विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें७० विविध तीर्थ-कल्प
भरत द्वारा जहाँ मोहरूपी सिंह का नाश करने के हेतु अष्टा-
पद सिंह की भाँति आठ योजनो वाली पैडियो से सुगोभित है,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१२)
जहाँ भरत चक्रवर्ती आदि अनेको कोटि महर्षियो ने सिद्धि-
साधना की, वह अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१३)
जहाँ सगर राजा के पुत्रो के आगे भरत महाराजा के वंशज
महर्षियो के सर्वार्थसिद्ध एव मोक्ष प्राप्ति करने वालो का सुबुद्धि
ने वर्णन किया, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१४)
जहाँ समुद्र के समान विशाल आशय वाले सगर राजा के पुत्रो
ने गिरिराज के चारो ओर रक्षा के लिए परिखा—सागरखाई
बनाई, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१५)
जहाँ जैन लोग अपने पापो को प्रक्षालन करने के लिए ही
मानो चारो ओर गगा से आश्रित है और हमेशा चचल लहरो से
गोभायमान है उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१६)
जहाँ जिनेश्वर भगवान को तिलक चढाने से दमयन्ती ने
अपने भालस्थल पर स्वाभाविक तिलक रूप अनुरूप फल प्राप्त
किया, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१७)
जहाँ क्रोधपूर्वक उठ कर समुद्र मे फेंकने को प्रस्तुत रावण
को चरणो से दवा कर वालि मुनि ने रुला दिया, उस अष्टापद
गिरिराज की जय हो । (१८)
लकेन्द्र रावण द्वारा जिन-पूजोत्सव के समय अपनी भुजाओ
की ताँत निकाल कर वीणा बजाने से धरणेन्द्र के द्वारा अमोघ
विजया गक्ति उसे मिली, उस अष्टापद गिरिराज की हो (१९)
जहाँ चारो दिशाओ मे चार, आठ, दश और दो जिन प्रति-
माओ को गणधर (श्रीगौतम स्वामी) भगवान ने वन्दन किया,
उस अष्टपद गिरिराज की जय हो । (२०)