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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 442 में से

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सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६५
के व्यन्तर जाति मे शूलपाणि नामक यक्ष उत्पन्न हुआ । विभंग-
ज्ञान से अपना पूर्व जन्म का व्यतिकर ज्ञात कर उस गाँव मे
मात्सर्यवश मारि उत्पन्न कर दी । गाँव वालो ने दुखी हो कर
स्नान वलि-कर्म पूर्वक हाथ मे धूप लेकर कहा—जिस देव-दानव
का हमारे से कुछ भी अपराध हुआ हो वह प्रसन्न हो । तत्र उस
यक्ष ने पूर्वभव-वृषभ का वृत्तान्त कहा । लोगो ने उसी वृषभ के
अस्थि-पुंजपर देवल वनवाया और उसकी प्रतिमा करवाई ।
देवशर्मा को वहाँ देवार्चक—पुजारी स्थापित किया । इस प्रसग से
वर्द्धमान गाँव आस्तिक ग्राम प्रसिद्ध हुआ । शान्ति हुई ।
श्री वर्द्धमान स्वामी छद्मस्थ विहार से विचरते हुए क्रमशः
दुइज्जन्त तापसाश्रम से वर्षावास के लिए उस गाँव मे पधारे ।
गाँव वालो से पूछ कर भगवान उसी देवकुल मे रात्रि के समय
कायोत्सर्ग स्थित रहे । उस मिथ्यादृष्टि देव ने भयङ्कर अट्टहास
किया । हाथी-नाग-पिशाचादि रूप बना कर उपसर्ग किया । शिर,
कान, नासिका, दाँत, आँख, नख और पीठ मे भीषण वेदना उत्पन्न
की । सर्व प्रकार से प्रभु को अक्षुण्ण ज्ञात कर देव उपशान्त हो
हो गया और गीत-नृत्य-स्तुति आदि से पर्युपासना करने लगा ।
इसके वाद उस यक्ष शूलपाणि का नाम ब्रह्मशान्ति प्रसिद्ध हुआ ।
वही यक्ष साचौर के वीर-चैत्य मे प्रतिष्ठाविशेष से निवास
करता है ।
पश्चिम गुजरात मे वल्लभी नामकी समृद्धिशाल नगरी थी
जिसमे शीलादित्य नाम का राजा था । उसने रत्नजटित कागसी
के लोभ मे आकर राका नामक सेठ का पराभव किया । कुपित
सेठ उसे विग्रहणार्थ गज्जणपति हमीर को प्रचुर धन देकर उसकी
विशाल सेना चढा लाया । उस समय चन्द्रप्रभ स्वामी की प्रतिमा,
अम्बा और क्षेत्रपाल युक्त अधिष्ठायक के बल से गगन-मार्ग द्वारा
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