चार अगुल ही क्यो काटते हो ? अधिक काटने से अधिक प्राप्ति
होती है ! पुत्र ने कहा—पिताजी ! मित्र के वचनो का उल्लघन
कर अधिक काटने की मेरी इच्छा नही है । पर पिता तो लोभाभि-
भूत था, वह लड़के की क्रीडा के समय चैत्य मे छिपा खडा रहा ।
खेल के पश्चात् जब नागकुमार साँप बन कर भूमि पर लोटता
हुआ बिल मे प्रवेश करने लगा तो पिता ने कुदाली से उसका
आधा शरीर काट डाला । नागकुमार ने क्रुद्ध होकर—रे पापी !
तुमने रहस्य खोल दिया—कहते हुए गहरा फटकारा और पिता-
पुत्र दोनो को काट खाया । इतना ही नही, नागकुमार ने तीव्र
क्रोधावेग मे समस्त कुंभारो के वंश का नाश कर दिया । उसके
वाद आज तक कोई कुभार का काम करने वाला वहाँ नही रहता ।
वहाँ की जनता मिट्टी के वर्त्तन अन्य स्थानो से लाती है ।
वहाँ उसी ,प्रकार नागमूर्त्तियुक्त धर्मनाथस्वामी की प्रतिमा
सम्यग्दृष्टि यात्रियो के द्वारा बडे समारोहपूर्वक पूजी जाती है ।
आज भी वहाँ इतर धर्म वाले धर्मराज के नाम से उन्हे पुकारते है
और वर्षा न होने पर हजारो घडे दूध से भगवान का अभिषेक
करते हैं । उसी समय वहाँ प्रचुर मेघवृष्टि हो जाती है ।
कन्दर्पा शासनदेवी और किन्नर शासनयक्ष भगवान धर्मनाथ
के भक्त-पूजको के विघ्न दूर कर अर्थ की प्राप्ति भी कराते हैं ।
७६ विविध तीर्थ-कल्प
श्रीरत्नवाहपुर या रत्नपुर का यह कल्प श्री जिनप्रभ सूरिजी ने
यथाश्रुत निर्माण किया है।
॥ श्री धर्मनाथ की जन्मभूमि रत्नपुर तीर्थ का कल्प समाप्त
हुआ। इसकी ग्रंथाग्र० ३२ और अक्षर २३ है ॥
२१. पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प
श्री महावीर भगवान को नमस्कार करके उन्ही के मोक्षगमन
से पवित्रित, दीवाली महोत्सव की उत्पत्ति से प्रतिबद्ध पावापुरी
का कल्प कहूँगा।
गौड़ के पाडलिपुर मे त्रिखण्ड भरत का स्वामी राजा सम्प्रति
परमश्रावक प्रणत हो कर आर्य सुहस्ति गणधर को पूछता है कि
भगवन् ! लोक और लोकोत्तर का गौरवान्वित यह दीवाली पर्व
कैसे हुआ ? गुरु महाराज कहते हैं—राजन् ! सुनो ।
उस काल उस समय मे श्रमण भगवान महावीरस्वामी प्राण-
तकल्प स्थित पुष्पोत्तर विमान मे बीस सागरोपम आयु परिपूर्ण
कर, वहाँ से च्यव कर तीन ज्ञान के सहित इसी अवसर्पिणी के
तीन आरो के व्यतिक्रान्त होने पर चतुर्थ आरे के पचहत्तर वर्ष
और साढे नौ मास अवशेष रहने पर मिति आषाढ शुक्ल ६ के
दिन उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे माहणकुण्ड ग्राम नगर मे ऋषभदत्त
ब्राह्मण की भार्या देवानन्दा की कुक्षी मे—सिंह, गज, वृषभादि
चतुर्दश महास्वप्न संसूचित—अवतीर्ण हुए। वहाँ ८२ दिन के
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ७७
अनन्तर शकेन्द्र के आदेश से हरिणेगमेषी ने आश्विन कृष्ण १३
को उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में क्षत्रियकुण्ड ग्राम नगर मे
सिद्धार्थ राजा की त्रिशला देवी के गर्भ से विनिमय कर के गर्भ मे
रखा । सातवे महीने मे माता का स्नेह ज्ञात कर प्रभु ने ऐसा
अभिग्रह लिया कि “मै माता पिता के जीवित रहते श्रमण नही
बनूँगा !” नौ मास और साढे सात दिन बीतने पर चैत्र शुक्ल
त्रयोदशी की अर्द्ध रात्रि मे उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे प्रभु का
जन्म हुआ । माता पिता ने वर्द्धमान नामकरण किया । मेरु-
कम्प, देव गर्व खर्वण (विनाश), इन्द्र व्याकरण प्रणयन अवदान
प्रगट कर भोगो को भोग कर, माता-पिता के स्वर्ग जाने पर, तीस
वर्ष गृहस्थावास मे रह कर, सम्वत्सरी दान देकर, चन्द्रप्रभा
शिविका मे अकेले एक देवदूष्य से मार्गशीर्ष कृष्ण १० के दिन
उसी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मे छठ्ठ तपपूर्वक अपराह्न मे ज्ञात
खण्ड वन मे निष्क्रान्त—दीक्षित हुए । दूसरे दिन बहुल विप्र ने
पायस-क्षीर से पारणा कराया । पञ्च-दिव्य प्रादुर्भूत हुए । फिर
बारह वर्ष साढे छः मास तक मनुष्य, देव और तिर्यञ्चो द्वारा किये
हुए उपसर्गों को सहन कर उग्र तपश्चर्या-करके जभिय गाँव मे
ऋजुवालुका तट पर गोदोहनासन मे छठ्ठ भक्त से उसी उत्तरा-
फाल्गुनी नक्षत्र मे वैशाख शुक्ल दशमी के तृतीय प्रहर मे केवल-
ज्ञान प्राप्त हुए । ग्यारस के दिन मध्यम पावा मे महसेन वन मे
तीर्थ प्रवर्त्तन किया । इन्द्रभूति प्रमुख गणधरों को सपरिवार
दीक्षित किया । दीक्षा-दिवस से भगवान के ४२ वर्षा-चातुर्मास हुए
यथा—१ अस्थिग्राम मे, ३ चम्पा—पृष्ठचम्पा मे, १२ वैशाली—
वाणियग्राम मे, १४ नालन्दा-राजगृह मे, ६ मिथिला मे, २ भद्रिका
मे, १ अलभिका मे, १ पणिय भूमि मे, १ श्रावस्ती मे । फिर
अन्तिम मध्यम-पावा मे हस्तिपाल राजा के अभुक्तमान शुल्क-
शाला मे हुआ । वहाँ आयु शेष जानते हुए स्वामी ने सोलह प्रहर
तक देशना की ।
७८ विविध तीर्थ-कल्प
वहाँ राजा पुण्यपाल वन्दनार्थ आया और अपने देखे हुए आठ
स्वप्नो का फल पूछने लगा। भगवान कहते हैं वे यों हैं—प्रथम
हिलते हुए प्रासाद पर हाथी खडे हैं, उनके गिरने से कोई उधर
से नही जाता। जो जाते उनमे से कितने ही निकल भी जाते हैं
और कितने उसके गिरने से नष्ट भी हो जाते है। इस स्वप्न का
फल ऐसा है—चलते प्रासाद के स्थान पर दुखमय गृहस्थावास,
सपदाएँ, स्नेह और निवास अस्थिर हैं। अहो ! दूषमकाल से दुष्प्र-
जीवी इत्यादि वचनो से धर्मार्थी श्रावक गजरूप हैं। इतर पर
समय प्राधान्यरूप से वे देशभङ्गादि द्वारा प्रतिहत हो जायँ पर
निकलना नही चाहते। जो लोग व्रत ग्रहण कर निकलते भी है, वे
अविधि से निर्गमन करते हैं, उनका भी विनाश हो जायगा।
