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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

५६ विविध तीर्थ-कल्प
उस प्रतिमा के वनने पर अन्य भी चौवीस जिन-विम्व खान
से लाकर स्थापित किए । फिर दिव्य शक्ति से अयोध्या से तीन
महाविम्व रात्रि मे आकाश मार्ग से लाये । चौथी प्रतिमा को
लाते हुए रात्रि वीत गई और धारासेणक ग्राम के खेत मे वह रह
गई । चालुक्यचक्रवर्त्ती महाराजा कुमारपाल ने चतुर्थ विम्व की
स्थापना की । आज भी सेरीसा मे महाप्रभावक पार्श्वनाथ भगवान
सघ द्वारा पूजे जाते हैं । वहाँ म्लेच्छ लोग भी उपद्रव नही कर
सकते । शीघ्रतावश घड़ने के कारण वैसे सलावण्य अवयव नही
देखे जाते । उस गाँव मे वह विम्व आज भी मन्दिर मे पूजा
जाता है ।
श्री अयोध्यापुरी का कल्प समाप्त हुआ, यह ४४ श्लोक व
९ अक्षर परिमित है ।
१४. अपापा (पावा) पुरी संक्षिप्त-कल्प
जिसके समीप सिद्धार्थ वणिक के कहने से खरक वैद्य ने स्नान
द्रोणी मे बैठाकर दोनो कानो मे गल्य खींचे जाने पर तीव्र पीडा
से अन्तिम जिनेश्वर के चीत्कार गब्द से प्रस्फुटित गिरि दरी मे
निकलने वाला पूर आज भी दिखाई पडता है ।
जृम्भिका से रात्रि मे ही महसेन नामक वन मे आकर चरम
जिनेश्वर-महावीर स्वामी ने वैशाख शुक्ल ११ को तीर्थ प्रवर्त्तन
किया और वहाँ पर गौतम स्वामी आदि ग्यारह गणधरो को

कालिकुण्ड कुक्कुटेश्वर-कल्प ५७
उनके छात्रो सहित दीक्षित किया था। उन्होने त्रिपदी से भव-
सागरनिस्तारिणी द्वादशाङ्गी ग्रथित की थी।
जहाँ हस्तिपाल राजा की गुल्मशाला मे अधिष्ठित श्री वर्द्ध-
मान प्रभु ने दो दिन का अनशन करके अन्तिम देशना-वृष्टि की।
स्वाति नक्षत्र के दिन अमावस्या की रात्रि के अन्त मे अतुलनीय
सुखश्री का स्थान शिव-मोक्ष प्राप्त किया, वह नगरियो मे श्रेष्ठ
पावा सर्वजनो को पापरहित बनावे।
जहाँ आज भी नागकुमार साँप के रूप मे प्रभाव दिखाते हैं।
जहाँ अमावस्या की रात्रि मे तैलरहित जल से भरे हुए दीपक
जलते हैं। अनेक आश्चर्यों की भूमि चरम जिनेश्वर—महावीर
स्वामी—के स्तूप से मनोहर स्वरूप वाली श्रेष्ठपुरी वह मध्यमा
पावा यात्रियो की समृद्धि के लिए हो।
श्री अपापा (पावापुरी) कल्प संपूर्ण हुआ, इसके ग्रंथाग्र० १०
अक्षर २१ है।
१५. कलिकुण्ड कुक्कुटेश्वर-कल्प
अग जनपद मे करकण्डु राजा के राज्यकाल मे चम्पा नगरी
से अनतिदूर कादम्बरी नामक अटवी थी। वहाँ कली नामक
पर्वत था जिसकी अधोभूमि मे कुण्ड नाम का एक सरोवर था।
वहाँ यूथाधिपति महीधर नाम का एक हाथी (रहता) था। एक
वार छद्मस्थ अवस्था मे विचरते हुए भगवान श्री पार्श्वनाथ स्वामी

५८ विविध तीर्थ-कल्प

कलिकुण्ड के समीप देग मे कायोत्सर्ग पूर्वक रहे। प्रभु को देखकर
उस यूथाधिपति हाथी को जातिस्मरण उत्पन्न हुआ। उसने
सोचा—मैं विदेह क्षेत्र मे हेमंधर नामक वामन था। युवक लोग
और विट पुरुष मेरा उपहास करते थे। वैर के वशीभूत होकर
नये हुए वृक्ष की शाखा पर फासी खाकर मरने की तैयारी मे मुझे
सुप्रतिष्ठ सेठ ने देखा। उन्होने मुझे कारण पूछा, मैंने यथास्थित
कहा तो वे मुझे सद्गुरु के पास ले गए। सम्यक्त्व ग्रहण कराया,
अन्त मे अनशन करके मैने निदान किया कि मैं भवान्तर मे ऊँचा
होऊँ। फिर मर के इस वन मे हाथी हुआ। अब इन भगवन्त की
पर्युपासना करूँ। ऐसा सोचकर वही सरोवर से सरस कमलो को
लाकर उनसे जिनेश्वर भगवान को पूजा की। पूर्वगृहीत सम्यक्त्व
परिपालित होने से अनशन करके वह व्यन्तर जाति मे महर्द्धिक
देव हुआ। चरो के मुँह से यह अत्यन्त विचित्र बात सुनकर
करकण्डू राजा वहाँ आया। भगवान को न देखकर राजा अत्यन्त
आत्मनिन्दा करने लगा कि—वह हाथो ही धन्य हो गया जिसने
भगवान की पूजा की, मैं तो अधन्य हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते
उसके आगे धरणेन्द्र के प्रभाव से वहाँ नौ हाथ प्रमाण वाली प्रतिमा
प्रादुर्भूत हुई। राजा ने प्रसन्नतापूर्वक जय जयकार करते हुए
वन्दन-पूजन किया। और वहाँ चैत्य भी बनवाया। वहाँ पुष्पादि
से त्रिकालदर्शन-पूजन-स्तुति करते हुए राजा ने कलिकुण्ड तीर्थ
प्रकाशित किया। वहाँ वह हाथी व्यन्तर सान्निध्य करता है,
परचे पूरता है। नव यत्री आदि यन्त्र और कलिकुण्ड मन्त्र, षट्
कर्म कार्य प्रकाशित किए। जैसे ग्रामवासी जन गाँव के नाम से
पुकारे जाते है वैसे ही कलिकुण्ड निवासी जिनेश्वर भी कलिकुण्ड-
पार्श्वनाथ कहलाते हैं। यह कलिकुण्ड की उत्पत्ति हुई।
पहले छद्मस्थावस्था मे श्री पार्श्वनाथ स्वामी राजपुरी मे
कायोत्सर्ग ध्यान मे रहे। वहाँ घुडसवारी के लिए जाते हुए उस

