विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालिकुण्ड कुक्कुटेश्वर-कल्प ५७
उनके छात्रो सहित दीक्षित किया था। उन्होने त्रिपदी से भव-
सागरनिस्तारिणी द्वादशाङ्गी ग्रथित की थी।
जहाँ हस्तिपाल राजा की गुल्मशाला मे अधिष्ठित श्री वर्द्ध-
मान प्रभु ने दो दिन का अनशन करके अन्तिम देशना-वृष्टि की।
स्वाति नक्षत्र के दिन अमावस्या की रात्रि के अन्त मे अतुलनीय
सुखश्री का स्थान शिव-मोक्ष प्राप्त किया, वह नगरियो मे श्रेष्ठ
पावा सर्वजनो को पापरहित बनावे।
जहाँ आज भी नागकुमार साँप के रूप मे प्रभाव दिखाते हैं।
जहाँ अमावस्या की रात्रि मे तैलरहित जल से भरे हुए दीपक
जलते हैं। अनेक आश्चर्यों की भूमि चरम जिनेश्वर—महावीर
स्वामी—के स्तूप से मनोहर स्वरूप वाली श्रेष्ठपुरी वह मध्यमा
पावा यात्रियो की समृद्धि के लिए हो।
श्री अपापा (पावापुरी) कल्प संपूर्ण हुआ, इसके ग्रंथाग्र० १०
अक्षर २१ है।
१५. कलिकुण्ड कुक्कुटेश्वर-कल्प
अग जनपद मे करकण्डु राजा के राज्यकाल मे चम्पा नगरी
से अनतिदूर कादम्बरी नामक अटवी थी। वहाँ कली नामक
पर्वत था जिसकी अधोभूमि मे कुण्ड नाम का एक सरोवर था।
वहाँ यूथाधिपति महीधर नाम का एक हाथी (रहता) था। एक
वार छद्मस्थ अवस्था मे विचरते हुए भगवान श्री पार्श्वनाथ स्वामी