गृहस्थ लोगो के सक्लेश मे पडने पर वे भग्न परिणाम वाले होगे।
विरले ही सुसाधु हो कर आगमानुसार गृहस्थो के संक्लेश मे आने
पर भी अवगणना कर के कुलीन होने से सयम का निर्वाह करेगे।
-यह प्रथम स्वप्न का अर्थ है।
दूसरा स्वप्न यह है—वानरो के मध्य मे बहुत से यूथाधिपति
थे वे अमेध्य से अपने आपको लीप रहे है, दूसरे भी ऐसा ही करते
हैं, लोग उन्हे हँस रहे हैं। वानर कहते हैं यह अगुचि नही गोशीर्ष
चन्दन है। ऐसे वानर विरले हैं जो अमेध्य का विलेपन नही
करते। जो नही करते उन पर करने वाले खीजते है। इसका फल
यह है—वानर स्थानीय गच्छगत साधु हैं। कितने ही अप्रमत्त
और कितने ही चल परिणाम वाले हैं। यूथाधिपतियो के स्थान
पर आचार्यादि गच्छाधिपति समझना चाहिए। अशुचि-विलेपन के
स्थान पर उनके द्वारा आधा कर्मादि सावद्य सेवन, अन्य विलिपन
के स्थान पर अन्य साधुओ का भी वैसा ही करना और उसके
कारण लोगो का हँसना, उनकी अनुचित प्रवृत्ति से वचनो द्वारा
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ७९
हीलना है। वे कहेगे कि ये गर्हित नही किन्तु धर्म के अग है।
विरले ऐसे होगे जो उनके अनुरोध करने पर भी सावद्य प्रवृत्ति
नही करेगे। वे उन पर क्रोध करेगे और कहेगे—ये अवगीत है,
अकिञ्चित्कर हैं। यह दूसरे स्वप्न का अर्थ है।
तीसरा स्वप्न यह था—उत्तम छाया वाले क्षीर वृक्ष के नीचे
बहुत से प्रशान्त रूप वाले सिंह-शावक बैठे हैं। लोग उनकी प्रगसा
करते है, अविगमन करते है। और बबूल वृक्षो के नीचे श्वान बेठे
हैं। इसका फल यो है—क्षीर तरु स्थानीय साधुओ के विचरने
योग्य क्षेत्र हैं। श्रावक लोग साधुओ की भक्ति-बहुमान करने वाले,
धर्मोपकरण देने वाले और सुसाधुओ की रक्षा करने वाले है, वे भी
बहुत से सिंहपोतक नियतावासी पार्श्वस्थ, अवसन्न, सक्लेगकारी
साधुरूपी श्वानो के द्वारा रुके हुए है। वे स्वय को जन रजनार्थ
प्रशान्त दिखला कर तथा प्रकार के कुतूहली लोगो के द्वारा प्रगसा
पावेगे, उनके पास जावेगे और उनके वचनो का पालन करेगे।
वहाँ कदाचित् कोई धर्म श्रद्धालु व्यवहार के परिहार करने वालो
से दुखी होगे तो वे तद्भावित श्वानादि से प्रतिहसित होगे। बार-
वार शुद्ध धर्म कहने से उन्हे लोग कहेगे—ये तो भोंकते है। जिन
बवूल के समान कुलो मे वे दुखी होगें ऐसे लोगो से अवर्णवाद के
द्वारा उनका परिहास होगा।- दूषमकाल के प्रभाव से धर्मगच्छ
सिंहपोतक के समान होगे।
चौथा स्वप्न इस प्रकार था—कितने ही कौए वापी के तट
पर तृषा से अभिभूत थे। वे मायासर को देख कर वहाँ जाने
लगे। किसी ने उन्हे रोका—"यह जल नही हैं"। किन्तु उन्होने
विश्वास नही किया, वहाँ गए और नष्ट हो गए। इसका फल यह
है—वापी स्थानीय सुसाधु सत हैं, जो अत्यन्त गम्भीर सुभावितार्थ