नगर के स्वामी ईश्वर राजा के वन्दी वाणार्जुन ने भगवान को
देखकर गुणकीर्त्तन किया। "ये अश्वसेन राजा के पुत्र जिनेश्वर
देव हैं" यह ज्ञात कर राजा हाथी से उतर कर प्रभु के पास आकर
मूर्छित हो गया। चेतना प्राप्त होने पर मत्री के पूछने पर वह
अपना पूर्व भाव कहने लगा—जब मैं चारुदत्त होकर पूर्व भव मे
वसतलपुर नगर मे पुरोहितपुत्र दत्त था और कुष्ठादि रोगो से
पीडित हो गंगानदी मे पडते हुए चारण मुनि से बोध पाकर
अर्हिंसादि पचव्रत पालन करते इन्द्रिय-शोषण व कषायविजय
करने लगा।
अन्यदा चैत्यगृह मे आकर जिन-प्रतिमा को प्रणाम करते हुए
पुष्कलि श्रावक ने देखा, उसने मुनि गुणसागर से पृछा—भगवन् !
इसे मन्दिर मे आने मे दोष है या नही ? मुनिराज ने कहा—"दूर
से देव को प्रणाम करने मे क्या दोष है ?" आज भी यह कुर्कट
होगा" यह सुनकर खेद करते हुए फिर मुझे गुरु महाराज ने
सम्बोधित किया कि—तुम जातिस्मरण-अनशन से मर के
राजपुरी मे ईश्वर नामक राजा होओगे। तब मैं सन्तुष्ट हुआ
और वह सब अनुभव करके क्रमश

१६. हस्तिनापुर-कल्प
गजपुर (हस्तिनापुर) स्थित श्री शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ,
अरनाथ और मल्लिनाथ स्वामी को नमस्कार कर के हस्तिनापुर
तीर्थ का कल्प सक्षेप से कहता हूँ ।
श्री आदीश्वर भगवान तीर्थंकर के भरत और बाहुबली नाम
के दो पुत्र थे । भरत के सहोदर अठाणवे कुमार थे । भगवान ने
दीक्षा लेते समय भरत को अपने पद पर अभिषिक्त किया और
बाहुबली को तक्षशिला दी, बाकी पुत्रो को भी उन देशो मे
राज्यादि दिए । अग कुमार कें नाम से अग देश हुआ, कुरु के
नाम से कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रकार वग, कलिङ्ग, सूरसेन,
अवन्ती आदि हुए । कुरु राजा का पुत्र हस्ति नामक राजा हुआ
उसने हस्तिनापुर बसाया । वहाँ भागीरथी महानदी पवित्र जल
से पूर्ण प्रवाहित है ।
वहाँ सोलहवे शान्तिनाथ, सतरहवे कुन्थुनाथ, अठारहवे
अरनाथ तीर्थङ्कर हुए । इन्होने क्रमशः पाँचवे, छठे और सातवें
चक्रवर्ती हो कर छ खण्ड भर

हस्तिनापुर-कल्प ६१

शरीर विकुर्वित कर के तीन पाँव से त्रैलोक्याक्रान्त करके नमुचि
को शासित किया ।
इस नगर मे सनत्कुमार, महापद्म, सुभूम और परशुराम आदि
महापुरुष उत्पन्न हुए ।
इसी नगर मे पाँच पाण्डव चरम शरीरी उत्तम पुरुष हुए ।
दुर्योधनादि अनेक महाबलवान राजा यहाँ उत्पन्न हुए ।
यहाँ सात करोड स्वर्ण का अधिपति गङ्गदत्त सेठ हुआ । तथा
सौधर्मेन्द्र का जीव कार्त्तिक सेठ हुआ जिसने राजाभियोग से
परिव्राजक को परोसने से वैराग्यपूर्वक हजार व्यापारियो के साथ
श्री मुनि सुव्रत भगवान के पास दीक्षा ली ।
इस महानगरी मे श्रीशान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ और
मल्लिनाथ जिनेश्वर के मनोहर चैत्य हैं, एव अम्बा देवी का भी
देवकुल है ।
इस प्रकार अनेक आश्चर्यो के निधान इस महातीर्थ मे जो
विधिपूर्वक यात्रा महोत्सव आदि से जिन-शासन की प्रभावना
करते हैं वे कुछ भवो मे ही कर्म क्लेश नष्ट कर सिद्धि प्राप्त
करते हैं ।
श्री हस्तिनापुर तीर्थ का यह सक्षिप्त कल्प भी सत्पुरुषो की
सङ्कल्प-पूर्त्ति मे कल्प-वृक्ष की भाँति बने ।
श्री हस्तिनापुर का कल्प समाप्त हुआ इसकी ग्रन्थ संख्या
चौबीस और ११ अक्षर है ।

