सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

नगर के स्वामी ईश्वर राजा के वन्दी वाणार्जुन ने भगवान को
देखकर गुणकीर्त्तन किया। "ये अश्वसेन राजा के पुत्र जिनेश्वर
देव हैं" यह ज्ञात कर राजा हाथी से उतर कर प्रभु के पास आकर
मूर्छित हो गया। चेतना प्राप्त होने पर मत्री के पूछने पर वह
अपना पूर्व भाव कहने लगा—जब मैं चारुदत्त होकर पूर्व भव मे
वसतलपुर नगर मे पुरोहितपुत्र दत्त था और कुष्ठादि रोगो से
पीडित हो गंगानदी मे पडते हुए चारण मुनि से बोध पाकर
अर्हिंसादि पचव्रत पालन करते इन्द्रिय-शोषण व कषायविजय
करने लगा।
अन्यदा चैत्यगृह मे आकर जिन-प्रतिमा को प्रणाम करते हुए
पुष्कलि श्रावक ने देखा, उसने मुनि गुणसागर से पृछा—भगवन् !
इसे मन्दिर मे आने मे दोष है या नही ? मुनिराज ने कहा—"दूर
से देव को प्रणाम करने मे क्या दोष है ?" आज भी यह कुर्कट
होगा" यह सुनकर खेद करते हुए फिर मुझे गुरु महाराज ने
सम्बोधित किया कि—तुम जातिस्मरण-अनशन से मर के
राजपुरी मे ईश्वर नामक राजा होओगे। तब मैं सन्तुष्ट हुआ
और वह सब अनुभव करके क्रमश