विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७. सत्यपुर-साचौर-तीर्थकल्प
श्री ब्रह्मशान्ति यक्ष सेवित श्री वीर जिनेश्वर को नमस्कार
करके श्री सत्यपुर तीर्थ का कल्प किञ्चित् यथाश्रुत कहूँगा।
(वीर स०) १३०० मे श्रीकन्नौज नरपति द्वारा कारित देवदारुमय
जिनभवन मे श्री वीर जिनेश्वर सच्चपुर मे जयवन्त वर्त्ते।
इसी जम्बूद्वीप नामक द्वीप मे भारतवर्ष मे मरुमण्डल मे
सत्यपुर (सच्चउर) नामक नगर है। वहाँ चैत्यगृह मे नाहड राय
कारित और गणधर-आचार्य श्री जज्जिग सूरि प्रतिष्ठित पित्तल-
मय श्री वीरप्रभु की प्रतिमा है। नाहडराय ने उसे कब और कैसे
बनाया, उसकी उत्पत्ति बतलाते हैं—
पूर्वकाल में नड्डूल-मण्डल मण्डन मण्डोवर नगर के स्वामी
राजा को बलवान भाइयो ने मार कर उस नगर को अधिष्ठित
कर लिया। उस राजा की गर्भवती महादेवी भगकर ब्रह्माणपुर
पहुँची। वहाँ उसने सकल लक्षण युक्त पुत्र प्रसव किया। फिर
नगर के बाहर एक वृक्ष पर झोली मे उस बालक को रखकर
तत्पार्श्ववर्त्ती स्थान मे कुछ काम करने लगी। दैवयोग से वहाँ
श्री जज्जिगसूरि जी महाराज पधारे। वृक्ष की छाया को अपरि-
वर्त्तित देखकर “यह पुण्यवन्त होगा”—ऐसा विचार कर चिर-
काल तक वे उसे देखते रहे। उस राजपत्नी ने सूरि महाराज के
निकट आकर पूछा—भगवन् ! क्या यह लडका कुलक्षयकारी,
अपलक्षणो वाला दिखाई देता है ? सूरिजी ने कहा—भद्रे ! यह
महापुरुष होगा। अत इसे सर्व प्रयत्नो से पालन करना योग्य है।
तब गुरु महाराज ने उसे अनुकम्पापूर्वक चैत्यगृह के कार्य पर
नियुक्त कर दिया। उस लडके का नाम 'नाहड' रखा। गुरु