१७. सत्यपुर-साचौर-तीर्थकल्प
श्री ब्रह्मशान्ति यक्ष सेवित श्री वीर जिनेश्वर को नमस्कार
करके श्री सत्यपुर तीर्थ का कल्प किञ्चित् यथाश्रुत कहूँगा।
(वीर स०) १३०० मे श्रीकन्नौज नरपति द्वारा कारित देवदारुमय
जिनभवन मे श्री वीर जिनेश्वर सच्चपुर मे जयवन्त वर्त्ते।
इसी जम्बूद्वीप नामक द्वीप मे भारतवर्ष मे मरुमण्डल मे
सत्यपुर (सच्चउर) नामक नगर है। वहाँ चैत्यगृह मे नाहड राय
कारित और गणधर-आचार्य श्री जज्जिग सूरि प्रतिष्ठित पित्तल-
मय श्री वीरप्रभु की प्रतिमा है। नाहडराय ने उसे कब और कैसे
बनाया, उसकी उत्पत्ति बतलाते हैं—
पूर्वकाल में नड्डूल-मण्डल मण्डन मण्डोवर नगर के स्वामी
राजा को बलवान भाइयो ने मार कर उस नगर को अधिष्ठित
कर लिया। उस राजा की गर्भवती महादेवी भगकर ब्रह्माणपुर
पहुँची। वहाँ उसने सकल लक्षण युक्त पुत्र प्रसव किया। फिर
नगर के बाहर एक वृक्ष पर झोली मे उस बालक को रखकर
तत्पार्श्ववर्त्ती स्थान मे कुछ काम करने लगी। दैवयोग से वहाँ
श्री जज्जिगसूरि जी महाराज पधारे। वृक्ष की छाया को अपरि-
वर्त्तित देखकर “यह पुण्यवन्त होगा”—ऐसा विचार कर चिर-
काल तक वे उसे देखते रहे। उस राजपत्नी ने सूरि महाराज के
निकट आकर पूछा—भगवन् ! क्या यह लडका कुलक्षयकारी,
अपलक्षणो वाला दिखाई देता है ? सूरिजी ने कहा—भद्रे ! यह
महापुरुष होगा। अत इसे सर्व प्रयत्नो से पालन करना योग्य है।
तब गुरु महाराज ने उसे अनुकम्पापूर्वक चैत्यगृह के कार्य पर
नियुक्त कर दिया। उस लडके का नाम 'नाहड' रखा। गुरु

सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६३
महाराज के मुख से उसने पच परमेष्ठी नवकार मंत्र सीखा । वह
चपलतावश धनुष-तीर लेकर अक्षय पट्ट (चावल चढाने का पाटा)
पर आते हुए चूहो को अचूक लक्ष से मारने लगा । तब श्रावको
ने उसे मन्दिर से निकाल दिया । अव वह लोगो की गायो की
रक्षा करने लगा ।
एक दिन नगर के बाहर भ्रमण करते हुए उसे किसी योगी ने
देखा और उसे बत्तीस लक्षण धारी ज्ञात कर स्वर्णपुरुष सिद्ध
करने के लिए उसके पीछे-पीछे जाकर उसकी माँ की अनुज्ञा लेकर
वहाँ निवास कर लिया । अवसर पाकर एक दिन उस योगी ने
नाहड़ से कहा—"गायो की रखवाली करते हुए तुम्हे रक्त दुग्ध
वाला कुलिस वृक्ष (थोहर ?) मिले, यहाँ चिन्ह करके मुझे कहना ।"
बालक ने कहा—ठीक है । दैवयोग से एक दिन उसने वैसा देख
कर योगी को बतलाया । दोनो वहाँ गए, यथाविधि अग्नि जला-
कर उसमे रक्तक्षीर प्रक्षिप्त कर योगी के प्रदक्षिणा देने पर नाहड़
ने भी अग्नि की प्रदक्षिणा दी । किसी प्रकार योगी की दुष्ट चित्त-
वृत्ति ज्ञात कर राजपुत्र नाहड़ ने नवकार मन्त्र का स्मरण किया ।
उसके प्रभाव से योगी निष्प्रभ हो गया, नाहड़ ने उसे ही अग्नि
मे डाल दिया, वह स्वर्णपुरुष बन गया ।
नाहड़ ने विचार किया — अहो ! मन्त्र का कैसा माहात्म्य है ।
इसके दाता गुरु महाराज का मैं कैसे प्रत्युपकार करूँगा ? फिर
उसने गुरुचरणो मे आकर नमस्कार किया और सारा स्वरूप
बताते हुए कहा—कुछ आज्ञा दीजिए !
गुरु महाराज के वचनो से नाहड ने चौवीस उत्तुङ्ग शिखर
वाले चैत्य बनवाये । क्रमश वह प्रवर राज्यश्री को प्राप्त हुआ ।
बडी भारी सेना के साथ जाकर उसने अपना पैतृक स्थान ग्रहण
किया ।