और उत्सर्गापवादकुशल हैं। पागल न होने पर भी पागल बने
हुए राजा की भाँति यह जानकर कि कालोचित धर्मनिरत और
अनिश्रित के समीप भी रहना चाहिए । यहाँ काक के समान
अत्यन्त वक्र जड अनेककलकोपहृत धर्मार्थी जानना चाहिए । वे
आज भी धर्म श्रद्धा से अभिभूत हैं । मायासुर के स्थान पर पूर्वोक्त
विपरीत धर्माचारी हैं । अत्यन्त कष्टानुष्ठान निरत भी अपरिणत
होने से अनुवाद प्रवृत्तता से कर्मबन्ध के हेतु हैं । उन्हे देख कर
मूढ धार्मिक जन वहाँ जायँगे । उन्हे कोई गीतार्थ कहे कि ये धर्म
मार्ग नही हैं किन्तु धर्माभास हैं, तो भी विश्वास न करते जावेगे
वे ससार मे पतन से नष्ट होगे । जो उनके वचन से रुकेगे वे ही
अमूढ धर्मसाधक होगे ।
पाँचवा स्वप्न यह है—विषय वन मे मृत सिंह अनेक गीदडो
से घिरा हुआ है किन्तु कोई भी शृगालादि उसका विनाश नही
कर रहे हैं । कालान्तर मे उस मृत सिंह के कलेवर मे कीडे उत्पन्न
हो गए और सिंह को खाने लगे, यह देख कर शृगालादि उपद्रव
करने लगे । इसका फल—उपनय यो है कि—सिंह के स्थान पर
परवादिमत दुर्द्धर्ष प्रवचन है । वन के स्थान पर प्रविरल सुपरीक्षक
धर्मी जनो वाला भारतवर्ष है । शृगाल गणो के स्थान परतीथि-
कादि प्रवचन प्रत्यनीक है । वे ऐसा मानते हैं कि यह प्रवचन हमारे
पूजा सत्कार दानादि का उच्छेद करने वाला है, अत. जैसे तैसे नष्ट
हो जाय । वह विषम अमध्यस्थ जनो से परिपूर्ण है और वह
प्रवचन मृत अतिशय व्यपगम से निष्प्रभाव होगा । तो भी प्रत्यनीक
जन भय से उसे उपद्रुत नही करेगे । वास्तव मे यह परोत्पर
सुस्थित और सगत है । काल-दोष से उसमे प्रवचन निर्द्धंश करने
वाले मतान्तरीय रुपी कीड़े उत्पन्न हो जाएँगे और वे परस्पर
निन्दा-भण्डनादि से शासन का लाघव करायेंगे । उसे देख वे
प्रत्यनीक भी “ये परस्पर न मिले” इसलिये निश्चय निरतिशेप
मात्र प्रवचन को निर्भयता से उपद्रव करेंगे ।
छठा स्वप्न यो है—पद्माकर सरोवरादि विना पद्म वाले और
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गर्दभक-छीलर युक्त वन गए हैं। कमल विरल रूप मे ऊकरडी
पर उगे हुए हैं किन्तु वैसे रमणीय नही। यहाँ पद्माकरो के स्थान
पर धर्मक्षेत्र और सुकुल जानने चाहिए। धर्म प्रतिपत्ति रूप तथा
साधु-श्रावक सघ रूप कमलादि उसमे नही हैं। जो धर्म स्वीकार
करेंगे वे भी कुशील संसर्गी और लोलुप परिणाम वाले हो जाएगे।
ऊकरडे के स्थान पर प्रत्यन्त क्षेत्र अथवा नीच कुलादि जानना
चाहिए, उनमें धर्मप्रवृत्ति होगी वे भी अर्थानुपत्ति दोष से लोगो
के द्वारा तिरस्कृत होगे! ईर्ष्यादि दोष दुष्ट होने से अपनी कार्य-
सिद्धि नही कर सकेगे।
सातवाँ स्वप्न यह है—कोई दुर्विदग्ध कृषक जले हुए और
घुन लगते हुए ऊगने के अयोग्य वीजो को अच्छे वीज मानता हुआ
