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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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६८ विविध तीर्थ-कल्प
क्रमश सात सौ देग में आया । तब साचौर मे उसी प्रकार अना-
हत वाजित्रो को सुन कर म्लेच्छो का दल पलायन कर गया ।
इस प्रकार पृथ्वीमण्डल मे साचौर के वीर प्रभु के अनेक अवदान
पवाडे (पायढा) सुने जाते हैं ।
व्यन्तर देव केलिप्रिय होते ही है अब अलघनीय भवितव्य
और दूषमकाल के विलसित प्रभाव के कारण मदिर मे गोमांस-
रुधिर के छीटने से देवता लोग दूर चले जाते है। अधिष्ठायक
ब्रह्मशान्ति यक्ष के प्रमादवश असन्निहित अवस्था मे राजा
(सुलतान) अलाउद्दीन ने उस अनल्प माहात्म्य वाले भगवान
महावीर की प्रतिमा को सवत् १३६७ विक्रमीय मे दिल्ली लाकर
आशातना भाजन किया ।
कालान्तर मे फिर भी दूसरी प्रतिमाएँ वहाँ प्रगट प्रभावी और
पूजनीय होगी ।
साचोर तीर्थ का यह कल्प अप्रमेय महिमा वाला और वांछित
फल-सिद्धिकारक है । श्रीजिनप्रभसूरि कहते हैं भव्यजन नित्य पढें ।
श्री सत्यपुर-साचोर तीर्थ कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रन्थसख्या
१६१ और ३ अक्षर हैं ।
•
१८. अष्टापद महातीर्थ-कल्प
(श्री धर्म घोषसूरि कृत)
जो श्रेष्ठ धर्म, कीर्त्ति और विद्याओ के आनन्द के आश्रम भूत
भगवान ऋषभदेव द्वारा पवित्रित है और देवेन्द्रो से वन्दित है उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१)