६६ विविध तीर्थ-कल्प
देवपत्तन गयी । वीर प्रभु की रथारूढ प्रतिमा अदृश्य रूप से चल
कर आश्विन-पूर्णिमा के दिन श्रीमालपुर (भीनमाल) मे आयी ।
अन्य सातिशय देवप्रतिमाएँ भी यथोचित स्थान मे चली गयी ।
नगरदेवता ने श्री वर्द्धमानसूरि को सकेत दिया कि जहाँ भिक्षा
मे प्राप्त क्षीर रुधिर हो कर पुन क्षीर हो जाय वही साधुओ को
रह जाना है ।
हमीर की उस सेना ने विक्रम संवत् ८४५ मे वल्लभी भग कर
के वहाँ के राजा को मार डाला । हमीर अपने स्थान लौट गया ।
इसके बाद एक बार अन्य गजनीपति म्लेच्छ राजा गुजरात
का भग कर के लौटते हुए विक्रम स० १०८१ मे साचौर पहुँचा ।
उसने वहाँ भ० महावीर का मनोहर जिनालय देखा । मारो-मारो
वोलते हुए म्लेच्छ लोग प्रविष्ट हुए और हाथी जोत कर भगवान्
महावीर को खीचा, भगवान स्वस्थान से लेशमात्र भी न चले ।
फिर बैल जोत कर खीचने पर पूर्वभव राग से ब्रह्माशान्ति ने प्रभु
को चार अगुल सरकाया । गजनीपति के स्वय हाँकने पर भी
भगवान निश्चल हो कर रहे, म्लेच्छपति उदास हो गया । फिर
घन-हथोडो से महावीर स्वामी (प्रतिमा) को ताडन किया, जिसकी
चोटें अन्त पुर की स्त्रियो के लगने लगी । तब मात्सर्य-विह्वल
तुर्कों ने तलवार से भगवान महावीर की अगुंली काट ली और
उसे लेकर वे चल पडे । तब घोडो की पूँछें जलने लगी और
म्लेच्छ लोग मूर्च्छित होने लगे । फिर वे घोडो को छोड कर पैदल
ही भगे और धसमसते हुए जमीन पर गिर पडे । वे सर्वबल-क्षीण
हो कर दोनतापूर्वक बिलबिलाते हुए रहमान को याद करने
लगे । तब अदृश्य आकागवाणी हुई कि वीर प्रभु की अगुंली लाने
से तुम लोगो का जीवितव्य ही संशय मे पड गया है ।
गजनी वादशाह ने तब विस्मित चित्त से मस्तक धुनते हुए

सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६७
सेनापति को आज्ञा दी कि यह अंगुली वापस ले जा कर वही लगा
दो । वे लोग भीतिपूर्वक अंगुली वापस लाये और वह तुरंत
स्वामी के हाथ पर जा लगी । यह आश्चर्य देख कर तुर्क लोग
कभी स्वप्न मे भी साचोर का मार्ग नही पकडेगे । चतुर्विध सघ
सन्तुष्ट हुआ, वीर प्रभु के मन्दिर मे गीत, नृत्य, वाजित्त्र, पूजा
दानादि से धर्म-प्रभावना होने लगी ।
अन्यदा बहुत सा काल बीत जाने पर मालवपति गुजरात का
भग करने साचोर की सीमा पर पहुँचा । उस समय ब्रह्मशान्ति
यक्षराज ने प्रचुर सैन्य विकुर्वण करके उसे भग्नबल अर्थात् परा-
जित कर दिया । उसके आवास-शिविर मे वज्राग्नि उठी । मालव-
पति कोश और कोष्ठागार छोड कर भाग छूटा ।
फिर एक बार सं० १३४८ मे प्रवलका फिर सेना देश का
भग करती हुई नगर ग्रामो को नष्ट करती हुई चली आ रही थी
तो जिनालय के द्वार वन्द करके चार योजन मे ब्रह्मशान्ति यक्ष
के माहात्म्य से अनाहत गम्भीर स्वर युक्त वाजित्त्र श्रवण कर
श्री सारगदेव महाराजा की सेना के आगमन की आशका से
मुगल सेना भाग छूटी और साचौर की सोमा पर भी पैर नही
दिया ।
विक्रम सवत् १३५६ मे अलाउद्दीन सुलतान का छोटा भाई
उलूखान ने मत्री माधव से प्रेरित हो कर दिल्ली से गुजरात की
ओर प्रस्थान किया । उस समय चित्रकूटाधिपति समरसिंह ने दण्ड
दे कर मेवाड देश की रक्षा की । तब हमीर युवराज वागड देश
के मुहडासा आदि नगरो को भग करके आसावाल्ली (अहमदाबाद)
पहुँचा । राजा कर्णदेव भग गया । सोमनाथ को घन-घात से तोड
कर गाडो में भर के दिल्ली भेजा । वामनस्थली जा कर मण्डलीक
राजा को दण्डित किया । सौराष्ट्र मे अपनी आज्ञा प्रवर्त्तित कर
आसावल्ली मे रहा । उसने मठ-मन्दिर और देव-कुलो को जलाया ।

