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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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अष्टापद महातीर्थ-कल्प ६९
जहाँ आपदाएँ नष्ट करने वाले अष्टापद आदि एक लाख
दोषो को दूर करने वाले स्वर्ण की जैसी आभा वाले भगवान
ऋषभदेव हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२)
भगवान ऋषभदेव के वाहूवलि आदि ९९ पुत्र-प्रवर मुनिगण
जहाँ अजरामर पाये, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (३)
जहाँ प्रभु के वियोग से भीरु दस हजार महर्षि प्रभु के साथ ही
अनशन करके मुक्त हुए उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (४)
जहाँ भगवान ऋषभदेव के साथ आठ पौत्र और ९९ पुत्र एक
समय मे मुक्त हुए, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (५)
तीन चिताओ के स्थान मे जहाँ मूर्त्त रत्नत्रय की भाँति इन्द्र
ने तीन स्तूपो की स्थापना की, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (६)
जहाँ भरत चक्रवर्ती ने सिद्धायतन के समान सिंहनिषद्या
नामक चतुर्मुख चैत्य बनवाया, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (७)
जहाँ एक योजन लम्बा और उससे आधा चौडा एव तीन
कोश ऊँचा चैत्य विराजमान है, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (८)
जहाँ भरत ने भाइयो की प्रतिमाएँ, चौबीस तीर्थंकरो की
प्रतिमाएँ एव अपनी भी प्रतिमा बनवायी, उस अष्टापद गिरिराज
की जय हो । (९)
जहाँ भरत ने अपने-अपने आकार और वर्ण वाले वर्त्तमान
(चौवीसी) के जिनेश्वरो के विम्ब भरवाये, उस अष्टापद गिरिराज
की जय हो । (१०)
जहाँ ९९ प्रतिमाओ से युक्त भाइयो के स्तूप एव अर्हन्त
भगवान के स्तूप बनवाए, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो। (११)