विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६३
महाराज के मुख से उसने पच परमेष्ठी नवकार मंत्र सीखा । वह
चपलतावश धनुष-तीर लेकर अक्षय पट्ट (चावल चढाने का पाटा)
पर आते हुए चूहो को अचूक लक्ष से मारने लगा । तब श्रावको
ने उसे मन्दिर से निकाल दिया । अव वह लोगो की गायो की
रक्षा करने लगा ।
एक दिन नगर के बाहर भ्रमण करते हुए उसे किसी योगी ने
देखा और उसे बत्तीस लक्षण धारी ज्ञात कर स्वर्णपुरुष सिद्ध
करने के लिए उसके पीछे-पीछे जाकर उसकी माँ की अनुज्ञा लेकर
वहाँ निवास कर लिया । अवसर पाकर एक दिन उस योगी ने
नाहड़ से कहा—"गायो की रखवाली करते हुए तुम्हे रक्त दुग्ध
वाला कुलिस वृक्ष (थोहर ?) मिले, यहाँ चिन्ह करके मुझे कहना ।"
बालक ने कहा—ठीक है । दैवयोग से एक दिन उसने वैसा देख
कर योगी को बतलाया । दोनो वहाँ गए, यथाविधि अग्नि जला-
कर उसमे रक्तक्षीर प्रक्षिप्त कर योगी के प्रदक्षिणा देने पर नाहड़
ने भी अग्नि की प्रदक्षिणा दी । किसी प्रकार योगी की दुष्ट चित्त-
वृत्ति ज्ञात कर राजपुत्र नाहड़ ने नवकार मन्त्र का स्मरण किया ।
उसके प्रभाव से योगी निष्प्रभ हो गया, नाहड़ ने उसे ही अग्नि
मे डाल दिया, वह स्वर्णपुरुष बन गया ।
नाहड़ ने विचार किया — अहो ! मन्त्र का कैसा माहात्म्य है ।
इसके दाता गुरु महाराज का मैं कैसे प्रत्युपकार करूँगा ? फिर
उसने गुरुचरणो मे आकर नमस्कार किया और सारा स्वरूप
बताते हुए कहा—कुछ आज्ञा दीजिए !
गुरु महाराज के वचनो से नाहड ने चौवीस उत्तुङ्ग शिखर
वाले चैत्य बनवाये । क्रमश वह प्रवर राज्यश्री को प्राप्त हुआ ।
बडी भारी सेना के साथ जाकर उसने अपना पैतृक स्थान ग्रहण
किया ।