६४ विविध तीर्थ-कल्प

एक दिन उसने श्रीजज्जिंगसूरि से प्रार्थना की—भगवन् !
कुछ ऐसा आदेश दीजिए जिस कार्य से आपकी और मेरी कीर्त्ति
चिरकाल तक फैले। तब गुरु महाराज ने जहाँ चारो थणो से
गाय दूध झरती थी, वह भूमि अभ्युदयकारी ज्ञात कर राजा को
दिखाई।
राजा ने गुरु महाराज के आदेश से सत्यपुर (साचौर) मे
भगवान महावीर के ६०० वर्ष बीतने पर एक गगनचुम्बी शिखर
वाला जिनालय बनवाया। आचार्य श्री जज्जिंगसूरि ने वहाँ
पित्तलमय श्री महावीर भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित की। जब
सूरि महाराज प्रतिष्ठा कराने के लिए चले तो अन्तराल मे एक
उत्तम लग्न के समय नाहड राजा के पूर्वपुरुष विङ्गराय की
अश्वारूढ प्रतिमा का प्रतिष्ठा की। दूसरे लग्नविशेष मे पृथ्विी
के मैण जैसी नरम होने पर शंख नामक शिष्य ने गुरु महाराज
के आदेश से दण्डघात द्वारा कुंआ बनाया। आज भी वह शंख-
कूप कहलाता है। वह कुंआ अन्य दिनो मे सूखा होनेपर भी
वैशाखी पूर्णिमा के दिन पानी से भर जाता है। तीसरे लग्न में
भगवान महावीर स्वामी की प्रतिष्ठा की। उसी लग्न मे “दुग्गा
सूअ” गाँव मे और ‘वय णप’ गाँव मे साधु श्रावक के हाथ से
वासक्षेप भेजकर महावीर भगवान की दो प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित
कराईं। उस (सत्यपुरीय) वीर प्रभु की प्रतिमा की राजा नित्यप्रति
पूजा करता है।, इस प्रकार नाहड राजा ने वह बिम्ब कराया।
वहाँ ब्रह्मशान्तियक्ष की सन्निहित प्रातिहार्य से अहर्निश
पर्युपासना होती है। वह यक्ष पहले धनदेव सेठ का वृषभ था।
उसने वेगवती नदी से पाँच सौ गाडे निकाले। सेठ ने सन्तुष्ट हो
कर बैल के चारा-पानी के लिए वर्द्धमान ग्राम निवासी लोगो को
वेतन-धन समर्पण किया। उन ग्रामीणो ने धन लेकर भी उस
वृषभ की कोई सार-सभाल नही की। वह अकाम निर्जरा से मर

सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६५
के व्यन्तर जाति मे शूलपाणि नामक यक्ष उत्पन्न हुआ । विभंग-
ज्ञान से अपना पूर्व जन्म का व्यतिकर ज्ञात कर उस गाँव मे
मात्सर्यवश मारि उत्पन्न कर दी । गाँव वालो ने दुखी हो कर
स्नान वलि-कर्म पूर्वक हाथ मे धूप लेकर कहा—जिस देव-दानव
का हमारे से कुछ भी अपराध हुआ हो वह प्रसन्न हो । तत्र उस
यक्ष ने पूर्वभव-वृषभ का वृत्तान्त कहा । लोगो ने उसी वृषभ के
अस्थि-पुंजपर देवल वनवाया और उसकी प्रतिमा करवाई ।
देवशर्मा को वहाँ देवार्चक—पुजारी स्थापित किया । इस प्रसग से
वर्द्धमान गाँव आस्तिक ग्राम प्रसिद्ध हुआ । शान्ति हुई ।
श्री वर्द्धमान स्वामी छद्मस्थ विहार से विचरते हुए क्रमशः
दुइज्जन्त तापसाश्रम से वर्षावास के लिए उस गाँव मे पधारे ।
गाँव वालो से पूछ कर भगवान उसी देवकुल मे रात्रि के समय
कायोत्सर्ग स्थित रहे । उस मिथ्यादृष्टि देव ने भयङ्कर अट्टहास
किया । हाथी-नाग-पिशाचादि रूप बना कर उपसर्ग किया । शिर,
कान, नासिका, दाँत, आँख, नख और पीठ मे भीषण वेदना उत्पन्न
की । सर्व प्रकार से प्रभु को अक्षुण्ण ज्ञात कर देव उपशान्त हो
हो गया और गीत-नृत्य-स्तुति आदि से पर्युपासना करने लगा ।
इसके वाद उस यक्ष शूलपाणि का नाम ब्रह्मशान्ति प्रसिद्ध हुआ ।
वही यक्ष साचौर के वीर-चैत्य मे प्रतिष्ठाविशेष से निवास
करता है ।
पश्चिम गुजरात मे वल्लभी नामकी समृद्धिशाल नगरी थी
जिसमे शीलादित्य नाम का राजा था । उसने रत्नजटित कागसी
के लोभ मे आकर राका नामक सेठ का पराभव किया । कुपित
सेठ उसे विग्रहणार्थ गज्जणपति हमीर को प्रचुर धन देकर उसकी
विशाल सेना चढा लाया । उस समय चन्द्रप्रभ स्वामी की प्रतिमा,
अम्बा और क्षेत्रपाल युक्त अधिष्ठायक के बल से गगन-मार्ग द्वारा
५

