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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 442 में से

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पृष्ठ 148

सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६७
सेनापति को आज्ञा दी कि यह अंगुली वापस ले जा कर वही लगा
दो । वे लोग भीतिपूर्वक अंगुली वापस लाये और वह तुरंत
स्वामी के हाथ पर जा लगी । यह आश्चर्य देख कर तुर्क लोग
कभी स्वप्न मे भी साचोर का मार्ग नही पकडेगे । चतुर्विध सघ
सन्तुष्ट हुआ, वीर प्रभु के मन्दिर मे गीत, नृत्य, वाजित्त्र, पूजा
दानादि से धर्म-प्रभावना होने लगी ।
अन्यदा बहुत सा काल बीत जाने पर मालवपति गुजरात का
भग करने साचोर की सीमा पर पहुँचा । उस समय ब्रह्मशान्ति
यक्षराज ने प्रचुर सैन्य विकुर्वण करके उसे भग्नबल अर्थात् परा-
जित कर दिया । उसके आवास-शिविर मे वज्राग्नि उठी । मालव-
पति कोश और कोष्ठागार छोड कर भाग छूटा ।
फिर एक बार सं० १३४८ मे प्रवलका फिर सेना देश का
भग करती हुई नगर ग्रामो को नष्ट करती हुई चली आ रही थी
तो जिनालय के द्वार वन्द करके चार योजन मे ब्रह्मशान्ति यक्ष
के माहात्म्य से अनाहत गम्भीर स्वर युक्त वाजित्त्र श्रवण कर
श्री सारगदेव महाराजा की सेना के आगमन की आशका से
मुगल सेना भाग छूटी और साचौर की सोमा पर भी पैर नही
दिया ।
विक्रम सवत् १३५६ मे अलाउद्दीन सुलतान का छोटा भाई
उलूखान ने मत्री माधव से प्रेरित हो कर दिल्ली से गुजरात की
ओर प्रस्थान किया । उस समय चित्रकूटाधिपति समरसिंह ने दण्ड
दे कर मेवाड देश की रक्षा की । तब हमीर युवराज वागड देश
के मुहडासा आदि नगरो को भग करके आसावाल्ली (अहमदाबाद)
पहुँचा । राजा कर्णदेव भग गया । सोमनाथ को घन-घात से तोड
कर गाडो में भर के दिल्ली भेजा । वामनस्थली जा कर मण्डलीक
राजा को दण्डित किया । सौराष्ट्र मे अपनी आज्ञा प्रवर्त्तित कर
आसावल्ली मे रहा । उसने मठ-मन्दिर और देव-कुलो को जलाया ।