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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

६६ विविध तीर्थ-कल्प
देवपत्तन गयी । वीर प्रभु की रथारूढ प्रतिमा अदृश्य रूप से चल
कर आश्विन-पूर्णिमा के दिन श्रीमालपुर (भीनमाल) मे आयी ।
अन्य सातिशय देवप्रतिमाएँ भी यथोचित स्थान मे चली गयी ।
नगरदेवता ने श्री वर्द्धमानसूरि को सकेत दिया कि जहाँ भिक्षा
मे प्राप्त क्षीर रुधिर हो कर पुन क्षीर हो जाय वही साधुओ को
रह जाना है ।
हमीर की उस सेना ने विक्रम संवत् ८४५ मे वल्लभी भग कर
के वहाँ के राजा को मार डाला । हमीर अपने स्थान लौट गया ।
इसके बाद एक बार अन्य गजनीपति म्लेच्छ राजा गुजरात
का भग कर के लौटते हुए विक्रम स० १०८१ मे साचौर पहुँचा ।
उसने वहाँ भ० महावीर का मनोहर जिनालय देखा । मारो-मारो
वोलते हुए म्लेच्छ लोग प्रविष्ट हुए और हाथी जोत कर भगवान्
महावीर को खीचा, भगवान स्वस्थान से लेशमात्र भी न चले ।
फिर बैल जोत कर खीचने पर पूर्वभव राग से ब्रह्माशान्ति ने प्रभु
को चार अगुल सरकाया । गजनीपति के स्वय हाँकने पर भी
भगवान निश्चल हो कर रहे, म्लेच्छपति उदास हो गया । फिर
घन-हथोडो से महावीर स्वामी (प्रतिमा) को ताडन किया, जिसकी
चोटें अन्त पुर की स्त्रियो के लगने लगी । तब मात्सर्य-विह्वल
तुर्कों ने तलवार से भगवान महावीर की अगुंली काट ली और
उसे लेकर वे चल पडे । तब घोडो की पूँछें जलने लगी और
म्लेच्छ लोग मूर्च्छित होने लगे । फिर वे घोडो को छोड कर पैदल
ही भगे और धसमसते हुए जमीन पर गिर पडे । वे सर्वबल-क्षीण
हो कर दोनतापूर्वक बिलबिलाते हुए रहमान को याद करने
लगे । तब अदृश्य आकागवाणी हुई कि वीर प्रभु की अगुंली लाने
से तुम लोगो का जीवितव्य ही संशय मे पड गया है ।
गजनी वादशाह ने तब विस्मित चित्त से मस्तक धुनते हुए