६८ विविध तीर्थ-कल्प
क्रमश सात सौ देग में आया । तब साचौर मे उसी प्रकार अना-
हत वाजित्रो को सुन कर म्लेच्छो का दल पलायन कर गया ।
इस प्रकार पृथ्वीमण्डल मे साचौर के वीर प्रभु के अनेक अवदान
पवाडे (पायढा) सुने जाते हैं ।
व्यन्तर देव केलिप्रिय होते ही है अब अलघनीय भवितव्य
और दूषमकाल के विलसित प्रभाव के कारण मदिर मे गोमांस-
रुधिर के छीटने से देवता लोग दूर चले जाते है। अधिष्ठायक
ब्रह्मशान्ति यक्ष के प्रमादवश असन्निहित अवस्था मे राजा
(सुलतान) अलाउद्दीन ने उस अनल्प माहात्म्य वाले भगवान
महावीर की प्रतिमा को सवत् १३६७ विक्रमीय मे दिल्ली लाकर
आशातना भाजन किया ।
कालान्तर मे फिर भी दूसरी प्रतिमाएँ वहाँ प्रगट प्रभावी और
पूजनीय होगी ।
साचोर तीर्थ का यह कल्प अप्रमेय महिमा वाला और वांछित
फल-सिद्धिकारक है । श्रीजिनप्रभसूरि कहते हैं भव्यजन नित्य पढें ।
श्री सत्यपुर-साचोर तीर्थ कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रन्थसख्या
१६१ और ३ अक्षर हैं ।
•
१८. अष्टापद महातीर्थ-कल्प
(श्री धर्म घोषसूरि कृत)
जो श्रेष्ठ धर्म, कीर्त्ति और विद्याओ के आनन्द के आश्रम भूत
भगवान ऋषभदेव द्वारा पवित्रित है और देवेन्द्रो से वन्दित है उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१)

अष्टापद महातीर्थ-कल्प ६९
जहाँ आपदाएँ नष्ट करने वाले अष्टापद आदि एक लाख
दोषो को दूर करने वाले स्वर्ण की जैसी आभा वाले भगवान
ऋषभदेव हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२)
भगवान ऋषभदेव के वाहूवलि आदि ९९ पुत्र-प्रवर मुनिगण
जहाँ अजरामर पाये, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (३)
जहाँ प्रभु के वियोग से भीरु दस हजार महर्षि प्रभु के साथ ही
अनशन करके मुक्त हुए उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (४)
जहाँ भगवान ऋषभदेव के साथ आठ पौत्र और ९९ पुत्र एक
समय मे मुक्त हुए, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (५)
तीन चिताओ के स्थान मे जहाँ मूर्त्त रत्नत्रय की भाँति इन्द्र
ने तीन स्तूपो की स्थापना की, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (६)
जहाँ भरत चक्रवर्ती ने सिद्धायतन के समान सिंहनिषद्या
नामक चतुर्मुख चैत्य बनवाया, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (७)
जहाँ एक योजन लम्बा और उससे आधा चौडा एव तीन
कोश ऊँचा चैत्य विराजमान है, उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (८)
जहाँ भरत ने भाइयो की प्रतिमाएँ, चौबीस तीर्थंकरो की
प्रतिमाएँ एव अपनी भी प्रतिमा बनवायी, उस अष्टापद गिरिराज
की जय हो । (९)
जहाँ भरत ने अपने-अपने आकार और वर्ण वाले वर्त्तमान
(चौवीसी) के जिनेश्वरो के विम्ब भरवाये, उस अष्टापद गिरिराज
की जय हो । (१०)
जहाँ ९९ प्रतिमाओ से युक्त भाइयो के स्तूप एव अर्हन्त
भगवान के स्तूप बनवाए, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो। (११)

७० विविध तीर्थ-कल्प
भरत द्वारा जहाँ मोहरूपी सिंह का नाश करने के हेतु अष्टा-
पद सिंह की भाँति आठ योजनो वाली पैडियो से सुगोभित है,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१२)
जहाँ भरत चक्रवर्ती आदि अनेको कोटि महर्षियो ने सिद्धि-
साधना की, वह अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१३)
जहाँ सगर राजा के पुत्रो के आगे भरत महाराजा के वंशज
महर्षियो के सर्वार्थसिद्ध एव मोक्ष प्राप्ति करने वालो का सुबुद्धि
ने वर्णन किया, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१४)
जहाँ समुद्र के समान विशाल आशय वाले सगर राजा के पुत्रो
ने गिरिराज के चारो ओर रक्षा के लिए परिखा—सागरखाई
बनाई, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१५)
जहाँ जैन लोग अपने पापो को प्रक्षालन करने के लिए ही
मानो चारो ओर गगा से आश्रित है और हमेशा चचल लहरो से
गोभायमान है उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१६)
जहाँ जिनेश्वर भगवान को तिलक चढाने से दमयन्ती ने
अपने भालस्थल पर स्वाभाविक तिलक रूप अनुरूप फल प्राप्त
किया, उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (१७)
जहाँ क्रोधपूर्वक उठ कर समुद्र मे फेंकने को प्रस्तुत रावण
को चरणो से दवा कर वालि मुनि ने रुला दिया, उस अष्टापद
गिरिराज की जय हो । (१८)
लकेन्द्र रावण द्वारा जिन-पूजोत्सव के समय अपनी भुजाओ
की ताँत निकाल कर वीणा बजाने से धरणेन्द्र के द्वारा अमोघ
विजया गक्ति उसे मिली, उस अष्टापद गिरिराज की हो (१९)
जहाँ चारो दिशाओ मे चार, आठ, दश और दो जिन प्रति-
माओ को गणधर (श्रीगौतम स्वामी) भगवान ने वन्दन किया,
उस अष्टपद गिरिराज की जय हो । (२०)