ऊषरादि खेतो में विखेर कर वो रहा है। उन बीजो मे आया
हुआ कोई विरल शुद्ध वीज वह हटा देता है। इसका फल यो है—
कृषक स्थानीय दानधर्मरुचि जीव हैं, वे दुर्विदग्ध हैं, किन्तु
अपने आप को ज्ञायक मानते हुए अप्रायोग्य सघ भक्तादि दान को
प्रायोग्य मानते हुए उन वस्तुओ को भी अपात्रो को देते हैं। यहाँ
चतुर्भंगी है—एक शुद्ध अप्रायोग्य मे किञ्चित् शुद्ध देने योग्य
होता है, उसको दूर कर देते हैं, अथवा आये हुए सुपात्र को
परिहार कर देगे। इस प्रकार के दान, दायक और ग्राहक होगे।
अन्यथा भी व्याख्या है—अबीज के स्थान पर असाधु जानना
चाहिए। दुर्विदग्ध लोग उन्हे भी साधु-बुद्धि से ग्रहण करेंगे।
अस्थानो मे अविधि से स्थापित करेंगे। जैसे कोई दुर्विदग्ध कृषक
अबीजो को भी बीज और बीजो को अबीज मानता हुआ उस
प्रकार से वहाँ वोता है जहाँ कीडे आदि खा जाते हैं अथवा
चतुष्पदादि नष्ट कर दे। अथवा अन्यथा उगे हुए भी नही काटे
जाते। इस प्रकार अज्ञानी धर्म श्राद्ध वाले सुपात्रो को भी अविधि
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अवहुमान अभक्ति आदि उस प्रकार करेगे कि जिससे पुण्य का
प्रसव अक्षम हो जायगा।
आठवाँ स्वप्न यह है—प्रासाद के शिखर पर क्षीरोद से भरे
सूत्रादि से अलकृत ग्रीवा वाले कलश हैं, दूसरे भूमि पर उतारे
हुए कलश पड़े हैं। कालान्तर मे वे शुभ कलश अपने स्थानो से
चलित हो उन पुराने घडो के ऊपर गिरे जिससे वे फूट गए।
इसका फल यह है—कलश स्थानीय सुसाधु हैं, पहले उग्र
विहार से विचरते थे। पूज्य हो कर भी कालादि दोष से सयम
स्थान से चलित हो कर अवसन्नभूत शिथिलाचारी हो जावेगे।
दूसरे पार्श्वस्थादि भूमिस्थित-भूमिज उद्वेलित पाँवो से सैकड़ो
असयम स्थान युक्त वोदे घडो के जैसे निष्पन्न परिणाम वाले होगे।
और वे सुसाधु अन्य विहार क्षेत्रो के अभाव से घूमते हुए वोदे घडो
के समान पार्श्वस्थादि के ऊपर गिर कर पीडा करेंगे। और वे
स्वक्षेत्र पर आक्रमण से पीडित होते हुए निर्दयता से उनके सुष्ठुतर
सक्लेश करेगे। तब वे परस्पर विवाद करते हुए दोनो ही सयम
से भ्रष्ट हो जायँगे।
"कितने ही तप का गौरव करने वाले और दूसरे स्वधर्म
क्रियाओ मे शिथिल, ऐसे दोनो ही मात्सर्यवश अस्पृष्ट धर्म हो
जायँगे।"
फिर कितने ही "पागल न होने पर भी पागल बने राजा" के
आख्यान के अनुसार कालादि दोष होने पर भी अपना निर्वाह
करेगे। उस आख्यान को पूर्वाचार्य इस प्रकार बतलाते हैं—
पूर्वकाल मे पृथ्वीपुरी मे पूर्ण नाम का राजा और उसके
सुबुद्धि मंत्री था। एक वार लोगदेव नामक एक नैमित्तिक आया।
मुबुद्धि मंत्री ने उसे भावी काल का स्वरूप पूछा। उसने कहा—
महीने के वाद यहाँ मेघवृष्टि होगी, जो भी उसका जल पीयेगे वे