सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

६४ विविध तीर्थ-कल्प

एक दिन उसने श्रीजज्जिंगसूरि से प्रार्थना की—भगवन् !
कुछ ऐसा आदेश दीजिए जिस कार्य से आपकी और मेरी कीर्त्ति
चिरकाल तक फैले। तब गुरु महाराज ने जहाँ चारो थणो से
गाय दूध झरती थी, वह भूमि अभ्युदयकारी ज्ञात कर राजा को
दिखाई।
राजा ने गुरु महाराज के आदेश से सत्यपुर (साचौर) मे
भगवान महावीर के ६०० वर्ष बीतने पर एक गगनचुम्बी शिखर
वाला जिनालय बनवाया। आचार्य श्री जज्जिंगसूरि ने वहाँ
पित्तलमय श्री महावीर भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित की। जब
सूरि महाराज प्रतिष्ठा कराने के लिए चले तो अन्तराल मे एक
उत्तम लग्न के समय नाहड राजा के पूर्वपुरुष विङ्गराय की
अश्वारूढ प्रतिमा का प्रतिष्ठा की। दूसरे लग्नविशेष मे पृथ्विी
के मैण जैसी नरम होने पर शंख नामक शिष्य ने गुरु महाराज
के आदेश से दण्डघात द्वारा कुंआ बनाया। आज भी वह शंख-
कूप कहलाता है। वह कुंआ अन्य दिनो मे सूखा होनेपर भी
वैशाखी पूर्णिमा के दिन पानी से भर जाता है। तीसरे लग्न में
भगवान महावीर स्वामी की प्रतिष्ठा की। उसी लग्न मे “दुग्गा
सूअ” गाँव मे और ‘वय णप’ गाँव मे साधु श्रावक के हाथ से
वासक्षेप भेजकर महावीर भगवान की दो प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित
कराईं। उस (सत्यपुरीय) वीर प्रभु की प्रतिमा की राजा नित्यप्रति
पूजा करता है।, इस प्रकार नाहड राजा ने वह बिम्ब कराया।
वहाँ ब्रह्मशान्तियक्ष की सन्निहित प्रातिहार्य से अहर्निश
पर्युपासना होती है। वह यक्ष पहले धनदेव सेठ का वृषभ था।
उसने वेगवती नदी से पाँच सौ गाडे निकाले। सेठ ने सन्तुष्ट हो
कर बैल के चारा-पानी के लिए वर्द्धमान ग्राम निवासी लोगो को
वेतन-धन समर्पण किया। उन ग्रामीणो ने धन लेकर भी उस
वृषभ की कोई सार-सभाल नही की। वह अकाम निर्जरा से मर