मिथिलातीर्थ-कल्प ७१
अपनी शक्ति से जो इस गिरि को वन्दन करते है वे अचल
उदय को प्राप्त करते है—ऐसा भगवान महावीर ने वर्णन किया,
उस अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२१)
प्रभु के कहे हुए पुण्डरीक अध्ययन को गौतम द्वारा पढने से
(बोध पाकर) तिर्यंक जृम्भिकदेव दशपूर्वी वज्रस्वामी हुए, उस
अष्टापद गिरिराज की जय हो । (२२)
जहाँ जिनेश्वरो का स्तवन कर लौटते श्रीगौतम स्वामी ने
पन्द्रह सौ तापसो को दीक्षित किया उस अष्टापद गिरिराज की
जय हो । (२३)
इस प्रकार अष्टापद पर्वत के समान अष्टापदमय चिरस्थायी
महातीर्थ वर्णन किया गया हैं, उस अष्टापद गिरिराज की जय
हो । (२४)
यह अष्टापद महातीर्थ-कल्प समाप्त हुआ, यह श्रीधर्मघोष
सूरि की रचना हैं। इसके ग्रन्थाग्र० ३० और २२ अक्षर सख्या है।
१९. मिथिलातीर्थ-कल्प
देवताओसे प्रणत श्री मल्लिनाथ और नमिनाथ जिनेश्वर के
चरणकमलो मे प्रणाम कर के मैं मिथिला महानगरी का कल्प
लेशमात्र कहता हूँ ।
इसी भारतवर्ष मे पूर्व देश मे विदेह नामक जनपद है तो
वर्त्तमान काल मे तिरहुत देश कहलाता है। वहाँ प्रत्येक घर मे

७२ विविध तीर्थ-कल्प

मधुर मञ्जुला फलो के भार से नत कदलीवन दृष्टिगोचर होते
हैं। पथिक लोग भी दूध मे सिद्ध हुए चिउडा और क्षीर का भोजन
करते हैं। पद-पद पर मीठे पानी वाली वापी, कूप, तालाव और
नदियाँ हैं। प्राकृत—ग्राम्य जन भी सस्कृत भाषा विगारद, अनेक
शास्त्रो के प्रशस्त विद्वान् और अतिनिपुण लोग हैं। वहाँ ऋद्धि
से समृद्ध मिथिला नामक नगरी थी जो वर्त्तमान मे जगई नाम से
प्रसिद्ध है। इसके निकट ही जनक महाराजा के भ्राता कनक का
निवासस्थान कनकपुर है।
इस मिथिला नामक नगरी मे कुम्भ राजा और प्रभावती की
कुक्षी से सभूत भगवान मल्लिनाथ स्त्रीतीर्थंकर और विजयनृप-
वप्रादेवी के नन्दन नमि जिनेश्वर का च्यवन, जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए हैं।
यहाँ श्री वीर प्रभु के अष्टम गणधर अकम्पित का जन्म
हुआ है।
यहाँ जुगवाहु-मय णरेहा के पुत्र नमी नामक महाराजा वलय—
चूडियो के शब्द से प्रत्येकबुद्ध हुए और सौधर्मेन्द्र परीक्षित वैराग्य
निश्चय वाले हुए।
यहाँ ही लक्ष्मीगृह चैत्य मे आर्य महागिरि के शिष्य कौण्डिन्य-
गोत्रीय अश्वमित्र श्री वीर-निर्वाण के दो सौ वीस (२२०) वर्ष
बीतने पर अणुप्रवाद पूर्व मे रही हुई नैपुणिका वस्तु को पढते हुए
श्रद्धाहीन हो गया। प्रवचन-स्थविरो द्वारा अनेकान्तिक युक्तियो
से समझाकर मना करने पर भी वह उत्सूत्र प्ररूपणा कर चतुर्थ
निह्नव हुआ।
श्री महावीर स्वामी के पद-पङ्कजो से पवित्रित जल वाली
वाणगगा और गडकी नदियो का सगम इस नगरी को पावन
करता है।

रत्नवाहपुर-कल्प ७३
यहाँ चरम तीर्थङ्कर-श्री महावीर भगवान ने वर्षाकाल
विताया था।
यहाँ जनकसुता महासती सीता की जन्मभूमि का स्थान
विगाल वट विटपी प्रसिद्ध है।
यहाँ श्री राम-सीताका विवाह-स्थान साकल्लकुण्ड नाम से
लोक मे रूढ है। और यहाँ पाताललिङ्ग आदि अनेक लौकिक
तीर्थ भी विद्यमान हैं।
यहाँ मल्लिनाथ चैत्य मे वैरुंट्या देवी, कुबेर यक्ष एव नमिनाथ
चैत्य मे गधारी देवी और भृकुटि यक्ष आराधक जनो के विघ्न
अपहरण करते हैं।
जिनमार्ग मे स्थित जो लोग इस मिथिला कल्प को सुनते और
पढते हैं, उनके कण्ठ मे मुक्ति श्रीवरमाला डालती है। ('जिणपह'
शब्द से कल्प रचयिता श्री जिनप्रभ सूरि का नाम भी समझना
चाहिए)।
श्री मिथिला तीर्थ का कल्प समाप्त हुआ। यह ग्रन्थाग्रं० ३४
अक्षर १८ परिमित है।
■
२०. रत्नवाहपुर-कल्प
श्री रत्नवाहपुर स्थित श्री धर्मनाथ भगवान को नमस्कार
करके उसी पुर-रत्न का कल्प किंचित् करता हूँ। इसी जम्बूद्वीप
नामक द्वीप मे भारतवर्ष के कोगल जनपद मे नानाजातीय उच्च-

