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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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५६ विविध तीर्थ-कल्प
उस प्रतिमा के वनने पर अन्य भी चौवीस जिन-विम्व खान
से लाकर स्थापित किए । फिर दिव्य शक्ति से अयोध्या से तीन
महाविम्व रात्रि मे आकाश मार्ग से लाये । चौथी प्रतिमा को
लाते हुए रात्रि वीत गई और धारासेणक ग्राम के खेत मे वह रह
गई । चालुक्यचक्रवर्त्ती महाराजा कुमारपाल ने चतुर्थ विम्व की
स्थापना की । आज भी सेरीसा मे महाप्रभावक पार्श्वनाथ भगवान
सघ द्वारा पूजे जाते हैं । वहाँ म्लेच्छ लोग भी उपद्रव नही कर
सकते । शीघ्रतावश घड़ने के कारण वैसे सलावण्य अवयव नही
देखे जाते । उस गाँव मे वह विम्व आज भी मन्दिर मे पूजा
जाता है ।
श्री अयोध्यापुरी का कल्प समाप्त हुआ, यह ४४ श्लोक व
९ अक्षर परिमित है ।
१४. अपापा (पावा) पुरी संक्षिप्त-कल्प
जिसके समीप सिद्धार्थ वणिक के कहने से खरक वैद्य ने स्नान
द्रोणी मे बैठाकर दोनो कानो मे गल्य खींचे जाने पर तीव्र पीडा
से अन्तिम जिनेश्वर के चीत्कार गब्द से प्रस्फुटित गिरि दरी मे
निकलने वाला पूर आज भी दिखाई पडता है ।
जृम्भिका से रात्रि मे ही महसेन नामक वन मे आकर चरम
जिनेश्वर-महावीर स्वामी ने वैशाख शुक्ल ११ को तीर्थ प्रवर्त्तन
किया और वहाँ पर गौतम स्वामी आदि ग्यारह गणधरो को