७४ विविध तीर्थ-कल्प
स्तरीय शाखा वाले बहुल दलकुसुम-फलाच्छादित, सूर्य-रश्मि
अगम्य गहन वन मण्डित, निर्मल-शीतल वाले निर्झर, घर्घर नद से
मनोहर रत्नवाह नामक नगर है। वहाँ इक्ष्वाकु कुल दीपक स्वर्ण
वर्ण और वज्र लाञ्छन युक्त ४५ धनुष प्रमाण देह वाले पन्द्रहवे
तीर्थङ्कर विजयविमान से अवतीर्ण होकर भानु नरेन्द्र के घर
सुव्रता देवी की कुक्षी से पुत्ररूप मे अवतरित हुए और गुरुजनो
द्वारा धर्मनाथ नाम रखा गया। उनके जन्म-दीक्षा और केवलज्ञान
कल्याणक भी यही हुए और समेत शिखर पर निर्वाण हुआ। इसी
नगर मे लोगो के नेत्रो को शीतलता प्रदान करने वाला, नाग-
कुमार देव द्वारा अधिष्ठित श्री धर्मनाथस्वामी का चैत्य समय
आने पर बना।
उस नगर मे एक कुम्भार अपने शिल्प मे निष्णात था।
उसका पुत्र तरुणावस्था प्राप्त करके भी क्रीडा की दुर्लिप्सा से घर
से वहाँ के रमणीयक शालिनी चेत्य मे आकर यथेच्छ द्यूतादि
क्रीडा किया करता था। वहाँ एक केलिप्रिय नागकुमार देव भी
मानव देह धारण कर कुम्भार के लडके के साथ प्रतिदिन क्रीडा
करने लगता। अपने कुलक्रमागत कुलाल कर्म का धन्धा न करने
के कारण उसका पिता हमेशा उसे दुर्वचनो से फटकारता। जब
वह पिता की वात नही मानता तो पिता उसे मार-पीट कर मिट्टी
खोदने व लाने आदिका काम कराता। फिर भी वह मौका पाकर
बीच-बीच मे उसी चैत्य मे जा कर नागकुमार के साथ खेलने
लगता।
नागकुमार ने पूछा—पहिले की तरह निरन्तर खेलने नही
आते ? उसने कहा—मेरा पिता क्रुद्ध होता है अत उदर-पूर्ति के
लिए कुछ अपना काम भी करना पडता है। नागकुमार ने
कहा—यदि ऐसी वात है तो खेल के पश्चात् मैं पृथ्‍वी पर लोट

रत्नवाहपुर-कल्प ७५
कर साँप हो जाऊँगा, तुम मेरी चार अगुल पूँछ अपनी मिट्टी
खोदने की कुदाली से काट कर ले लेना । वह स्वर्णमय हो जायगी
उसी सोने से तुम्हारे कुटुम्ब का निर्वाह होता रहेगा । सौहार्द के
कारण प्रतिदिन इसी प्रकार प्रवृत्ति चलने लगी । प्रतिदिन सोना
पाकर भी उसका पिता इस रहस्य से अनभिज्ञ रहा ।
एक वार पिता ने उसे बाँध कर पूछा तो भय से उसने यथा-
स्थित कह दिया तो विस्मयपूर्वक उसके पिता ने कहा—रे मूर्ख !
चार अगुल ही क्यो काटते हो ? अधिक काटने से अधिक प्राप्ति
होती है ! पुत्र ने कहा—पिताजी ! मित्र के वचनो का उल्लघन
कर अधिक काटने की मेरी इच्छा नही है । पर पिता तो लोभाभि-
भूत था, वह लड़के की क्रीडा के समय चैत्य मे छिपा खडा रहा ।
खेल के पश्चात् जब नागकुमार साँप बन कर भूमि पर लोटता
हुआ बिल मे प्रवेश करने लगा तो पिता ने कुदाली से उसका
आधा शरीर काट डाला । नागकुमार ने क्रुद्ध होकर—रे पापी !
तुमने रहस्य खोल दिया—कहते हुए गहरा फटकारा और पिता-
पुत्र दोनो को काट खाया । इतना ही नही, नागकुमार ने तीव्र
क्रोधावेग मे समस्त कुंभारो के वंश का नाश कर दिया । उसके
वाद आज तक कोई कुभार का काम करने वाला वहाँ नही रहता ।
वहाँ की जनता मिट्टी के वर्त्तन अन्य स्थानो से लाती है ।
वहाँ उसी ,प्रकार नागमूर्त्तियुक्त धर्मनाथस्वामी की प्रतिमा
सम्यग्दृष्टि यात्रियो के द्वारा बडे समारोहपूर्वक पूजी जाती है ।
आज भी वहाँ इतर धर्म वाले धर्मराज के नाम से उन्हे पुकारते है
और वर्षा न होने पर हजारो घडे दूध से भगवान का अभिषेक
करते हैं । उसी समय वहाँ प्रचुर मेघवृष्टि हो जाती है ।
कन्दर्पा शासनदेवी और किन्नर शासनयक्ष भगवान धर्मनाथ
के भक्त-पूजको के विघ्न दूर कर अर्थ की प्राप्ति भी कराते हैं ।